लोक अभियान से परे - पैट्री फ्रीडमैन
भूमिकाः भविष्य के एक नाटकीय आदर्शलोक या थोड़ी सी आज़ादी हासिल करने की बजाय वास्तविक तौर पर मुक्त समाज में रहना मेरी दिली तमन्ना है। मैं इस खयाली पुलाव के साथ आज़ादी की वकालत करता रहा कि महज इससे ही यह संभव हो जाएगा। हालांकि, हाल ही में मैंने मुक्त समाज बनाने को अपना पूर्णकालिक काम बना लिया है और इससे मुझे अपने आरामकुर्सी में बैठकर हासिल दर्शन की बनिस्बत एक नया नाटकीय नजरिया मिला है। मेरा नया नजरिया यह है कि कई आज़ादी के समर्थकों, समूहों और थिंक टैंकों (और दुखद तौर पर कई बार मुझे मिलाकर) का समर्थन का रास्ता कुछ और नहीं बस समय की बर्बादी है।
बहस ने हमारे सिद्धांतों को और अधिक तराश दिया है। शैक्षिक अनुसंधान ने हमारी समझ का दायरा विस्तृत कर दिया है। लेकिन जहां तक वास्तविक मुक्त देश की कल्पना है तो वह अभी भी हकीकत से दूर ही है। हमारी बहस न केवल एक तय रणनीति से आती है बल्कि इसके पीछे हमारा सहज अंतर्ज्ञान भी शामिल है। 'लोक अभियान'-आपसी चर्चा के साथ राजनीतिक परिवर्तन का एक सहज ज्ञान है, यह पाषाणकाल के शिकारी युग से हमारे भीतर है, जब तमाम राजनीति निजी नहीं थी। आधुनिक दुनिया में, हालांकि, खराब नीतियां, इंसान की मंशा का नहीं उसके काम का परिणाम हैं। उन्हें बदलने के लिए हमें यह जानना होगा कि आखिर इंसानों की आपसी बातचीत से यह कैसे जन्म लेती हैं। उसके बाद ही हमें प्रोत्साहन के उस जाल को बदलना होगा जिससे लोगों का व्यवहार प्रभावित होता है। प्रोत्साहन बदले बगैर सीधे तौर पर लोगों या उनके विचारों को प्रभावित करने की कोशिश, जैसे अमेरिका की लिबरटेरियन पार्टी, रॉन पॉल अभियान या शैक्षिक अनुसंधान, इस लिहाज से वास्तविक विश्व आज़ादी हासिल करने के लिए निरुपयोगी है।
इस निबंध में, मैं हमारी पथभ्रष्ट सहजवृत्ति, प्रोत्साहन आधारित तरीके के कुछ सिद्धांतों का वर्णन करुंगा और फिर उन सुधारों की बात भी करुंगा जो इससे सामने आएंगे। मेरी उम्मीद तो यही है कि आज़ादी के लिए बहादुरी के साथ काम कर रहे लोगों को मैं ज्यादा बुद्धिमानी के साथ काम करने के लिए भी मना सकूंगा। साथ ही, मैं साफ तौर पर यह भी स्वीकार करना चाहूंगा कि जहां एक ओर मैं लोक अभियान की आलोचना कर रहा हूं, वहीं मेरे कई कदम इससे ही प्रभावित होते हैं। यह एक गहरा पूर्वाग्रह है और ठीक करने के लिहाज से बहुत कठिन-मैं इससे उबरने की कोशिश करता हूं और मुझे दुनिया में यह दिखाई भी देता है, क्योंकि मैं इसे खुद में देखता हूं।
क्या है लोक अभियान या जन अभियान?
