उदारवाद - एम.ए.वेंकट राव

गैर-समाजवादी विचारों और उदारवाद पर आधारित वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक नीति को लेकर जो प्रतिसाद मिला है, वह इस बात का सबूत है कि श्री लोतवाला जैसे उदारवादियों का उनमें यकीन कायम है। श्रीमती लोतवाला साम्यवादी नियंत्रण को रास आने वाले सामूहिकतावाद की दिशा में ले जाने वाले जीवन के तमाम क्षेत्रों में रूझानों और संस्कृति को जानती हैं। रूझानों का यह प्रवाह सोवियत संघ या चीन जैसे साम्यवादी और तथाकथित जनवादी लोकतांत्रिक देशों तक ही सीमित नहीं है। यह इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की लेबर पार्टी और स्वीडन, डेनमार्क जैसे स्कैंडिनेवियाई देशों में आम है। अमेरिका तक में टीवीए और परमाणु ऊर्जा आयोग में सरकारी नियंत्रण को लेकर सकारात्मक माहौल है। श्री चोडोरोव ने इस बात की गणना कर ली है कि संघीय और प्रांतीय सरकारों द्वारा करों के जरिये लोगों की आय का एक तिहाई हासिल कर लिया है और सरकारी विभागों में 10 प्रतिशत कर्मचारियों को लगाया है। इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर चोडोरोव, सीनेटर मैकार्थी से कहते हैं कि केवल अमेरिकी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड वाले चंद सदस्य बल्कि संघीय शासन, राज्य और म्युनिसिपल सेवाओं में जुटी तमाम नौकरशाही भी खतरनाक हैं जो कि साम्यवाद और समूहवाद के विकास के लिए जिम्मेदार हैं। देश में सोवियत एजेंटों की घुसपैठ रोकने के लिए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोवियत संघ पर दबाव बनाने के लिए, लेकिन इसी दौरान राजनीतिक और सामाजिक कामकाज में समूहवाद को समर्थन विरोधाभासी काम हैं, जो एक-दूसरे को काट रहे हैं।

समूहवाद को, फिर वह आधिकारिक तौर पर साम्यवादी हो या न हो, रोकने का इकलौता सुरक्षित और तार्किक आधार, है अर्थव्यवस्था, राज्यतंत्र और समाज को लेकर एक व्यापक दर्शन, जो स्वतंत्रता और मानवीय जीवन के विकास की सोच पर ही केंद्रित हो। यह विकास जीवन मूल्यों को आत्मसात करने और उन्हें व्यक्त करने के ज्यादा मौके देकर किया जा सकता है।

ऐसे दर्शन के क्या पहलू हैं?

ऐसे दर्शन का आधार है कि इंसान क्रियाशील है और उसके भीतर ब्रह्मांड को जानने और अनुभवों को कला, सामाजिक नातों, विज्ञान और आर्थिक निर्माण के जरिये व्यक्त करने की नैसर्गिक ललक है। इंसान की ऊर्जा के ऐसे विस्तार के लिए सामाजिक परिवेश एक अनिवार्यता है। इंसान एक अलग व्यक्ति भी है और सामाजिक जीव भी है लेकिन उसकी निजता ही मूल आधार है और सामाजिक संबंध तो वह परिणाम और परिवेश है जिसमें किसी व्यक्ति को अपनी पहचान होती है और जहां पर वह खुद को अभिव्यक्त कर सकता है। व्यक्ति के बिना समाज नाम की कोई चीज ही नहीं है। समाज तो अन्य लोगों के लिए एक नाम भर है। इसलिए परिवार, वंश, जातिगत समूह, कबीला, देश, इंसानियत सभी स्वतंत्र अवधारणाएं हैं, लेकिन आपसी रिश्तों के लिहाज से सभी व्यक्तिगत भी हैं। इसलिए परिवार या राष्ट्रीयता के मनोभाव की परिकल्पना और लोगों के आत्मदाह की मांग करके उनको बलि का शिकार करार देने की समूची सोच ही गलत और शरारतपूर्ण है। किसी देश का वास्तविक मनोभाव आम परंपराओं और साझा भावनाओं, स्मृतियों से जुड़ाव ही है। देश वास्तव में समान मनोवृत्ति के लोगों का साझा इलाका है। नींव तो निजत्व है जिस पर देश का बड़ा सारा ढांचा खड़ा है। देश कोई प्राथमिक हकीकत नहीं है जहां लोग केवल दिखावे की चीज हैं। यह वही आदर्शवाद की गलत हेगेलियन सोच है जिसे कार्ल मार्क्स ने राष्ट्र के वर्ग (class of nation) के तौर पर परिभाषित किया था। हेगल की सोच भी उपर चर्चित सही तरीके की ही थी, बस उन्होंने उसका गलत निष्कर्ष निकाल लिया था। दूसरा सिद्धांत यह है कि सभी प्रकार के वॉव्यक्तियों का मूल्य एक समान ही है। जिंदगी के संघर्ष में एक वर्ग के लोगों को दूसरों से ऊपर रखने की कोई जरुरत नहीं है। सभी को समान अधिकार हैं, एक-दूसरे की बेहतरी के लिहाज से सीमित। किसी व्यक्ति विशेष के समूह की आजादी की सीमा केवल इतनी है कि दूसरे समूह की समान आजादी प्रभावित न हो।

