संस्थागत परिवर्तनों को प्रोत्साहन - जेसन सोरेंस

'आज़ादी समर्थक अभियान' की पैट्री फ्रीडमैन द्वारा की गई आलोचना मूलतः सही है। कम से कम तीस साल हो गए जबकि शैक्षिक अर्थशास्त्र में मुक्त-बाजार के विचार का वर्चस्व रहा है। आज़ादी समर्थक विचारकों के पास पर्याप्त धन है और प्रभाव भी। इन तमाम प्रोत्साहक घटनाओं के बाद भी सरकार का कुल आकार बढ़ता ही जा रहा है। अमेरिका में दोनों ही राष्ट्रीय दल, वाकई शब्दों में न सही काम के लिहाज से तो सरकार के आकार को बढ़ाने और आज़ादी को कम करने के ही काम के प्रति समर्पित हैं। सही विचार और उनके प्रभावी तरीके से प्रचार ने राजनीति में पर्याप्त बेहतर परिवर्तन नहीं किए हैं। हमें विचार और उनका उचित तरीके से प्रचार की जरुरत है, लेकिन केवल इतनी ही रणनीति पर्याप्त नहीं होगी।

यह दावा गलत होगा कि विचारों का कोई मायने नहीं होता या लोकतांत्रिक राजनीति आज़ादी को प्रोत्साहन देने में हमेशा ही नाकाम होती है। एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक उदाहरण ब्रिटेन का 1846 के कॉर्न लॉ का निरस्तीकरण था। यह एक ऐसा बड़ा कदम था जिसने वैश्वीकरण की नींव रखी थी। अपनी ही पार्टी के विरोध और तत्काल नेतृत्व छीन लिए जाने के बावजूद प्रधानमंत्री रॉबर्ट पील ने ब्रिटेन के अनाज प्रशुल्क को विपक्ष के समर्थन के साथ वापस ले लिया था। इस मामले में पील के मुक्त व्यापार के पक्ष में कदमों ने व्यापार के उस मानक मॉडल के आकलन को विफल कर दिया था, जिसके मुताबिक आयात-प्रतिस्पर्धी उत्पादक, निर्यातकों और उपभोक्ताओं की तुलना में बेहतर तरीके से संगठित होंगे और इसलिए द्विपक्षीय व्यापार उदारीकरण का आकार बहुत ही छोटा रखा जाना चाहिए। यह सच है कि ब्रिटेन के मैनचेस्टर इलाके तक ही सीमित बढ़ते कपड़ा उद्योग के कॉर्न लॉ लीग के विरोधियों को समर्थन के बगैर या डेमोक्रेटिक पार्टी विरोधी फिग पार्टी (अमेरिका) के समर्थन के बगैर उदारीकरण संभव नहीं था। फिर भी अंतिम परिणाम में विचार का महत्व था।

समकालीन राजनीति के अधिकांश मामलों में विचार पर हित हावी हो जाते हैं। उन नीति निर्माताओं को यह बात समझाना और मुश्किल हो जाती है कि आज़ादी से समृद्धि और जनकल्याण संभव है, जो उन संगठित हितों से प्रभावित हों जो विशेष रियायतें चाहते हों। 'सामूहिक कार्रवाई की समस्या' हमें यह समझाने में मददगार होती हैं कि क्योंकर केवल संकीर्ण हित संगठित होकर नीतिगत जीत हासिल करेंगे और क्यों यह सब नागरिकों की कीमत पर होगा। हित समूह ये जीत हासिल कर सकते हैं क्योंकि मतदाता दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र और सार्वजिनक नीतियों से बहुत गहरे तक और न सुधरने की हद तक अनजान होते हैं। मतदाताओं को शिक्षा देने की कोशिश निराशाजनक है, क्योंकि उन्हें राजनीतिक जानकारी के इस्तेमाल और सीखने के लिहाज से प्रोत्साहन उपलब्ध नहीं हैं।

स्वतंत्रतावाद को आमहित वाले राजनीतिक दर्शन के तौर पर परिभाषित किया जा सकता है। इसलिए, हमें उम्मीद करना चाहिए कि तमाम अन्य गुणों को भुलाते हुए स्वतंत्रतावाद विशेष हितों के लिहाज से हमेशा राजनीतिक तौर पर अहितकारी होगा। इसलिए फ्रीडमैन का यह कहना सही है कि नीति निर्माताओं के प्रोत्साहन के लिए जरुरी है कि संस्थाओं में आधारभूत परिवर्तन करना होंगे। संस्थाओं में परिवर्तन के लिए हमें रणनीतिक विचारों के बारे में इस तरह की बहस की जरुरत है।