हमारा दिमाग कई ऐसी विशिष्ट बातों के अनुकूल है जो हमारे पाषाण युग के शिकार वाले दिनों के लिहाज से सही हैं, लेकिन आज के आधुनिक युग से जरा भी मेल नहीं खाता। बढ़ते मोटापे को ही लीजिए-हम अपने पुराने पड़ चुकी सहजवृत्ति के अनुसार ही खाते-पीते हैं, एक कभी न आने वाले अकाल से पहले दावत उड़ाते हैं, नई दुनिया की कैलोरी जरुरतों से तालमेल बिठाए बगैर।
इसी तरह, कई लोगों में जन अर्थशास्त्र (folk economics) की सहजवृत्ति होती है। इसमें कई पूर्वाग्रह शामिल होते हैं, जैसे विदेशी विरोधी और पूरक काम (make-work) को लेकर पूर्वाग्रह। ये धारणाएं जाहिर तौर पर गलत, सर्वव्यापक और किसी भी तरह के तर्क से परे होती हैं। साथ ही इसे पूर्व कृषि अर्थव्यवस्था (pre-agricultural economy) के पहलुओं से जोड़ा जा सकता है। जो इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि यह विकसित अनुकूलन (evolved adaptation) है। जहां एक और आर्थिक तौर पर सुशिक्षित आज़ादी के समर्थक बड़ी खुशी के साथ लोक अभियान के पक्षधरों पर एकतरफा हमला बोल देते हैं, हम लगातार उस काम में लगे रहते हैं, जिसे मैं जन जागरण कहता हूं। इंसानी कबीलों के शुरुआती दिनों में हर सामाजिक ढांचे में इतने कम लोग थे कि कोई भी नीति को बदल सकता था। अगर आपको भैंसे के मांस का बंटवारा पसंद नहीं तो आप बदलाव का एक वैकल्पिक प्रस्ताव पेश कर सकते थे, कुछ लोगों का सहयोग हासिल कीजिए और आप अपनी मंशा को साकार कर सकते थे। कामयाबी के लिए जरुरी था कि तकरीबन दस साथी खोज लिए जाएं-और आज जब हमें लाखों-करोड़ों लोगों के समर्थन की दरकार है, आज भी वही आदिम प्रवृत्ति हमारी सोच को प्रभावित करती है। जब हम शाम के अखबार में पढ़ते हैं कि हम एक और दीवालिये को मदद करने जा रहे हैं, हम अपने दोस्तों से इसकी शिकायत करते हैं, कई विकल्प सुझाते हैं और संशोधन के लिए जनमत तैयार करने की कोशिश करते हैं। यह आदिम व्यवहार आधुनिक राजनीतिक सुधारों के लिए उतना ही बेहतर मार्गदर्शक है, जितना कि हमारा आदिमकालीन स्वाद शक्कर और वसा खाने पर नियंत्रण के लिए है। लोक अभियान राजनीतिक अभियान को भ्रष्ट करता है। इसके चलते कार्यकर्ता बहुत ज्यादा भाषणबाजी करते हैं, बहस करते हैं और मतांतरण की कोशिश करते हैं और वास्तविक दुनिया में जरुरी ज्यादा कुछ नहीं करते। हमारी प्रणाली में मौजूद प्रोत्साहन की गतिविधियों को बढ़ावा देने की बजाय हम मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं या फिर कबीलाई राजनीतिक और बौद्धिक नेताओं को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
यह निराशा का विषय नहीं है। इसके विपरीतः यह तो एक बड़ी उम्मीद का कारण है। इससे तो यही पता चलता है कि ज्यादा स्वतंत्र देश बनाने में आज़ादी के समर्थकों की नाकामी की वजह काम के मुश्किल होने की बजाय उनके प्रयासों की गलत दिशा है। सहजवृत्ति की बजाय विश्लेषण के इस्तेमाल से शायद हमें एक ऐसा बेहतर सहारा और स्थान मिल सकता है, जहां से हम इस बड़े काम के लिए आगे कदम बढ़ा सकते हैं।