आइए इस सिद्धांत को वर्तमान समस्याओं पर लागू करें

इस सोच का एक परिणाम तो किसी न किसी कारण से बढ़ाए जाने वाले सार्वजनिक कर्ज को कम करना होगा। निश्चित तौर पर रक्षा की जरुरतें और युद्ध, वित्त के कारण सार्वजनिक कर्ज में कुछ इजाफा जरुरी हो जाता है। लेकिन वर्तमान की यह आत्मसंतोष वाली सोच जो सार्वजनिक कर्ज को न केवल स्वीकारती है, बल्कि इसे अहानिकारक करार देकर निकट भविष्य में कम करने के किसी भी प्रयास को खारिज करती है, गलत है। अर्थशास्त्र में उदारवाद किसी भी कालखंड या सीमा तक सार्वजनिक कर्ज को प्रतिबंधित करता है, क्योंकि इसके भुगतान का बोझ अगली पीढ़ियों के हिस्से में जाएगा। चूंकि भविष्य की पीढ़ियों को राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा से लाभ मिलता है, इसलिए पिछली पीढ़ियों के कर्ज को उतारना औचित्यपूर्ण करार दिया जा सकता है। लेकिन यह कर्ज न्यूनतम संभव होना चाहिए और राष्ट्रीय बजट को मूल के नियमित भुगतान के साथ इस पर नियंत्रण रखा जाना चाहिए।

साथ ही विकास कार्यों के लिए भी राष्ट्र का कर्ज औचित्यपूर्ण करार दिया जा सकता है, लेकिन तभी जब इसके भुगतान का कड़ाई से पालन हो और वह भी सार्वजनिक काम के जरिये ही। मुक्त समाज को परिभाषित करने का एक तरीका है कि एक ऐसा समाज जिस पर कोई सार्वजनिक कर्ज न हो। वर्तमान पीढ़ी को बिना किसी योजना के सार्वजनिक कर्ज में इजाफे के प्रलोभन से बचना चाहिए। भविष्य की पीढ़ियों को ऐसे कर्ज के भुगतान के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए जो जरुरी और अपरिहार्य जरुरतों से न उपजा हो। सिद्धांत यही है कि व्यक्तियों के एक समूह को दूसरे समूह पर किसी कालखंड या विभिन्न कालखंडों में बोझ नहीं डालना चाहिए। जहां तक संभव हो हर व्यक्ति को अपनी जरूरतों का बोझ खुद ही ढोना चाहिए। यह लोगों के बीच समानता के आदर्श को साकार करेगी। इस सिद्धांत का उल्लंघन निजी स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के सिद्धांत के खिलाफ होगा।

