ज़मीन रहे किसान की या सरकार की

छिंदवाड़ा के पास अडानी पेंच पावर प्लांट का पुरजोर विरोध हो रहा है। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, इन सभी प्रदेशों से इन दिनों किसानों/ग्रामीणों की जमीनों के अधिग्रहण की खबरें सबसे ज्यादा आ रही हैं। एक और समान बात यह है कि ज्यादातर राज्यों में बिजली या लोहे के कारखानों के लिए जमीन पर कब्जे किए जा रहे हैं और किसान/ग्रामीण विरोध कर रहे हैं लेकिन मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का मामला समान हो कर भी कुछ अलग है और प्रस्तावित नए भूमि अधिग्रहण कानून को और जल्द लागू कराने के लिए दमदार दलील पेश कर रहा है।

छिंदवाड़ा के समीप चौसरा गांव में 1320 मेगावाट का ताप बिजली संयंत्र गुजरात का बड़ा औद्योगिक समूह अडानी लगाने जा रहा है। प्लांट के लिए पेंच नदी पर दो बांध बनाकर बिजली घर को पानी दिए जाने की योजना है। योजना के लिए किसानों की जमीन और पानी दोनों छीने जाने के आरोप स्थानीय किसान समूह लगा रहे हैं लेकिन मामले का दिलचस्प पहलू यह है कि जिस जमीन पर किसान खेती कर रहे हैं वह मध्य प्रदेश सरकार 1986-87 में ही डेढ़ हजार से 10 हजार रुपए प्रति एकड़ की दर से अधिग्रहित कर चुकी थी तब अधिग्रहण का प्रयोजन यह बताया गया था कि यहां मध्य प्रदेश विद्युत मंडल बिजली कारखाना लगाएगा और वादा किया गया था कि कारखाने में हर परिवार के सदस्य को नौकरी, जमीन के बदले जमीन और निःशुल्क बिजली दी जाएगी। चूंकि कारखाना नहीं लगा और किसान इस जमीन पर तब से ही खेती करते आ रहे हैं इसलिए अब सरकार द्वारा किसी निजी कंपनी को जमीन बेचे जाने का विरोध कर रहे हैं। यहां हुई जन सुनवाई में भी यह मसला उभरा और जन संगठनों की अगुआई में किसानों ने पुरजोर विरोध किया। मध्य प्रदेश के ऊर्जा सचिव मौ. सुलेमान कहते हैं कि जब एक बार सरकार ने जमीन अधिग्रहण कर मुआवजा दे दिया तो अब किसानों का विरोध एकदम नाजायज है।

यदि 25 साल पहले सरकार ने खुद बिजली घर बनाया होता तो यह उचित था लेकिन आज लाखों का फायदा बनाकर निजी कंपनी को जमीन बेचना गैर कानूनी है। इन्हीं आधारों पर महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालयों ने किसानों को उनकी अधिग्रहीत जमीनें वापस दिलाई हैं। इधर साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल (एक स्वयंसेवी संगठन जो बड़े बांधों, नदियों और प्रभावित लोगों पर काम करता है) का कहना है कि 1986 में दी गई पर्यावरण मंजूरी आज अप्रासंगिक हो चुकी है और अभी नई मंजूरी मिलने से पहले परियोजना का काम शुरू करना एकदम गैरकानूनी है। वह यह भी बताते हैं कि अडानी ने जो पर्यावरण को प्रभावित करने वाली आकलन रिपोर्ट बनाई है उसमें भी बड़ी-बड़ी खामियां हैं। वह यह भी बताते हैं कि जमीन अधिग्रहण का जो प्रस्तावित कानून आ रहा है उसमें साफ है कि यदि प्रस्तावित उद्देश्य को पांच साल में पूरा नहीं किया जा सके तो जमीन वापस करनी होगी। जबकि यहां पर जमीन लिए ही 25 वर्ष हो चुके हैं।

इस परियोजना के लिए कुल 33 गांव विस्थापित होंगे और लगभग 50 हजार की आबादी सीधे प्रभावित होगी। धीरे-धीरे इन सभी गांव के लोग भी अब एक होने लगे हैं और सभी एक बात पर सहमत हैं- एक इंच भी जमीन लेने नहीं देंगे। आंदोलन से जुड़ी आराधना भार्गव बताती हैं कि ताप बिजली घर से जो राख हवा में उड़ेगी उससे कोई 150 गांवों की खेती प्रभावित होगी। इसी तरह 15 किलोमीटर की दूरी पर एक और पावर प्लांट को मंजूरी दी गई है और वहां भी आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही है।

- रवीन्द्र शाह

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