यथार्थवादी अभियान के सिद्धांतः
दुनिया बहुत जटिल है और सुधारों के मार्गदर्शन के लिए कई सिद्धांत मौजूद हैं, इसलिए यहां मैं केवल कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांतों की ही बात करुंगा।
अधिकार में निष्क्रियता हैः आज़ादी के समर्थक के तौर पर मैं अनुभव के आधार पर प्रोत्साहन के महत्व को आसानी से मान लेता हूं। ज्यादा मुश्किल और बेहद महत्वपूर्ण यह है कि आज़ादी समर्थकों के सिद्धांतों और वर्तमान सरकारों के आकार और कार्य क्षेत्र के बीच के बड़े अंतर को भी इस अनुभवजन्य सबूत के तौर पर स्वीकारा जाए कि अधिकारों का भी महत्व है। राजनीतिज्ञ राजनीतिक वर्ग के अधिकार को सुरक्षित बनाए रखने में जाहिर तौर पर, लगातार और सर्वव्यापक तौर पर विशेषज्ञ हैं। आज़ादी के कई समर्थकों के लिए यह नैतिक लिहाज से अवैध है, लेकिन सत्ता की हकीकत भरी दुनिया में दुखद तौर पर नैतिकता का बहुत कम ही प्रभाव है। अगर हम बार के स्टूल और ब्लॉग्स पर ही दुनिया के सत्ता समीकरण के दर्शन से आगे बढ़ना चाहते हैं तो सत्ता संतुलन में काफी जड़ता है। हम उसे केवल उम्मीद या गुस्से से नहीं बदल सकते-हमें काफी सावधानी के साथ नपे-तुले कदम उठाना होंगे।
लोकतंत्र वह जवाब नहीं हैः वर्तमान में लोकतंत्र को राजनीतिक तंत्र का एक मापदंड सा मान लिया गया है। दुर्भाग्य से यह आज़ादी के समर्थक देश के लिहाज से बेमेल है। इसमें पर्याप्त व्यवस्थागत खामियां हैं, जिनका अन्य तंत्रों में काफी खयाल रखा गया है, और यह आज़ादी समर्थकों के लिए खासतौर पर कई मुसीबतों का कारण भी बनता हैः
- अधिकांश लोग स्वभावतः आज़ादी के समर्थक नहीं होते। डेविड नोलान का कहना है कि सर्वे के अनुसार ज्यादा से ज्यादा 16 फीसदी लोग आज़ादी में यकीन रखते हैं। 1971 में लिबरेटेरियन पार्टी की स्थापना करने वाले नोलान, अब आज़ादी के समर्थकों से आह्वान करते हैं कि वे उम्मीदवारों के चयन की रणनीति छोड़ दें! आज़ादी समर्थकों की सोच के लिहाज से बेहद लोकप्रिय और सरकार के खिलाफ जबर्दस्त विरोध के वक्त भाग खड़े होने वाले रॉन पॉल का भी नामांकन हासिल करने का जरा सी भी आस नहीं थी। उनके 'जबर्दस्त' प्रदर्शन के बाद भी वे रिपब्लिकन पार्टी के सम्मेलन में प्रतिनिधियों में से महज 1.6 फीसदी का ही समर्थन हासिल कर पाए थे। हममें से अधिकांश जब तक एड़ी-चोटी का जोर नहीं लगाते, तब तक हमारा चुनाव जीत पाना मुश्किल ही है।
- लोकतंत्र आज़ादी के समर्थकों के खिलाफ एक धांधली है। उम्मीदवार अपने चुनाव अभियान के लिए चंदा और वोट उगाहने के लिए भविष्य के सपने दिखाते हैं। आज़ादी के समर्थक (और उनके ईमानदार उम्मीदवार), जो बिकाऊ नहीं हैं, अभियान के लिए संसाधनों की कमी से जूझते हैं और इसलिए चुनावों में उनके सामने भारी आंतरिक तौर पर भारी नुकसान की स्थिति होती है।
आज़ादी के समर्थक अल्पसंख्यक हैं और चुनावों में उनका प्रदर्शन उम्मीद से कम ही होता है, इसलिए चुनाव जीतना तो एक निराशाजनक कोशिश है।