जरुरी है कि देश की वर्तमान दूसरी पंचवर्षीय योजना को इसी उदारवादी नजरिये से परखा जाए। भविष्य के किसी पूंजीगत उपस्कर (capital equipment) की आड़ में वर्तमान उपभोक्ता के हितों की किसी भी अनदेखी की बारीकी से जांच की जानी चाहिए। वर्तमान खपत और भविष्य के विकास के बीच सही संतुलन साधा जाना चाहिए ताकि भविष्य के लोगों के लिए वर्तमान लोगों के हित दांव पर न लगें। ऐसा त्याग करना भी हो तो वह स्वैच्छिक होना चाहिए, सोवियत योजनाओं की तरह अनिवार्य नहीं। हमारी दूसरी पंचवर्षीय योजना के खिलाफ जो आलोचना वैध तरीके से की जा रही है, उसमें निहित चिंता निजी स्वतंत्रता के सिद्धांत को लेकर ही है। भविष्य की पीढ़ी की खपत के लिए वर्तमान पीढ़ी के उपभोग का टाले जाने का फैसला सत्ता में मौजूद चंद लोगों के हाथों में नहीं होना चाहिए। इस सोच से देखा जाए तो उदारवाद के लिए मुक्त अर्थव्यवस्था सर्वश्रेष्ठ दिखाई देती है, जहां फैसले उपभोक्ता के हाथों में होंगे, जहां उनको होना चाहिए। इस तरह से उपभोक्ता सामग्री की बजाय पूंजीगत और भारी माल से जुड़ी योजनाओं पर एकतरफा जोर योजनाकारों की संप्रुभता को सर्वोपरि बनाता है, जो कि गलत और खतरनाक है। मुक्त अर्थव्यवस्था में आर्थिक फैसलों के केंद्रों और स्रोतों की बहुलता पर जोर होता है। सरकार को आर्थिक फैसले के काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। लोगों या समूहों के हाथ में फैसलों का विकेंद्रीकरण फायदे के लिए हो सकता है, लेकिन इतना ही समूचे तंत्र की अक्षमता को दूर नहीं कर सकता। हो सकता है कि इसका परिणाम एकाधिकार हो जाए, लेकिन इलाज निजी उद्यमियों को हटाना नहीं बल्कि विनियमन करना है।  विनियमन का सिद्धांत खुली प्रतिस्पर्धा का रक्षक है। उदारवादियों को यकीन है कि खुली प्रतिस्पर्धा के माहौल में मुक्त अर्थव्यवस्था सर्वाधिक उत्पादन को और निष्पक्ष वितरण को प्रोत्साहित करेगा। प्रतिस्पर्धा और मुक्त बाजार से ऐसे रूझान और शक्तियां विकसित होंगी, जो समाज के सभी सदस्यों के हितों की रक्षा करेंगी, एक उत्पादक के तौर पर और एक उपभोक्ता के तौर पर भी। विनियमन और आर्थिक कामकाज पर सरकार के नियंत्रण व एकाधिकार में फर्क है।

सरकार केवल बलप्रयोग से ही काम कर सकती है जो कि व्यक्तियों की मुक्त गतिविधियों में बाधक होगा। मुक्त अर्थव्यवस्था में व्यक्तियों की मुक्त गतिविधियां जरूरी हैं। मुक्त अर्थव्यवस्था को समर्थन और माहौल के लिए मुक्त समाज की दरकार है। दोनों साथ-साथ चलते हैं। उदारवाद का मतलब सभी को बराबरी के मौके मुहैया कराना, जिसका मतलब किसी भी तरह के एकाधिकार, चाहे वो सरकार का हो या पूंजीपतियों का, का खात्मा। इस दृष्टिकोण से तो वर्तमान अवस्था में समाजवाद जो सरकार के संरक्षण में उत्पादन के केंद्रीयकरण को बढ़ावा दे रहा है, शर्तिया बुरी बात है। पंडित नेहरू द्वारा भारतीय लोगों पर लादा गया समाज का समाजवादी ढांचा मार्क्सवाद की ही एक किस्म है और हमारे संविधान के उदारवादी नींव-स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व-के खिलाफ है।

