स्कूल चयन अभियान

स्कूल चयन अभियान

स्कूल चयन अभियान सेंटर फॉर सिविल सोसाईटी  का स्कूल चयन की वकालत करने की एक पहल है, एक सैद्धांतिक नवनिर्मित विचारधारा है जिसका विकास अभिभावकों को बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी का हकदार बनाने के लिए हुआ हैं। इस कार्य के लिए जरूरतमंद बच्चों को फंड देने का एक मॉडल ''शिक्षा वाउचर'' पर आधारित है। स्कूल चयन बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता में असमानता कम करने के लिए एक ड्राफ्ट के रूप में तैयार किया गया है, जोकि सरकार द्वारा इनकी पारदर्शिता एवं विशिष्टता विकसित करने के लिए प्रदान किया गया है। विस्तारपूर्वक गहन शोध करने के लिए विभिन्न प्रकार के तरीकों का सुझाव है जिसमें स्कूल चयन विचारों का प्रयोग हुआ है। जिसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न उद्देश्यों को हासिल करने के लिए प्रयोग किया गया है। सेंटर फॉर सिविल सोसाईटी स्कूल चयन के लिए एक विकासक्षम समाधान को बढ़ावा दे रही है। हमारे सभी बच्चों को शिक्षित करने की कोशिश है जिन समस्याओं का आज हम सामना कर रहे हैं।

स्कूल वाउचर योजना

आम नागरिक तक पहुंचना

संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव अधिकार घोषणा का अनुच्छेद 26 यह वर्णन करता है कि अभिभावकों को अपने बच्चों को शिक्षित करने के चयन का प्राथमिक अधिकार है। पांच राज्यों—उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, उड़ीसा, झारखंड और दिल्ली—में प्रचार के अपने शुरूआती चरण में हमने गरीबों में शिक्षा सुधारों को लेकर जागरूकता का संचार किया। विभिन्न प्रकार के संचार माध्यमों जैसे नुक्कड़ नाटक, नाच, संगीत प्रदर्शन, रैली एवं लोगों से बातचीत से जुड़े मोबाइल वाहनों का प्रयोग करते हुए स्कूल च्वॉयस विचार को सीधे 1,20,42,000 (एक करोड़ बीस लाख बयालिस हजार) अभिभावकों तक पहुंचने में सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी ने कामयाबी हासिल की है, और आज तक 27,38,314 (सताईस लाख, अड़तीस हजार तीन सौ चौदह) हस्ताक्षरों को संग्रहित किया गया है, जिसमें ''विद्यालय वाउचर'' की अर्जी भी है, जिसमें अभिभावकों ने अपने बच्चों को शिक्षित करने की मांग की है।

भारत में शिक्षा नीति की रचना करने के‌ लिए—जहां हर बच्चा गुणवत्तापरक शिक्षा हासिल करे जिसमें अपनी इच्छा सकारात्मक एवं नवनिर्माण की आरम्भिक प्रकिया प्रकट हो—हमें कानून बनाने वालों तक पहुंचने की जरूरत है, जो परिर्वतन ला सकता है। अंतर्राष्ट्रीय वकालतनामा अभियान के तहत अब तक हमने 200 आम सभाएं, कार्यशाला, शिविर एवं प्रस्तु‌तियां अनेक केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, राज्य मंत्रियों, वरिष्ठ शिक्षा अधिकारियों, समाज कल्याण एवं आदिवासी कार्य विभाग, राजनैतिक दलों के नेतागण, योजना आयोग के सदस्यगण, राज्य शिक्षा बोर्ड, गैर सरकारी संगठनों के नेतागण तथा सेंटर फॉर सिविल सोसाईटी कार्यकर्तागण, अंतर्राष्ट्रीय सहायता एजेंसी, संपादक एवं स्तम्भ लेखकों, बुद्धिजीवी एवं शोधकर्ता इत्यादि के साथ आयोजित किया।

चयन के दूत
अनु आगाअनु आगा :- ''सरकार को जरूरत है कि वह कर में वसूल किए गए रुपयों की बढ़ोतरी नेक ढंग से करें। अयोग्य सरकारी स्कूलों को बढ़ाने के बदले यह निजी शिक्षा प्रदान करनेवालों को अनुमति प्रमाण पत्र पाने में सुगमता प्रदान कर सकती है ताकि अधिक संख्या में स्कूलों के दरवाजे इच्छुक विद्यार्थियों के लिए खुल सकें। इन विद्यार्थियों को वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए जिससे इन स्कूलों में दाखिला मिल सके ताकि एक भी बच्चा छूट न जाए।''

गुरचरण दासगुरचरण दास :- ''एक से पांच तक की श्रेणी के लिए, मैं अभिभावकों को वाउचर देना चाहूंगा और विद्यालयों को इन वाउचरों के लिए स्पर्धा करने की अनुमति दूंगा। प्रतियोगिता के कारण स्कूलों को बेहतर शिक्षकों को रखना होगा और जिन्हें बेहतर ढंग से पढ़ाना होगा। वामपंथी एवं पुराने शिक्षकगण इससे डर हुए हैं, लेकिन क्या हम इसके हकदार नहीं है, कम से कम इन विचारों का परिक्षण करने के लिए, जब पिछले पचास सालों में हमारे सारे उपाय विफल रह चुके हैं।

हमें इन सारे रूपयों से क्या हासिल होता है?
एक अनुमान के मुताबिक, शहरी सरकार सरकारी स्कूलों में प्रति माह औसतन 800 से 1200 रु. प्रत्येक छात्र पर खर्च करती है।

हकीकत प्रपत्र /सुसंगत तथ्य

  1. विश्व भर में स्कूल से बाहर रहने वाला हर चौथा बच्चा भारत में है।
  2. प्राथमिक कक्षा के प्रत्येक चार छात्रों में से तीन सरकारी स्कूलों में हैं।
  3. लगभग आधे से ज्यादा पहली कक्षा पहुंचने वाले बच्चे, पांचवी कक्षा पहुंचने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। दो तिहाई छात्र सातवीं कक्षा तक पहुंचने के पहले ही ये कदम उठा लेते हैं।
  4. लगभग 30 फीसदी प्राथमिक विद्यालयों के स्थायी स्कूल भवन नहीं हैं।
  5. लगभग 20 फीसदी प्राथमिक विद्यालय एकल शिक्षक स्कूल हैं। लगभग 10 फीसदी प्राथमिक विद्यालयों में ब्लैक बोर्ड नहीं हैं।
  6. सरकारी स्कूलों के 14  लाख शिक्षकों के पद रिक्त पड़े हैं।
  7. भारत के सरकारी प्राथमिक स्कूलों में औचक निरीक्षण के दौरान 25 फीसदी शिक्षक स्कूल से अनुपस्थित पाए गए और मात्र आधे शिक्षक पढ़ाते मिले। (विश्व बैंक के सर्वेक्षण के दौरान)
  8. सरकारी स्कूलों के शिक्षक दुनिया भर में सबसे ज्यादा वेतन भोगी हैं। (यूनेस्को का सर्वेक्षण)
  9. निजी गैर वेतनमान स्कूलों में प्रति छात्र पर औसतन वार्षिक खर्च 999 रु. है। निजी वित्तीय सहयोग प्राप्त स्कूलों का खर्च 1,827 रु. और सरकारी स्कूलों में 2,008 रु. है।

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