आकस्मिक व्यवहारः राजनीति के तीन अमूर्त स्वरुपों पर विचार कीजिएः 1.नीतियां-कानून का विशिष्ट समूह, 2.संस्थाएं-एक समूचा देश और उसका कानूनी और राजनीतिक तंत्र, 3.माहौलः सभी देश और उनका वह माहौल जिसमें वे प्रतिस्पर्धा करते हैं और फलते-फूलते हैं।
लोक अभियान नीतियों और संस्थाओं को विशिष्ट मानवीय प्रयोजन का ही फल मानता है। लेकिन नीतियां ज्यादातर संस्थाओं का आकस्मिक व्यवहार होती हैं और खुद संस्थाएं वैश्विर राजनीतिक माहौल का आकस्मिक व्यवहार होती हैं।
संस्थाएं, नीतियां नहीं- मैं मानता हूं कि आज़ादी के समर्थक (मुझे मिलाकर) ऐसे हल खोजने में भारी ऊर्जा व्यर्थ गंवा देते हैं, जो कभी भी न तो लागू होंगे और न ही किसी नीति को प्रभावित कर सकेंगे। जरुरी नहीं कि ये हल आज़ादी के समर्थकों के ही हल हों-अधिकांशतया वे बहुमत के लक्ष्यों को प्रभावी तरीके से हासिल करने की कोशिश करते हैं। हम अपने लोगों के लिए योजनाएं बनाते वक्त सहजबोध और लोक अभियान का रास्ता अपनाते हैं। दुर्भाग्य से समस्या यह नहीं है कि हमारे सांसदों के पास अच्छे विचारों का अभाव है, समस्या यह है कि लोकतंत्र में विचार चुनने का तंत्र दोषपूर्ण है क्योंकि राजनीतिज्ञों का पूरा ध्यान प्रोत्साहन पर होता है। इसलिए जब हम अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कई हफ्तों तक बहस में उलझे रह सकते हैं, नीतियों का मूल्यांकन करने वाले सांसदों के लिए प्रभावी होना प्राथमिकता वाला मापदंड नहीं होता।
आज़ादी के समर्थक हमारे संसाधनों में से अधिकतर का इस्तेमाल तो नीतियों के विश्लेषण और विकल्प सुझाने में ही कर देते हैं। लेकिन किसी नीति विशेष के लिए आंदोलन तो कीमतों के मामले में शिकायत की ही तरह है-और यह भुल जाना कि इसका निर्धारण आपूर्ति और मांग के ही आधार पर होता है। नीति विश्लेषण निश्चित तौर पर एक रोचक क्षेत्र है, राजनीतिक प्रदर्शन सुधारने का एक तरीका, ठीक आर्थिक प्रदर्शन सुधारने के लिए मूल्य सूचकांक की तरह। और फायदा भी तय है. नीतियों को लेकर बहस वास्तविकता से भी ज्यादा महत्वपूर्ण लगती है। यह हमारा संज्ञान भरा पूर्वाग्रह ही है कि हम मान लेते हैं कि हमारी आवाज एक डनबार के शिकारी कबीले के हर एक व्यक्ति की आवाज है और यही वजह है कि हम राष्ट्रीय स्तर की किसी बात को लेकर टिप्पणी करने में जुट जाते हैं, फिर भले ही कोई हमारी बात सुन भी न रहा हो। (अब आप ब्लॉग और बार के स्टूल पर होने वाली चर्चा को समझ गए होंगे!) यह बहस एक मृगमरीचिका की तरह होती है, जो हमारा ध्यान आधारभूत ढांचे में उन जरुरी सुधारों से बंटा देती हैं जो वास्तव में हमें अपने जीवन में ही आज़ादी हासिल करने में मदद कर सकते हैं।