साम्यवादी रुझान वाली तीन मुख्य पार्टियां-कांग्रेस, पीएसपी और कम्युनिस्ट पार्टी, सभी आर्थिक ताकतों के केंद्रीयकरण का एक समान नजरिया रखती हैं। इस तरह से तीनों ही स्वतंत्रता की विरोधी दिखाई देती हैं। वे समानता की गारंटी देने की क्षमता नहीं रखती क्योंकि वे भविष्य की पीढ़ियों के सुख के लिए वर्तमान को दांव पर लगाने और आदर्शों की चकाचौंध में निजता को भुलाने के सिद्धांतों के समर्थक हैं। जनसंघ ने स्वतंत्रता, स्वतंत्रता के जरिये समानता के आधार पर एक नीतिगत घोषणापत्र तैयार करने की कोशिश की है। लेकिन उनके कार्यक्रम को व्यक्ति और समाज को लेकर उदारवादी सोच पर आधारित सिद्धांत की जरुरत है। ऐसे किसी आधार के बगैर उनके वर्तमान नारे मूल सोच से ही दूर होते चले जाएंगे। उदाहरण के लिए, जनसंघ ने आय और अनिवार्य कर्ज की सीमा की बात को स्वीकारा है। निजता के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता। (these can not be squared with individuality).

भूमि सुधार में उदारवाद सीमा निर्धारण की बात करेगा, क्योंकि भूमि की मात्रा सीमित है और यह अनर्जित आय पर भी करों को लादने की बात करेगा। यह हेनरी जॉर्ज के सिद्धांत की तर्ज पर भूमि पर निजी अधिकार की सीमा भी तय करेगा। अगर इस तरीके से दूसरी पंचवर्षीय योजना को नए सिरे से तैयार किया जा सकता है तो यह अकेले, साझेदारी में या सहकारिता या संयुक्त स्टॉक कंपनियों में रोजगार को प्रोत्साहन देगा। निजी संपत्ति बची रहेगी, लेकिन सरकारी नीतियों के तहत इसका लोगों के बीच और अधिक उदार तरीके से वितरण हो सकेगा।

निजी संपत्ति का संरक्षण होगा, लेकिन सरकारी नीतियों के चलते इसका वितरण लोगों के बीच समान रुप से और ज्यादा उदारवादी तरीके से होगा। कारोबारी और औद्योगिक वर्ग को शत्रु मानकर खत्म करने की कोशिश नहीं होगी, बल्कि उनकी गतिविधियों को सभी के लिए समान अवसरों के आधार पर नियंत्रित किया जाएगा, जो उत्पादन को अधिकतम करेगा और बिना किसी रुदन या जोर जबर्दस्ती के समान वितरण को भी प्रोत्साहित करेगा।

समाज पर पूंजीवादी वर्ग का आधिपत्य नहीं होगा, क्योंकि एकाधिकार नियंत्रित होगा और संपत्ति भी सीमित। कामकाजी वर्ग को संपत्ति हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा और वह निजी रोजगार की दिशा में काम करने लगेगा। बैंकिंग क्षेत्र सहकारिता के सिद्धांतों पर आधारित होगी और सरकार के हस्तक्षेप को खत्म कर दिया जाएगा। बैंकिंग को बिना ब्याज की लागत (at cost without interest) पर कामकाज के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। उत्पादकों के पास मौजूद वर्तमान संपत्ति और पूंजी को ब्याजमुक्त करों की जमानत के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा। अर्थशास्त्र और राजनीति में इसी राह पर चलकर ही नये उदारवादी दर्शन पर सोचा जाना चाहिए और उसे लागू किया जाना चाहिए।

वर्तमान चुनाव अभियान के दौरान इस सोच की बुद्धिजीवी मतदाताओं के सामने प्रदर्शन को अच्छा और उत्साह जगाने वाला प्रतिसाद मिला। उम्मीद की जा सकती है कि उदारवादी अध्ययन के नये केंद्र स्थापित किए जाएंगे, जो सार्वजनिक मत पर ध्यान केंद्रित करके मतों का एक नया माहौल तैयार करेंगे, जो कि अर्थशास्त्र और संस्कृति में निजी स्वतंत्रता के लिए ज्यादा फायदेमंद हो।

- मार्च 1957, द इंडियन लिबर्टेरियन से साभार