वाहन चालकों को पढ़ाने का सिरफिरा आदेश

वह दिन देश के इतिहास का बड़ा ही गौरवशाली दिन होगा, जिस दिन बस चालक एवं खलासी के पास भी बी.ए. एम.ए. की डिग्री होगी। रिक्शा वाले, रेहड़ी-पटरी वाले, जन-मजदूर, किसान, आदि सभी शिक्षित हों, यह कौन नहीं चाहता? पर इस लक्ष्य को हासिल करने के नाम पर देश की कोई संस्था अनपढ़ लोगों को रिक्शा चलाने, रेहड़ी-पटरी लगाने, मजदूरी या खेती करने के अधिकार से वंचित कर दे, तो यह शायद किसी को हजम नहीं होगा। और मुद्दा वही पुराना फिर उठ खड़ा होगा कि गरीबी हटानी है या गरीबों को हटाना है? अशिक्षा दूर करनी है या अशिक्षितों को दूर करना है? पिछड़ापन दूर करना है या पिछड़ों को ही दूर भगा देना है?

पिछले दिनों दिल्ली में बस चालकों की शैक्षिक योग्यता जबरदस्ती बढ़ाने वाला एक आदेश व्यवस्था की विवेकहीनता का एक ऐसा नमूना है, जो आए दिन देखने को मिलता ही रहता है। यह आदेश 27 मार्च 2007 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिया था। इसके तहत अब आगे सिर्फ उन्हीं बस चालकों को ड्राइविंग लाइसेंस दिये जाएंगे, जिन्होंने कम-से-कम बारहवीं तक की पढ़ाई सफलतापर्वक पूरी की होगी। आदेश 9 अप्रैल से लागू है।

दिल्ली नगर निगम के विद्यालय के एक शिक्षक श्री अनिल झा यह नहीं समझ पा रहे हैं कि न्यायालय ने यह आदेश क्यों दिया? तथा इससे भला कौन सा उद्देश्य पूरा होता है? वाहन चलाना एक अलग तरह की योग्यता है, जिसका स्कूली शिक्षा से कोई नाता नहीं। बल्कि वाहन चलाना भी एक तरह की विद्या है और इस विद्या में निपुण बस चालकों को भी शिक्षित ही माना जाना चाहिए। बात बस इतनी है कि उन्होंने इस तरह की शिक्षा नहीं, बल्कि उस तरह की शिक्षा ली है। न्यायपालिका से जुड़े लोगों की विशेषज्ञता का क्षेत्र 'कानून' होता है। अन्य मामलों में वह नि:संदेह अपनी राय रख सकते हैं, पर कोई बाध्यकारी फरमान जारी करना कहाँ तक उचित है, इस पर पहले भी कई बार बहस हो चुकी है।

सर्वोच्च न्यायालय के वकील नितेश राणा इस संबंध में मुख्य मुद्दा नैतिक शिक्षा को मानते हैं, जो चालक को जिम्मेदारीपूर्वक वाहन चलाने की प्रेरणा दे। पर क्या स्कूली शिक्षा का प्रमाणपत्र इस बात की गारंटी देता है? क्या स्कूली शिक्षा के प्रमाण पत्र फर्जी नहीं बन सकते? असली मुद्दा शिक्षा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से वाहन चलाने की है। हमें यह सोचना होगा कि चालक जिम्मेदारी से वाहन क्यों नहीं चलाते। और किस प्रकार सड़क पर सुरक्षित सफर सुनिश्चित किया जा सके।

बस चालकों को बारहवीं पढ़ाने वाले इस आदेश की मंशा शायद यह हो सकती है कि बस चालक भी पढ़े-लिखे हों। पर उसके लिए शिक्षा व्यवस्था को कारगर बनाये जाने की जरूरत है। देश की पूरी आबादी शिक्षित हो जाए यह हम सभी चाहते हैं, पर इस लक्ष्य की पूर्ति क्या देश की अशिक्षित आबादी को देश से बाहर निकाल कर होगी? या फिर इसके लिए हम शिक्षा का प्रकाश फैलाएंगे? शिक्षा पर काम करने वाली दिल्ली स्थित वैचारिक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के शोध साहित्यों से पता चलता है कि शिक्षा व्यवस्था लाइसेंस-परमिट राज में बुरी तरह जकड़ी हुई है। इसलिए शिक्षा का प्रसार नहीं हो पा रहा है। क्यों ना शिक्षा व्यवस्था को कारगर बनाने का प्रयास किया जाए? ताकि शिक्षा झुग्गी-झोपड़ी जैसे अशिक्षित क्षेत्रों तथा देश के दूर-दराज गाँव-देहातों में भी पहुँच सके। और कल इन जगहों से आने वाले छोटे-मोटे कामगार भी पढ़े लिखे हों। उच्च न्यायालय के आदेश का सिर्फ यही अर्थ लगाया जा सकता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था सर्व शिक्षा का लक्ष्य हासिल करने में सफल नहीं हो पायी है। शिक्षा व्यवस्था उस समुदाय तक नहीं पहुँच पायी है, जहाँ के लोग बस चालक बनते हैं। हाई कोर्ट को वस्तुत: इस हालात को संदर्भ बनाते हुए देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार संबंधी पहल करनी चाहिए थी। ड्राइविंग लाइसेंस के लिए शिक्षा जैसे किसी शर्त को जोड़ना वस्तुत: रिश्वतखोरी का एक नया द्वार खोलना है।

एक प्रश्न यह भी उठता है कि हाई कोर्ट की नजर में शिक्षा का मतलब क्या है? क्या शिक्षा सिर्फ वह है, जो स्कूलों में पढ़ायी जाती है? क्या वाहन चलाने की निपुणता को शिक्षा से बाहर की चीज मानी जाए? क्या बस चलाने के लिए इतिहास-भूगोल का ज्ञान जरूरी है? अगर शिक्षा का मतलब नैतिक शिक्षा है, तो क्या स्कूली शिक्षा नैतिक शिक्षा की गारंटी देती है? क्या लोक गीत, कथा-कहानी, संगीत, समाज, परिवार, सिनेमा, आदि नैतिक शिक्षा के वाहक नहीं हैं?

इस आदेश में सबसे बड़ा मुद्दा मानव के जन्मजात मानवाधिकार का बनता है। क्या अनपढ़ रह गए लोगों को जीने और सम्मानपूर्वक कमाकर खाने के अधिकार से वंचित कर दिया जाए? क्या दिल्ली शहर उच्च न्यायालय की निजी जागीर है कि वह यह तय करे कि यहाँ किसे बस चलाने दिया जाए और किसे नहीं? अशिक्षित ड्राइवरों एवं खलासियों को आजीविका से धकियाकर बाहर कर देने के स्थान पर क्या यह नहीं हो सकता कि शिक्षा अधिकारियों को थोड़ा टाइट किया जाए? और शिक्षा व्यवस्था को खुद आगे बढ़कर ड्राइवर एवं खलासियों के जीवन में उतर आने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया जाए? माननीय(?) न्यायालय शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने की जगह भुक्तभोगी अनपढ़ लोगों पर ही अन्याय करने के लिए क्यों उतारू हैं? रोजी-रोटी कमाना हर मानव का हक है। एक मानवाधिकार है। न्यायालय को इसकी रक्षा करनी चाहिए।

लेखक: 
संजय कुमार साह
प्रकाशित: 
(2 मई 2007)
Post new comment
The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

More information about formatting options