माहौल, संस्थाएं नहीं- सरकार किसी भी उद्योग की ही तरह है, जहां देश अपने नागरिकों को सेवाएं प्रदान करते हैं, लेकिन इसमें कुछ दुर्भाग्यपूर्ण लक्षण भी हैं। यह एक भौगोलिक विभाजन वाला एकाधिकार है, और चूंकि पूरी जमीन ले ली गई है, इस उद्योग में प्रवेश में बहुत बड़ी बाधा भी है। नई सरकार शुरू करने के लिए आपको पुरानी सरकार को हराना होता है, जिसका मतलब है एक युद्ध, एक चुनाव जीतना या फिर एक क्रांति। इसमें उपभोक्ता के लिए बहुत बड़ी अवरुद्धता है-उत्प्रवास और आप्रवास (emigration and immigration) की राह में बाधाएं हैं और देश बदलने की भारी आर्थिक और भावनात्मक कीमत चुकाना पड़ती है। इन लक्षणों के कारण यह उद्योग भीषण तौर पर अप्रतिस्पर्धी बन जाता है। इसलिए यह देखकर हैरत नहीं होती कि वर्तमान फर्म उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के नये तरीके खोजने की बजाय उनका शोषण करती हैं।
इस विश्लेषण में नैतिक बहस को टाल दिया जाता है और इसके वास्तविक परिणाम साफ हैं-अगर समस्या अप्रतिस्पर्धी बाजार है, तो हल इसे और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। यह उन रणनीतियों के व्यर्थ होने की बात को भी उजागर कर देता है जो इस दिशा में फायदेमंद नहीं। यह भले ही आकर्षित करती हो और ठीक भी लगती हो, प्रभावी नहीं है। बिना प्रतिस्पर्धी दबाव के हमारे संस्था दोषपूर्ण नीतियों को जन्म देते हैं, जो राजनीतिक वर्ग को लाभ पहुंचाती हैं, वे नीतियां नहीं जो प्रबुद्ध अर्थशास्त्रियों की सहमति को दर्शाती हैं। हमें सरकार में और अधिक प्रतिस्पर्धा की दरकार है, न कि शैक्षिक कागजों या दिमागी माथापच्ची की।
एक प्रयोगात्मक माहौल वाला तंत्रः कानून और अर्थशास्त्र के क्षेत्रों से रुबरु होने से पहले मैं मानता था कि एक अच्छे समाज को हासिल करने की राह में मुख्य दिक्कत हमारी साझी नैतिकता और मूल्य हैं। तो आप उनको कानून के तौर पर लिखकर रख लीजिए और समझ लीजिए कि आपका काम तो हो चुका। यह देखने में आता है कि भले ही हम अधिकारों की परिभाषा पर सहमत हों, कानून बनाने और उसका पालन कराने का कोई साफ सीधा रास्ता नहीं है। कानून का पालन कोई छोटा-मोटा विचार नहीं है, यही सबसे मुश्किल भाग है। बात तब और भी बिगड़ जाती है जब नीतियां बनाना आसान बात हो। जब हम उन्हें संस्थाओं के आकस्मिक व्यवहार के तौर पर देखते हैं तो बात मुश्किल से असंभव हो जाती है। (इसलिए वे हमें कुछ और लंबे रास्ते से ले जाएंगे)
चूंकि अच्छी सरकार को लेकर हमारे पास कोई भी पूर्व जानकारी नहीं है, अच्छे समाज की तलाश के लिए न केवल प्रयोग बल्कि कुछ सिद्धांतों की भी जरुरत पड़ेगी-कई नई संस्थाओं को आजमाना होगा, यह देखने के लिए कि वह वास्तविकता में कैसे काम कर पाती हैं। इसके लिए संस्थाओं को तंत्र में शामिल करना होगा, जो उनके आसानी से गठन, परीक्षण और तुलना की अनुमित देगा। आसानी से प्रवेश और प्रदाता (provider) को बदलने की मंजूरी देने वाला एक शासकीय उद्योग इन छोटे स्तर के प्रयोगों की अनुमति देगा। इस तरह के तंत्र के कई लाभ होंगेः
- यह विभिन्न तंत्रों की विशेषताओं पर बहस के लिए एक विशिष्ट, वास्तविक उदाहरण देगा। आखिर कितने अरबों-खरबों शब्दों वाले शैक्षिक कागज, मुक्त बाजार के फायदे को एक शब्द 'हांगकांग' से बेहतर तरीके से बता पाएंगे?
