दारा नेशनल पार्क कोटा: पुस्तैनी जमीन से बेदखल होंगे लोग, मुआवजा भी नहीं मिलेगा

    राजस्थान के कोटा और आसपास के जिलों में इन दिनों दारा राष्ट्रीय उद्यान (नेशनल पार्क) की खूब चर्चा है। कोटा जिला के दारा वन्य जीव अभ्यारण्य के छोटे से संकरे हिस्से को राष्ट्रीय उद्यान बनाने का प्रस्ताव राजस्थान सरकार के वन विभाग अधिकारियों के फाइलों में पड़ा है। अधिकारीगण इसे राज्य सरकार से स्वीकृत कराकर गजट में छपवाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं क्योंकि गजट में छपने के बाद ही सरकारी मंजूरी की घोषणा को वैधानिक मान्यता मिलेगी। एक बार पहले भी सन् 2003 में यह प्रस्ताव हर जगह से स्वीकृति पाते हुए गजट में प्रकाशन के मुहाने तक पहुँच गया था। लेकिन ऐन मौके पर विधानसभा चुनाव घोषित हो जाने के कारण अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार इसे प्रकाशित नहीं करवा पाई। चुनाव आयोग को इसके नाम ''राजीव गांधी राष्ट्रीय उद्यान'' पर ऐतराज था। और राज्य सरकार को राजीव गांधी का नाम दिए बिना राष्ट्रीय उद्यान बनाने में कोई रुचि नहीं थी। चुनावो के बाद सरकार बदल गई। अब राज्य में भाजपा सरकार है। इसलिए अब पुराने नाम ''राजीव गांधी राष्ट्रीय उद्यान'' को स्वीकृति मिलने की तो कोई संभावना ही नहीं है। वर्तमान सरकार के लोग इसे दारा राष्ट्रीय उद्यान कहना अधिक पसंद करते हैं। राजस्थान विधानसभा में पिछले सत्र में एक सवाल के जवाब में वर्तमान सरकार के वन मंत्री लक्ष्मी नारायण दबे ने इसे राष्ट्रीय उद्यान बनाने की मौखिक घोषण कर दी है। मामले से जुड़े तकनीकी अवरोधों को खत्म करने हेतु वन विभाग के अधिकारियों ने भी एक नया त्रुटिरहित प्रस्ताव तैयार कर दिया है। ताकी यह सभी दरवाजों से निर्विरोध पार होता हुआ सरपट गजट में छप जाए।
    लेकिन 2003 में तैयार इस प्रस्ताव में कई खामियाँ हैं। अगर दारा वन्य जीव अभ्यारण्य के प्रस्तावित हिस्से को राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दे दिया गया, तो यह क्षेत्र में बसे करीब नौ हजार ग्रामीणों के मानवाधिकारों का गंभीर हनन होगा। सरकारी अधिकारियों और राष्ट्रीय उद्यान का पक्ष लेने वाले लोगों को एक बार मामले के इस पहलू पर भी गौर करना चाहिए।
    प्रस्तावित दारा राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र कोटा जिला के मुकुंदरा पर्वत शृंखलाओं के दो पर्वतों के बीच स्थित है। यह 80 किलोमीटर लंबा तथा कहीं पाँच किलोमीटर तो कहीं डेढ़ किलोमीटर चौड़ा है। दोनों पर्वतों को एक ओर चंबल नदी काटती है, तो दूसरी ओर दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग। इस प्रकार दोनों पहाड़ों तथा चंबल नदी और दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग के बीच के 200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को लेकर प्रस्ताव तैयार किया गया है। लगभग पूरा क्षेत्र, जो वस्तुत: दो पहाड़ों के बीच का दर्रा है, दारा वन्य जीव अभयारण्य का एक हिस्सा है। इस प्रस्तावित क्षेत्र में करीब दस गाँव पड़ते हैं। ग्रामीणों के विरोध और स्थानांतरण की समस्या से बचने के खयाल से कुछ घने