एक विचार संविधानों में संशोधन करके सरकार में वीटो के अधिकार वाले लोगों की संख्या में इजाफा है। वेरोनिक डी रुगी ने पाया कि अमेरिका में विभाजित सरकार के दिनों में, सरकारी खर्च तुलनात्मक तौर पर कम तेजी से बढ़ा। निश्चित तौर पर, वीटो के अधिकार वाले लोग सरकार के आकार को बढ़ाने के प्रयास की दिक्कतें बढ़ा देते हैं, खास तौर पर इसके नियामक और दंडात्मक उपाय। सरकार की आर्थिक छाप को कम करने वाला एक स्थायी संस्थागत उपाय विकेंद्रित करारोपण के साथ वित्तीय संघवाद (fiscal federalism) है। अधिक आय वाले देशों में अमेरिका पहले ही वित्तीय संघवाद का आदर्श मामला है और इसका संघवाद वक्त के बाद धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। इसके अलावा, संविधान संशोधन तो नीतियां बदलने से भी मुश्किल काम है। जितने ज्यादा महत्वाकांक्षी परिणाम का हम प्रयास करते हैं, हमारी नीतियां उतनी ही जोखिम भरी होना चाहिए। फ्रीडमैन फ्रीस्टेट प्रोजेक्ट (एफएसपी) को कम जोखिम और कम इनाम वाली रणनीति करार देते हैं। एफएसपी, न्यू हैम्पशायर के राजनीतिक विकास के भविष्य के लिए हजारों आज़ादी समर्थकों को इस कम आबादी वाले स्थान में लाने का प्रस्ताव करता है। इस रणनीति के पीछे तर्क सामूहिक काम की समस्या को आज़ादी के पक्ष में लाने का है। कारण चाहे जो हो-आनुवांशिक परिवर्तन (genetic mutation), पर्यावरण अस्थिरता (environmental fluctuation) या अनियमित मौका (random chance)-लगभग हर समाज में अल्पसंख्या में ऐसे लोग मिल ही जाएंगे जो संपत्ति बनाने के आर्थिक और स्वयंसेवी तरीके को मूलतः अन्यायपूर्ण मानने वाले और इस दिशा में कुछ करने के लिए प्रोत्साहित भी होने वालों से इसे हासिल करने के राजनीतिक, लाचारी भरे तरीके देख ही लेते हैं। जब तक वे अल्पमत में हैं उनको गुटबाजी, खर्च, मतदान हर जगह मुंह की खानी पड़ेगी। ये सभी भौतिक तौर पर एकजुट होकर कम से कम संगठित विशेष हितों से टक्कर लेकर ड्रॉ की उम्मीद तो कर ही सकते हैं या कई महत्वपूर्ण जीत भी हासिल कर सकते हैं।

इस बात के सबूत हैं कि न्यू हैम्पशायर में एफएसपी की रणनीति का इस्तेमाल वोट बटोरने और नीतियों में परिवर्तन के लिए किया जा रहा है। कई आज़ादी समर्थकों ने पिछले साल रॉन पॉल की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी को समर्थन दिया था। जो जमीनी स्तर पर आज़ादी समर्थक अभियान के लिए रॉन पॉल के पक्ष में मतदाताओं का एक गुट खड़ा कर देता है। चुनाव के प्रकार (प्राथमिक बनाम गुटबंदी/primary vs. caucus), मतदान और उम्मीदवारों की संख्या को नियंत्रित करने के अध्ययन के दौरान मैंने पाया कि 2008 की रिपब्लिकन प्राइमरी में न्यू हैम्पशायर ने रॉन पॉल को किसी भी प्रांत की तुलना में वोटों की ज्यादा हिस्सेदारी दी और मैंने यह भी पाया कि न्यू हैम्पशायर के वे कस्बे जिनमें ज्यादा फ्रीस्टेट समर्थक मौजूद थे, वहां गैर फ्रीस्टेट समर्थकों ने भी रॉन पॉल के ही पक्ष में वोट डाले, जिसका अभिप्राय यही है कि कुछ फ्रीस्टेट अपने पड़ौसियों पर भी अपना प्रभाव डाल रही हैं। न्यू हैम्पशायर में फ्रीस्टेट समर्थक और उनके स्थानीय सहयोगी सड़कों पर यातायात नियंत्रण के लिए लाल बत्तियों पर कैमरों के नियम को हराने, होम स्कूलों के उदारीकरण, मैरिजुआना के चिकित्सकीय इस्तेमाल के कानून की राह (अब तो कानून बनने को है) आसान करने में महत्वपूर्ण या यूं कहें निर्णायक साबित हुए। फ्रीडमैन का तर्क है कि समुद्र में आवास (seasteading) की उनकी योजना संभावनाओं से भरी है और हो सकता है कि ऐसा ही हो। यहां विचार सरकार के अस्तित्व के लिए जरुरी 'माहौल या पर्यावरण' में बदलाव का है। सरकार को नागरिकों द्वारा बनाई गई सरकार से चुनौती दिलवाकर। साफतौर पर, पूरी दुनिया में सरकार के सामने मौजूद प्रोत्साहन में व्यवस्थागत परिवर्तन किसी भी मुक्त समाज के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।

इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि सरकार के आकार को लेकर व्यवस्था में मौजूद कारक बहुत शक्तिशाली हैं। 19वीं सदी में सरकारें आमतौर पर छोटी हुआ करती थीं और पश्चिमी देशों में तो पूंजीवादी संस्थाओं ने सामाजिक तौर-तरीकों और निरंकुश शासन के युग को समाप्त कर दिया। 20वीं सदी में कुछ पूंजीवादी समाज सर्वाधिकारवाद और कल्याण कार्यों से उपजी जड़ता का शिकार हो गए। पश्चिम में सरकार का आर्थिक क्षेत्र बढ़ता ही चला गया, हालांकि आज़ादी के लिहाज से रंगभेद, नस्लभेद का समापन और महिलाओं की दासता से मुक्ति बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए। 20वीं सदी का अंत होते-होते सरकार का विकास कुछ धीमा और बदल सा गया, जब मूल्य नियंत्रण और कारोबार पर सार्वजनिक नियंत्रण कम लोकप्रिय होता गया, जबिक स्वास्थ्य सेवाओं, श्रमिकों के हितों और खर्च को लेकर हितों में इजाफा होता गया। 1990 में यह आम धारणा थी कि इंटरनेट की निजता और आर्थिक वैश्वीकरण सरकारों को आर्थिक लूटखसोट से रोकेंगे, लेकिन वास्तविकता इस धारणा से बिलकुल भिन्न है। बड़ी सरकारें कई लोगों की सोच से भी ज्यादा लचीली निकलीं। सरकार के आकार में इजाफा सरकार की प्रौद्योगिकी में किसी गुणात्मक, व्यवस्था के स्तर पर परिवर्तन के बगैर कम नहीं होगा।

निश्चित तौर पर बाधाएं ढेर सारी हैं। जरुरत से बड़े आकार की सरकारें अपना बचाव करने की कोशिश करेंगी, ऐसा वे किसी खुली हिंसा की बजाय ज्यादा प्रतिबंधों के जरिये ही संभावित दिखती है। कर के स्वर्गों (tax havens) के खिलाफ जी-20 के युद्धस्तर के अभियान को ही देख लीजिए, उन तमाम अधिकार क्षेत्रों को खुली चुनौती है जो सरकार के करों से बचाव के तरीकों से बैंकों का बचाव करते हैं। निजता के अधिकार क्षेत्र तो पहले ही घुटने टेक चुके हैं। फ्री स्टेट और समुद्र में आवास दोनों को ही इसी किस्म की राजनीतिक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। अन्यायपूर्ण संघीय हस्तक्षेप को रोकने के लिए फ्री स्टेट, सोवियत संघ और यूगोस्लाविया के पतन के दौर में बाल्टिक गणराज्यों और स्लोवेनिया द्वारा अपनाई गई रणनीतियों को अपना सकते हैं। संघीय सरकार से हिंसा की बजाय इसका जवाब राजनीतिक और आर्थिक दबाव से ही दिए जाने की संभावना है। लेकिन ऐसे कदम पर अड़े रहने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की दरकार है, जो फिलहाल मौजूद नहीं है।

समुद्र में आवास की योजना को समुद्र में रहने के काम में आर्थिक तौर पर लाभ के पैमाने का फायदा उठाना होगा। बिजलीघरों जैसी पूंजी प्रधान परियोजनाएं कम से कम आज की तारीख में तो समुद्र में तैरते प्लेटफॉर्मों पर बनाना बहुत महंगी हैं। आज के आर्थिक विकास में सबसे अहम भूमिका निभाने वाला अर्थव्यवस्थाओं का समूह (agglomeration economies) आजकल लाखों और रहवासियों के लिए महानगरों की ओर भागता है, यह संख्या समुद्र में आवास के लिहाज से काफी उम्मीदें जगाने वाली है। हर किसी अन्य व्यक्ति की ही तरह आज़ादी के समर्थक एक आधुनिक कल्याणकारी सरकार को आज़ादी के लिए अलास्का जैसे सुदूर इलाके में जाने के पक्षधर नहीं हैं। यही वह इलाका है जहां फ्री स्टेट फायदा उठा सकता है।

यह समस्याएं अजेय नहीं हैं। इनका मतलब यही है कि आज़ादी के समर्थकों की तमाम संस्थागत रणनीतियां कारगर होने में कुछ वक्त लगेगा। हमें इस बात को लेकर ज्यादा रचनात्मक सोचना होगा कि कैसे कारगर विचारों को कारगर राजनीति का हिस्सा बनाया जाए।

 


जेसन सोरेंस फ्री स्टेट प्रोजेक्ट के संस्थापक हैं, जिसका उद्देश्य 20 हजार लोगों को ले जाकर न्यू हैम्पशायर में बसाना है ताकि ज्यादा निजी स्वतंत्रता के लिहाज से स्थानीय राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश की जा सके। बफेलो की स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क में वे राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। वह अलगाव, संघवाद और राजनीतिक अर्थशास्त्र पर लिख भी चुके हैं और पढ़ा भी चुके हैं। वे येल यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में पी.एचडी. हैं।