- नए तंत्र के संभावित उपभोक्ता इसे महज कपोल कल्पना की तरह देखने के भौतिक और भावनात्मक आधार पर महसूस कर सकेंगे, जो किसी भी बदलते हुए दिमाग पर ज्यादा प्रभाव डालेगा। सोवियत संघ के नागरिकों के लिए पश्चिमी देशों की महज एक सैर ही सोवियत दुष्प्रचार की कलई खोल देने के लिहाज से पर्याप्त होती थी।
- इससे वैकल्पिक प्रणाली या तंत्र के प्रस्तावकों (जैसे आज़ादी के समर्थक) को अपने साकार जल्द से जल्द जीने का मौका मिल जाएगा क्योंकि उन्हें पूरे देश की सहमति पाने के प्रयास की बजाय (जो शायद कभी संभव नहीं होगी) एक नये समाज का प्रयोग करने के लिए एक छोटे से समूह की आवश्यकता होगी।
- यह एक अनवरत, विकासवादी प्रक्रिया है जहां समाज वक्त गुजरने के साथ सीखते हैं और दुनिया को बदल डालते हैं।
- यह इस सोच पर नहीं चलती कि हर एक के लिए एक तय अच्छा समाज है। लोग अपने आदर्शों को दूसरों पर थोपे बगैर भी अपना सकते हैं। इससे न केवल आज़ादी को विविधता मिलती है, बल्कि हमारे लक्ष्य और तरीके एक अच्छे समाज का भी गठन करते हैं।
एक मोर्चे की भूमिका (the role of a frontier)- जैसा कि ब्रायन केपलान कहते हैं वर्तमान संस्थाओं के भीतर काम करते वक्त ढांचे और नीतियों में परिवर्तन समान होते हैं, क्योंकि आप किसी नीति को लागू करके ही ढांचे को बदल सकते हैं। केवल खाली स्लेट से ही आप मूलभूत हितों से टकराए बगैर, जो किसी भी नये प्रयास का विरोध करते हैं क्योंकि यह उनकी ताकत को कम करता है, बेहतर संरचना तैयार कर सकते हैं। इतिहास गवाह है कि प्रयोग के लिए मोर्चा एक आधार रहा है।
मोर्चे की जरुरत के सकारात्मक पहलू हैं, क्योंकि लोगों का एक ऐसा उपसमूह (जो इस वक्त बेहद असंतुष्ट है) है जिनके लिए कुछ नया करने प्रेरणा ही उत्साह देने वाली है। मैं भले ही बुरी सहजवृत्ति की बात करुं, लेकिन सहजवृत्ति के विरोध की बजाय उनके साथ काम करना आसान है, इसलिए अपनी ओर कुछ होना अच्छी बात है।
साथ ही, मोर्चा स्थापित करने के लिए पहला कदम है कोई नया विचार कीजिए, इसका प्रसार कीजिए और इसमें आपका साथ देने वालों के साथ एक समूह बनाइए-लोक अभियान में भी यही प्रक्रिया और सहजवृत्ति काम आती है। फर्क इतना है कि आपकी रणनीति ऐसी हो कि पर्याप्त मात्रा में लोग आपसे जुड़ें, न कि ऐसी रणनीति जिसे लागू करने के लिए ही लाखों लोगों की दरकार हो। समस्या सहजवृत्ति नहीं है, समस्या इनका पुनर्मूल्यांकन किए बगैर इनका पालन है। हमें यह देखना होगा कि आधुनिक दुनिया के लिहाज से वह बेमानी तो नहीं।
भाषणबाजी से ज्यादा महत्वपूर्ण है प्रौद्योगिकी - दुनिया की आबादी में बढ़ोत्तरी के ग्राफ में शून्य जनसंख्या वृद्धि दर पर भाषणबाजी और जन्मदर नियंत्रण प्रौद्योगिकी के तुलनात्मक प्रभाव पर विचार कीजिए। मानवीय पूर्वाग्रह और सोच बदलने के प्रयास की तुलना में प्रौद्योगिकी से प्रोत्साहन में बदलाव का ज्यादा दूरगामी परिणाम होता है। दुर्भाग्य से इंसान के लिए मान-मनुहार की तुलना में प्रौद्योगिकी भी काफी नई वस्तु है और इसीलिए इस मामले में सहजज्ञान रणनीति कम ही बन पाती है।
लोक अभियान के विकल्प
फ्री स्टेट प्रोजेक्ट (एफएसपी)- एफएसपी का उद्देश्य आज़ादी के 20 हजार कर्मठ कार्यकर्ताओं को न्यू हैम्पशायर लाना है। अब तक 9000 इससे जुड़ चुके हैं और 700 तो वहां पहुंच भी चुके हैं। इन चंद लोग भी 700 में से 4 प्रतिनिधियों का चयन करेंगे, जो इस सच्चाई की ओर इशारा करता है कि पूरे 20 हजार लोगों का राज्य की राजनीति पर कितना गहरा असर होगा। मुझे इस बात को लेकर शंका है कि एफएसपी कितनी आज़ादी हासिल कर पाएगा, क्योंकि संघीय स्तर पर कई प्रतिबंध और कर मौजूद हैं और