बझैड़ा खुर्द: अधिग्रहित भूमि के उचित मुआवजे का आंदोलन

जमीन अधिग्रहण की परंपरा बंद हो। जमीन पर किसानों के पूर्ण स्वामित्व को मान्यता मिले।
    गाजियाबाद और आस-पास के इलाकों में किसानों के अधिग्रहित जमीन के उचित मुआवजे के लिए चल रहा आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह, मशहूर समाजसेविका अरुणा राय और वंदना शिवा तथा फिल्म स्टार राज बब्बर किसान आंदोलन को नेतृत्व देने के लिए आगे आ चुके हैं। जबकि उत्तर प्रदेश सरकार आंदोलन को बेरहमी से कुचलने में लगी हुई है। सरकार के इशारे पर पुलिस महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों को घरों में घुस कर पीट रही है। प्रशासन ने दादरी के किसानों पर ढेरों मुकदमे दर्ज कर दिए हैं। अरुणा राय ने इसे सरकारी आतंकवाद तो वंदना शिवा ने सुनियोजित हमला बताया है। जबकि वी.पी. सिंह ने इसे अंग्रेजी राज के दौरान होने वाले अत्याचार से बढ़कर बताया है।
    वर्तमान मामला रिलायंस बिजली परियोजना के लिए जमीनों का अधिग्रहण तथा किसानों को कम मुआवजा देने के कारण पैदा हुआ है। यह कोई पहली घटना नहीं है, जब किसान अपनी जमीनों के वाजिब मूल्य की मांग कर रहे हों। एक रुटीन की तरह से यह होता रहता है। यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या किसानों के जमीन का औने-पौने भाव अधिग्रहण करना उचित है? अधिग्रहण की इस प्रक्रिया को न्याय संगत कैसे बनाया जाए, जिसमें किसान अपनी जमीन के लिए मिली कीमत से संतुष्ट हों। और क्या सरकार द्वारा अधिग्रहण कर जमीन निजी कंपनियों को दिया जाना उचित है? अगर जमीन का अधिग्रहण न किया जाए, तो क्या बड़ी-बड़ी परियोजनाएँ नहीं लग पाएंगी?
    सीधे तौर पर देखा जाए, तो निजी कंपनियाँ अपने फायदे के लिए निवेश करती हैं। किसी से जबरदस्ती जमीन लेकर उन्हें देने का कोई तुक समझ में नहीं आता। होना तो यही चाहिए कि अगर उन्हें जमीन चाहिए, तो वे खुद जानकारी हासिल करेंगी और जहाँ किसान बेचने के लिए तैयार होंगे, वे जमीन खरीद लेंगीं। दुनिया के हर कारोबार में व्यक्ति स्वेच्छा से ही अपनी संपत्ति बेचता है, उसे इसके लिए कानूनी तौर पर मजबूर नहीं किया जा सकता। किसानों के मामले में लोग उसके लालची हो जाने की आशंका जताते हैं। वे सोचते हैं कि जब किसानों को पता चलेगा कि किसी निजी कंपनी को कारोबार के लिए जमीन चाहिए, तो वे अपनी जमीन की अधिक कीमत मांगने लगेंगे। इसमें गलत क्या है? मांग पैदा होने पर चीजों की कीमत हर जगह बढ़ जाती है। किसानों की जमीन सस्ती इसलिए है कि उसके अधिक खरीददार नहीं हैं। जैसे ही जमीन के बाजार में खरीददार का प्रवेश होगा, तो जमीन के भाव बढेंगे ही। निजी कंपनी खुद क्या करती है? जब वह किसी मैनेजमेंट पेशेवर को दूसरी कंपनी से तोड़ती है अथवा स्वयं बुलाती है, तो उसे अधिक वेतन देती है। पर यदि उसे पता चल जाए कि पेशेवर योग्य है फिर भी वक्त का मारा है, तो वह उसे कम-से-कम वेतन पर ही रखती है। यह मोलभाव हर कोई हर कहीं करता है। हर जगह चीजों की मांग और पूर्ति जैसे बाजार के कारक ही उसकी कीमत निर्धारित करते हैं। तो इस प्रक्रिया से किसानों को क्यों वंचित किया जाए। यह सरासर जोर-जुल्म है। इन्हीं कारणों से अपने देश में गरीब दिन-प्रतिदिन गरीब होते जा रहे हैं। तथा अमीरों का खजाना भरता जा रहा है।