गाँवों को उद्यान के नक्शे से बाहर छोड़ दिया गया है। और इसी में छिपा है मुख्य मुद्दा। कानूनन राष्ट्रीय उद्यान पूर्णत: सुरक्षित और प्रतिबंधित जंगल होता है। यहाँ रिहाइश, कृषि, मवेशियों की चराई इत्यादि जैसी सभी सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों पर पूर्ण पाबंदी होती है। परेशानी यह है कि नक्शे से बाहर छोड़ दिए गए गाँव के लोगों की कृषि भूमियों, चारागाहों, जलस्रोतों आदि को प्रस्तावित क्षेत्र के नक्शे में शामिल कर लिया गया है। यानी राष्ट्रीय उद्यान की घोषणा होते ही इनकी सभी दैनिक व आर्थिक गतिविधियों पर रोक लग जाएगी। नक्शे से बाहर होने के कारण इन्हें कहीं और स्थानांतरित करने की भी व्यवस्था नहीं होगी। जिससे वे रहेंगे तो पुरानी जगह पर ही लेकिन कुछ कर नहीं पाएंगे। फलत: वे वहाँ कैद हो कर रह जाएंगे। दूसरे वे अपनी जमीन को बेच कर भी कहीं जा नहीं सकते, क्योंकि प्रतिबंधों से भरी इन जमीनों की उन्हें भला कीमत ही कितनी मिलेगी। यह एक ऐसा नुक्सान होगा, जिसका वे मुआवजा भी न मांग सकेंगे, क्योंकि तकनीकी तौर पर वे नक्शे से बाहर होंगे।
    कुछ गाँव जो प्रस्तावित क्षेत्र के अंदर आते हैं, उनका तो स्थानांतरण तय है। लेकिन ये गाँव वहाँ कई पी‌ढ़ियों से बसे हैं। फलत: आस-पास के गाँवों से इनके संबंध को खारिज नहीं किया जा सकता। स्थानांतरण की स्थिति में इनके सामाजिक ताने-बाने में काफी बिखराव आएगा। अमीरों के लिए स्थानीय दूरी मायने नहीं रखती। पर गरीब उतने सक्षम नहीं होते। ये लोग वहाँ पीढ़ियों से रह रहें हैं। यह स्थान उन्होंने अपनी जीवन शैली के अनुकूल होने के कारण स्वेच्छा से चुना। चारागाह, पेयजल, कृषि भूमि आदि कई चीजें वहाँ उन्हें सुलभ थीं। क्या एक साथ यह संयोग उन्हें दूसरी जगह भी सुलभ होगा। क्या नई जगह की भौगोलिक व प्राकृतिक परिस्थितियों से वे उतने ही वाकिफ होंगे?
    यहाँ बसे सभी गाँव जिन राहों और पगडंडियों से जुड़े हैं वे प्रस्तावित क्षेत्र में पड़ते हैं। ये लोग इन्हीं रास्तों का अधिक इस्तेमाल करते हैं। राष्ट्रीय उद्यान घोषित होते ही ये रास्ते बंद हो जाएंगे। इन गाँवों का आपसी संपर्क टूट जाएगा। ये गाँव जो अपनी जरूरत के लिए एक दूसरे पर निर्भर थे। आपसी संपर्क टूटते ही अकेले लंगड़े खड़े हो जाएंगे। यह एक तरह से इन पर सरकार का जुल्म जैसा होगा। इसके अलावा राष्ट्रीय उद्यान की घोषणा होते ही ग्रामीण बच्चों की पढ़ाई रुक सकती है क्योंकि जंगलों से होकर गुजरने वाला रास्ता बंद हो जाएगा। और वैकल्पिक रास्ता पहाड़ की चोटियों से होकर बनाना होगा। जो काफी लंबा, खतरनाक और थकाऊ होगा। यहाँ का एक गाँव गिरिधरपुरा जिस एक मात्र रास्ते से बाहरी दुनिया से जुड़ा है, वह भी बंद हो जाएगा। लेकिन गाँव के लोगों को वहीं रहना पड़ेगा, क्योंकि गाँव नक्शे से बाहर है। एक वैकल्पिक रास्ता है। पर जंगलों और पहाड़ों से कोई गुजर जाए, तो इसे रास्ता नहीं कहेंगे। इस स्थिति में गिरिधरपुरा का क्या होगा? नक्शे से बाहर छोड़ दिए जाने के कारण इन्हें कहीं स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। और ये लोग यहाँ बाहरी दुनिया से कट कर भला रह भी कैसे लेंगे?