राज्यों के अधिकार का मसला 1865 में ही दृढ़तापूर्वक सुलझा दिया गया था। एक नया मोर्चा खोलने की बजाय यह एक ऐसी धरती पर है जो सरकारी है और जिस पर दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना का नियंत्रण है। यह परंपरागत लोकतंत्र के दायरे और उसकी खामियों के बीच कार्यरत है। फिर भी, एफएसपी को अब तक के आज़ादी समर्थकों के संशोधनों की नाकामी की प्रतिक्रिया के तौर पर ही जानबूझकर बनाया गया है। और यह लोक अभियान के लिहाज से काफी उन्नत कोशिश है। यह विशाल आज़ादी समर्थक अभियान, जो शायद कभी संभव नहीं होगा, की बजाय हमारी शक्तियों पर ध्यान देता है। यह अंतहीन भाषणबाजी की बजाय तत्काल कार्रवाई पर आधारित है। अमेरिका के भीतर होने के कारण आज़ादी एक सीमा तक ही हासिल हो सकेगा, लेकिन इससे मुश्किलें भी कम हो जाती है, इसलिए यह कम जोखिम वाला और कम लाभ वाला विकल्प है।
गोपनीयता से उपजी अराजकता (crypto anarchy)- टिम मे के क्रिप्टो अनार्किस्ट मेनिफेस्टो में 1988 में ही प्रस्तावित यह विचार कहता है कि अनाम अंकीय नगदी सरकार के अधिकारों पर अंकुश लगा सकती है। यह लिखने के बाद से कम्प्यूटर और नेटवर्किंग प्रौद्योगिकी बड़े पैमाने पर विकसित हुए हैं, अंकीय नगदी अभी पूरी तरह से अपनी पैठ नहीं बना पाई है। डिजिटल लेनदेन का फिलहाल मुख्य प्रभाव केवल रिकार्डिंग उद्योग पर ही पड़ा दिखता है और 'आर्थिक लेनदेन पर करारोपण और नियंत्रण' पर नहीं, जैसा कि मे ने संभावना जताई थी। अंकीय गोपनीयता (digital crypto) के गणितीय औचित्य (mathematical elegance) के बावजूद हमारी अनुरुप दुनिया (analog world) सबसे ज्यादा खर्च और आय वाला स्थान है। जहां करारोपण किया जा सकता है और जिसका नियमन भी किया जा सकता है। साथ ही इसकी भौतिक मौजूदगी इस पर नियंत्रण का मौका दे देती है-अवतार चाहे जितना भी आधुनिक क्यों न हो, इसके मालिक के कंधों के बीच की जगह में एक खंजर की मौजूदगी इसे बुरी तरह से प्रभावित करेगी। आभासी जीवन शैली (virtual lifestyle) के लिहाज से जहां इंटरनेट एक बहुत बड़ा कदम रहा है, लेकिन पूरी जीवनशैली ही इस पर आधारित होने में अभी वक्त लगेगा। वक्त गुजरने के साथ मे की कई भविष्यवाणियां सही साबित होंगी। हां, यह काम धीरे-धीरे और इंसानी मसलों के सीमित हिस्से में होगा। फिर भी साइबरस्पेस, मूलतः ही प्रौद्योगिकी के जरिये आज़ादी हासिल करने के काम को गति देने वाला एक उन्नत तरीका है।
बाजार की अराजकता (market anarchism)- मशीनरी ऑफ फ्रीडम जैसी किताबों में किए गए वर्णन के मुताबिक यह एक ऐसा तंत्र है जिसे प्रतिस्पर्धी निजी कंपनियां ही परिभाषित करती हैं और जहां फैसला और कानून का पालन भी इन्हीं के द्वारा कराया जाता है। यह एक अपरिचित लेकिन सुंदर विचार है जो कम वक्त में न्याय नहीं कर सकता। कारण साफ है कि यह इंसान की सोच से ज्यादा इंसान के काम पर निर्भर है। इसका शानदार तर्क प्रभावी नीतियां बनाने वाले संस्था के निर्माण की समस्या को लगभग हल कर देता है। और यह अपने आप में पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) है, केवल संस्था नहीं। यह प्रतिस्पर्धा, नवविचारों और सीमांकन के जरिये कई कानूनी तंत्र विकसित करता है। दुर्भाग्य से ऐसे समाज की ओर उत्तरोत्तर बढ़ने का कोई साफ रास्ता नहीं है। प्रस्तावक इस थोथी उम्मीद को हवा देते हैं कि वक्त के साथ सरकारें धूमिल होती जाएंगी, लेकिन हम पहले ही देख चुके हैं कि अपना अस्तित्व बरकरार रखने में यह कितनी कुशल हैं। राजनीतिक अपरिपक्वता वाले दिमाग को किसी और तरीके से हासिल करने के लिहाज से अराजकता से दोबारा मुलाकात अच्छी है। उदाहरण के लिए...