    कल को यदि कोई विदेशी निवेशक बड़ी पूंजी लेकर आए और रिलायंस के किसी संयत्र को खरीदने की इच्छा व्यक्त करे। तो क्या सरकार देश के विकास की दुहाई देकर रिलायंस को अपनी फैक्टरी औने-पौने भाव बेचने पर मजबूर कर सकती है? बिल्कुल नहीं। रिलायंस का अपने संयंत्रों पर मालिकाना हक है और अपने किसी संयंत्र को बेचना है या नहीं वह स्वयं निर्णय करेगी और अधिक फायदा मिलने की संभावना हो, तो अधिक-से-अधिक कीमत पर बेच भी सकती है। या फिर वह अपने संयंत्र में ही निवेश करने के लिए उसे तैयार कर सकती है। और फायदे में हिस्सेदार हो सकती है। वह कुछ भी करे पर सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं है। तथा सरकार उनके संयंत्रों पर उनके मालिकाना हक को स्वीकार करती है।
    ठीक इसी तरह किसानों के लिए जमीन ही उसकी संपत्ति है। वह किसी भी परिस्थिति में उसे बेचे अथवा न बेचे यह निर्णय सिर्फ उसी का होना चाहिए। तथा खरीदार मिलने पर अधिक-से-अधिक ऊँचे भाव बेचकर अधिकाधिक मुनाफा कमाने के उसके अधिकार को स्वीकार किया जाना चाहिए। बिजली क्या किसी भी क्षेत्र में व्यवसाय कर लाभ अर्जित करने की संभावना को देखते हुए अधिकाधिक किसान एक जुट हो कर एक बड़े कॉपरेटिव भूखंड का निर्माण कर सकते हैं तथा बड़े पूंजीपतियों को अपनी भूमि पर निवेश करने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं तथा लाभ में किसान और पूंजीपति दोनों ही पक्ष हिस्सेदार हो सकते हैं। आखिर पूंजीपति कंपनी लगाते हैं, तो किसान भी अपनी जमीन लगा सकते हैं। दोनों में से किसी का महत्तव कम नहीं है। पर सरकार अनपढ़ किसानों को ठग कर तथा जोर जबरदस्ती कर उनकी जमीन छीन लेती है। यह ठेठ सामंती युग वाला अपराध है। सरकारी जोर-जुल्म और अत्याचार। एक के संपत्ति के अधिकार को स्वीकार कर तथा दूसरे के संपत्ति के अधिकार को खारिज कर सरकार दोगली नीति का परिचय देती है। ग्रामीण और किसान खुद एक बहुत बड़ा समाज है। उन्हें स्वयं पता है कि अपने हित के लिए कौन-सा विकास वे चाहते हैं। और उस क्षेत्र में बाजार को देखते हुए वे स्वयं अपनी संपत्ति का निवेश करना चाहेंगे। यह सहज सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया है।
    बिजली क्षेत्र का ही उदाहरण लिया जाए, तो यदि ग्रामीणों और किसानों को बिजली चाहिए, तो वहाँ स्वत: कुछ किसान बिजली निर्माण की दिशा में आगे आ जाएंगे। वे कुछ किसानों को मिलाकर जमीन का एक बड़ा खंड बनाएंगे तथा बिजली निर्माण में अनुभवी उद्यमियों को उस भूखंड पर निवेश के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। तथा किसान और उद्यमी मिल कर लाभ कमा सकते हैं। दूसरी और बिजली की शहरी जरूरत के लिए बिजली बनाने वाले शहरी उद्यमी स्वयं आगे आएंगे, जिससे जमीन के बड़े-बड़े भूखंड का बाजार बनेगा। इस बड़े भूखंड को देखते हुए भी गाँव के कुछ किसान मुनाफा कमाने के लिए अपनी जमीन लेकर सामने आएंगे। इस प्रकार बिजली की जरूरत चाहे शहर को हो या गाँव को जमीन और उद्यमी की कोई परेशानी नहीं। इस तरह की आर्थिक प्रक्रिया न्याय संगत प्रक्रिया है तथा इसमें किसी पक्ष का शोषण नहीं है। पर ग्रामीणों की जमीन छीन कर सरकार अंग्रेजों की शोषणकारी व्यवस्था को आगे बढ़ा रही है। वहीं बिजली निर्माण को अपने अधीन रखकर बिजली क्षेत्र में सहज व्यावसायिक गतिविधि का गला घोंट रही है। जमीन अधिग्रहण और मुआवजे संबंधी ऐसे किसी भी विवाद का समाधान यही है कि सरकार उद्योगों को न तो सरकारी संरक्षण दे न ही अपने हाथ में ले। दूसरी ओर ग्रामीणों और किसानों की संपत्ति यानी, जमीन पर उनके पूर्ण स्वामित्व को मानते हुए अधिग्रहण की परंपरा को न सिर्फ समाप्त करे, बल्कि इसे गैरकानूनी भी बनाए।

लेखक: 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
इकोनॉमी इंडिया (नवंबर 2006)
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