    देखा जाए तो नक्शे बनाने वालों ने इनके साथ दुश्मनों-सा व्यवहार किया है। ऐसी स्थिति में अगर सरकार ने स्थानीय कोल, भील और गूर्जर आबादी की सहमति के बिना इसे राष्ट्रीय उद्यान बनाया तो, पूरी संभावना है कि वन विभाग के अधिकारियों की हत्या का सिलसिला शुरू हो जाएगा क्योंकि यह 10 गाँवों के लिए जीवन-मरण के समान है।
    स्थानीय पर्यावरणविदों के अनुसार अगर प्रस्तावित क्षेत्र को पिछले प्रस्ताव के अनुसार पुन: फैला दिया जाए और एक दूसरे से सटे सभी अभ्यारण्यों, जैसे- दारा और जवाहर सागर वन्य जीव अभ्यारण्यों तथा राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य को मिला कर एक बड़ा राष्ट्रीय उद्यान बनाया जाए, तो उतनी समस्या नहीं आएगी। क्योंकि तब वन क्षेत्र के सभी गाँवों का स्थानांतरण करना होगा। और हर गाँव के लोग मुआवजे के अधिकारी हो जाएंगे। पर निश्चित रूप से सरकार और सरकारी अधिकारियों को कुछ भी करने से पूर्व स्थानीय लोगों की सहमति जरूर लेनी चाहिए। जिससे फिलहाल अधिकारीगण बचने का प्रयास कर रहे हैं।
    एक अन्य अहम सवाल यह भी है कि क्या सचमुच राष्ट्रीय उद्यान बनाने तथा सरकारी प्रबंध से वन और वन्य जीवों की सुरक्षा की जा सकती है। पिछले 50 सालों में हमने इस नीति पर चलते हुए करोड़ों-अरबों रुपये खर्च किए होंगे। क्या हम अपने मंतव्य में सफल हो पाए? क्या इस नीति के तहत जंगल और जानवर सुरक्षित हैं? दारा के ही मामले में अंदर की खबर यह है कि यहाँ अवैध शिकार खूब फल-फूल रहा है। सुरक्षा गार्ड सिर्फ एक बोतल शराब के लिए न सिर्फ आपको शिकार करने देते हैं, बल्कि जंगल के अंदर ही मांस पकाकर आपको खिलाते भी हैं। यह शायद इसलिए कि जंगल की क्षति को वे निजी क्षति नहीं समझते। ऐसा ही भ्रष्टाचार सरकार के लगभग सभी विभागों में है। तो संभव है कि कही नीति में ही खोट हो।
    वन्यजीवों की सुरक्षा का एक उपाय यह है कि जंगलों में रहने वाले स्थानीय लोगों को ही वन और वन्यजीवों का प्रहरी बनाया जा सकता है। इससे स्थानीय समुदाय के पीढ़ियों से बने सामाजिक ताने-बाने पर भी विपरीत असर नहीं पड़ेगा। आज की सरकारी नीति बजट पर दोहरा दबाव डालती है। एक बार तो स्थानीय लोगों को दूसरी जगह बसाने के लिए बेशुमार खर्च। फिर वन की सुरक्षा में लगे गार्ड और अधिकारियों के वेतन का स्थायी दबाव। जिससे वन्यजीवन की तो कोई खास सुरक्षा नहीं ही हो पाती है। उलटे अवैध शिकार से भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलता है। इस नीति के बदले अगर स्थानीय आबादी को ही किसी युक्ति से वन का रक्षक बना दिया जाए, तो वन्य जीवन की भी सुरक्षा हो जाएगी। और इस सुरक्षा पर कोई खर्च भी न आएगा। पर ऐसी युक्ति निकालने की मेधा क्या सरकारी तंत्र में है, जो किसी परियोजना पर होने वाले खर्च की मात्रा से ही विकास का मूल्यांकन करती है। सवाल यह भी है कि अगर बिना खर्च के ही विकास कार्य होने लगे, तो अधिकारियों को भ्रष्टाचार का मौका कैसे मिलेगा?

लेखक: 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
एन ऑलराउण्डर मैटर्स (मार्च, 2005)
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