वित्तीय संकट के साथ आई मंदी की मार दूर तक
अंतरराष्ट्रीय मंदी की समाप्ति की घोषणा के लिए कॉरपोरेट जगत बेताब नजर आ रहा है। दुनिया भर के शेयर बाजारों ने तेज छलांग भी लगानी शुरू कर दी है। बावजूद इन अच्छी खबरों के अंतरराष्ट्रीय मुदा कोष ने निराशावादी भविष्यवाणी की है। 1929 की महामंदी के बाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय जीडीपी के साल 2009 में 1.3 फीसदी और 2010 में 1.9 फीसदी तक सिमटने का अनुमान व्यक्त किया गया है। दो फीसदी से भी कम विकास दर अंतरराष्ट्रीय मंदी का संकेत है। इसके अलावा अनुमान यह भी है कि साल 2011 से पहले तेज रिकवरी संभव नहीं है।
सरकार चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में अर्थव्यवस्था की रिकवरी की बात कर रही है। रिजर्व बैंक ने 2009-10 में 6.5 फीसदी विकास का अनुमान व्यक्त किया है। मजे की बात यह है कि आईएमएफ ने भारत के लिए 4.8 फीसदी विकास का अनुमान व्यक्त किया है। हो सकता है कि आईएमएफ आने वाले दिनों में इस अनुमान में सुधार करे, लेकिन इस समय आईएमएफ ने भारत के विकास दर के बारे में कम अनुमान क्यों जताया है?
भारतीय अर्थशास्त्री बृहद परिप्रेक्ष्य में भारतीय सीन को देखते हैं, जबकि आईएमएफ पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को देख रहा है। इतिहास गवाह है कि वित्तीय संकट के साथ आई मंदी गहरी और लंबी होती है। भारत में कोई वित्तीय संकट नहीं है, इसलिए भारतीय अधिक आशावादी हो गए हैं, लेकिन दुनिया भर में वित्तीय संकट भी है। आईएमएफ देख रहा है कि दुनिया के विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
आर्थिक संकट ने सबसे पहले निर्माण क्षेत्र पर असर डाला है। उत्पादन क्षेत्र पर असर पड़ने से नौकरियों में छंटनी हुई और मंदी आई। इसके बाद मंदी वित्तीय संकट को और बदतर बना देती है। अधिक कंपनियां और लोग बैंक लोन के मामले में डिफॉल्ट करने लगते हैं। इसके बाद बैंक कर्ज देने में आनाकानी करने लगते हैं जिससे उत्पादन और रोजगार पर असर पड़ने लगता है। इसे ही निगेटिव फीडबैक लूप कहते हैं।
आईएमएफ का अनुमान है कि दुनिया भर में कर्ज देने वाले संस्थानों का बैड डेट का आंकड़ा चार लाख करोड़ डॉलर के आंकड़े को पार कर सकता है। यह राशि भारत के जीडीपी का चार गुना है। इसमें अमेरिका की हालत सबसे खराब हो सकती है और उसके लिए यह आंकड़ा 2.7 लाख करोड़ को पार कर सकता है। यूरोप में यह राशि 1.2 लाख करोड़ डॉलर और जापान में 149 अरब डॉलर हो सकती है।
अगर इस अनुमान के हिसाब से बात करें तो दुनिया के बड़े बैंक इसकी चपेट में आ सकते हैं। उन्हें इसके लिए काफी ताजा पूंजी की जरूरत पड़ेगी, जिससे वे डूबे कर्ज को भूलकर नया कर्ज बांट सकें। यह रकम कहां से आएगी? निजी निवेशक पहले ही हाथ जला चुके हैं, इसलिए इसमें दुनिया की सरकारों का महत्वपूर्ण रोल है जो राहत पैकेज के नाम पर सिस्टम में धन डाल रही हैं। अमेरिका में इसके लिए निजी-सार्वजनिक भागीदारी पर बल दिया जा रहा है।
अपनी वास्तविक पूंजी की तुलना में बैंकों ने काफी कर्ज बांट दिया है। अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए वित्तीय कंपनियां ताजा कर्ज उपलब्ध करा पाने की हालत में नहीं हैं। दुनिया को इस समय निगेटिव से पॉजिटिव फीडबैक लूप में प्रवेश करना है। इसके अलावा बैंकों को उत्पादन क्षेत्र को अधिक से अधिक कर्ज देना होगा, जिससे रोजगार के अधिक अवसर पैदा हो सकें। इससे कर्ज की मांग में वृद्धि दर्ज की जाएगी। वर्तमान संकट से इसी उपाय को अपनाकर राहत मिल सकती है। सरकार ने अब तक बैंकों को कर्ज, संपत्ति खरीदने और गारंटी के रूप में 8.9 लाख करोड़ डॉलर उपलब्ध कराए हैं।
ऐसा लग सकता है कि यह जरूरत के हिसाब से काफी है, लेकिन आईएमएफ का मानना है कि यह जरूरत का सिर्फ एक तिहाई है। बैंक डिपॉजिट से निश्चित रूप से जीडीपी को सहारा मिलता है, क्योंकि इससे उन्हें कर्ज देने के लिए रकम मिलती है।
बैंकों को अपनी पुरानी देनदारियों के लिए भी रकम चाहिए। आईएमएफ के अनुमान के अनुसार साल 2011 तक इसके लिए बैंकों को 25.6 लाख करोड़ डॉलर चाहिए। बैंक इसे पूरा करने के लिए आने वाले दिनों में कर्ज की रफ्तार धीमी करेंगे, जो खतरे का विषय है। माइकल मूसा जैसे अर्थशास्त्री आईएमएफ से पूरी तरह सहमत हैं। आने वाले दिनों में अच्छे समय की कल्पना की जा सकती है, लेकिन बुरे दौर के लिए तैयार रहने की भी जरूरत है।
