भारत मे ऊर्जा की कमी

भारत की ऊर्जा समस्या बड़ा आकार लेने वाली है। कोयला, प्राकृतिक गैस और तेल के बड़े उत्पादकों ने हाल ही में कहा कि अगले कुछ सालों में उनके उत्पादन में बहुत कम वृद्धि होगी। जब देश में ईंधन की मांग बढ़ती जा रही है, तब देश के लिए यह बुरी ख़बर है।

इसका मतलब यह हुआ कि और अधिक ईंधन का आयात किया जाएगा और ऊर्जा कंपनियों के आयात खर्च और अधिक बढ़ते जाएंगे। इसका मतलब यह भी हुआ कि भारत का ऊर्जा क्षेत्र तेज़ी से असुरक्षित होता जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया की बाढ़ और मध्य-पूर्व के देशों में फैल रही अशांति जैसी घटनाओं से विश्व आपूर्ति में आयी बाधाओं और अस्थिर कीमतों के कारण यह कमज़ोरी आ रही है।

एचएसबीसी के हाल के बयान के अनुसार भारत के योजना आयोग ने अनुमान लगाया है कि ऊर्जा की आयात निर्भरता लगभग दोगुनी हो सकती है। यह निर्भरता 2003-04 में वाणिज्यिक ऊर्जा ख़पत के लगभग 25 फीसदी थी, जिसका 2031-32 में बढ़कर 53 फीसदी हो जाने का अनुमान है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, भारत में कोयले का लगभग 40 फीसदी, तेल का लगभग 24 फीसदी और प्राकृतिक गैस का लगभग 6 फीसदी कुल ऊर्जा ख़पत है।

उत्पादन के लिहाज से विश्व में सबसे बड़ी कोयला कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड ने पिछले महीने 31 मार्च 2011 और उसके बाद के साल के लिए अपने कोयला उत्पादन में कटौती करने की घोषणा की है। इसके बाद भारत  के सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक, तेल और प्राकृतिक गैस निगम ने कहा है कि अगले साल ही इसका तेल उत्पादन स्थिर बना रहेगा और अप्रैल 2012 से ही इसमें वृद्धि होगी। देश के सबसे बड़े गैस उत्पादक रिलाएंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड ने भी कहा है कि समुद्री गैस क्षेत्र से कुछ वर्षों तक उत्पादन का अधिकतम स्तर प्राप्त नहीं किया जा सकेगा।

भारतीय कंपनियां ईंधन के आयात में वृद्धि की उम्मीद कर रही हैं, जिससे सार्वजनिक तथा निजी धन और फॉरेक्स भंडार के खर्च होने की संभावना है, जिस कारण ऋण नीतियों पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत पड़ सकती है और वित्तीय तथा व्यापारिक घाटों में इजाफ़ा हो सकता है।

भारत अपने कच्चे तेल की ज़रूरतों का लगभग 80 फीसदी आयात करता है और भारत के कुल आयात का लगभग 31 फीसदी सिर्फ तेल का आयात है। सउदी अरब और ईरान भारत के सबसे बड़े तेल निर्यातक देश हैं, 2009-10 में कुल आयात का 30 फीसदी इन देशों से किया गया।

2013 के मध्य तक सरकार ऐसी तीन कच्चे तेल भंडारण की ईकाइयां बनानेवाली है, जिससे 15 दिनों की आपातकालीन आपूर्ति की जा सकेगी और भविष्य में इन्हें 45 दिनों ‍की आपूर्ति के लिए विकसित किया जाएगा।

भारतीय तेल शोधक कंपनियां विभिन्न अफ्रीकी देशों सहित ऐसे देशों की संख्या में वृद्धि करने का प्रयास कर रही हैं, जिनसे वे कच्चे तेल प्राप्त किया करती हैं। इसके साथ ही कम मात्रा के सल्फर युक्त कच्चे तेल जैसे सस्ते तेलों की अधिक मात्रा के आयात का भी प्रयास किया जा रहा है।

भारत के बंदरगाहों और जहाजरानी क्षेत्रों में भारी निवेश किया जाने वाला है, जहां से भारी मात्रा में कोयला और तेल का आयात किया जाएगा। एस्सार ग्रुप, अदानी ग्रुप और टाटा पावर लि. जैसी ऊर्जा की प्रमुख कंपनियां बंदरगाहों और जहाज़ के क्षेत्र में क्षमता के व्यापक विस्तार में लगी हुई हैं।

भारत की कोयला ज़रूरतों के अधिकांश का उत्पादन करने वाली कोल इंडिया भारत के एक सबसे बड़े कोयला आयात समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका से “करोड़ों  टन” कोयले के आयात की दीर्घावधि की योजना बना रही है।

घरेलू गैस और कोयले की कमी से जूझती अन्य भारतीय ऊर्जा कंपनियां और खाद तथा विद्युत कंपनियां अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य हुई हैं। इनमें भारत की सबसे बड़ी गैस आयातक पेट्रोनेट एलएनजी भी शामिल है, जो गैस टर्मिनल विस्तार परियोजनाओं को बढ़ा रही हैं। न सिर्फ उत्सर्जन को कम करने के लिए बल्कि बढ़ते आयात के जोखिम से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बचाने के लिए भी कम-कार्बन वाली ऊर्जा के विकास की ज़रूरत है।

- एरिक येप

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