समुद्र में जगह बनाना (seasteading)- महासागर को नई सरहद के तौर पर खोलने के लिए समुद्र में जगह बनाना मेरी सलाह है। जहां हम नई संस्थाओं से प्रयोग करने के लिए नए शहर-प्रांत बना सकते हैं। इसमें नई सरकार को बनाने में आने वाली बाधाओं को कम किया जा सकता है। समुद्री सतह पर निर्माण हालांकि महंगा शगल है, लेकिन किसी युद्ध, चुनाव या क्रांति से फिर भी सस्ता ही पड़ेगा। प्रवेश में कम बाधा का मतलब होगा छोटे-छोटे प्रयोगों की ज्यादा आजादी। साथ ही, समुद्र की तरल सतह के चलते शहर में सारे भवनों का निर्माण भी खंडों में किया जा सकता है, जिन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सके। यह अभूतपूर्व गतिमानता हमें देश छोड़े बगैर घर छोड़ने का मौका दे देगी, साथ ही इससे सरकारों की प्रतिस्पर्धा में भी इजाफा होगा।
यह योजना तत्काल काम वाली है, कोई उम्मीद या बहस की इसमें गुंजाईश नहीं है। यह हमारे पास उपलब्ध लोगों का ही इस्तेमाल कर लेती है और इसमें बड़े पैमाने पर लोगों की दरकार नहीं होती, साथ ही यह सीमाओं पर होने वाले किसी टकराव को भी जन्म नहीं देती। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अधिकार क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा को तेज कर देती है। यह एक नया देश नहीं बनाएगी, बल्कि लोगों को आकर्षित करने वाले माहौल के देशों के बीच नई सोच के साथ प्रतिस्पर्धा को जन्म देगी। किसी भी बाजार की तरह परीक्षण और त्रुटि (trial and error) की प्रक्रिया से हमें ऐसे हल मिल जाएंगे, जिनकी हमने कल्पना तक नहीं की थी। हम जानते हैं कि यह उपभोक्ताओं के लिए अच्छा है। समुद्र में जगह बनाने को तय कामयाबी नहीं माना जा सकता, लेकिन यह एक बड़ी समस्या है और इसका जवाब भी आसान नहीं होगा। दो बड़े खतरे खर्च और समुद्री पर्यावरण पर संकट है और संभावना है कि सरकारें इसमें दखल देंगी। बाद वाली बात तो किसी भी सुधार के लिए प्रणालीगत जोखिम (अगर वे समुद्र में नये शहर में भी हस्तक्षेप करते हैं, तो कोई स्थान सुरक्षित नहीं है) है, लेकिन पहले वाली बात एक झक्की जोखिम की तरह है, जिसे विविध रुप दिया जा सकता है, अगर यह किसी आज़ादी परियोजना का हिस्सा है।
मैंने इसी राह को आगे बढ़ाने के लिए सीस्टिडिंग इंस्टीट्यूट की स्थापना की, अगर आप इस बारे में जानकारी हासिल करने में रुचि रखते हैं तो हमारी वेबसाइट, अक्सर किए जाने वाले सवाल (FAQ) और किताब देख लें।
निष्कर्षः अगर आज़ादी के समर्थन में लोक अभियान पर बर्बाद किया जाने वाला हमारे उत्साह, विचार या पूंजी का एक हिस्सा भी ज्यादा वास्तविक राह की ओर कर दिया जाए तो हमारे पास जीवन में आज़ादी को हासिल करने का ज्यादा वास्तविक अवसर होगा। हमें धर्मांतरणों में वक्त गंवाने की बजाय सुधार के रास्तों का सजग रहकर विश्लेषण करना चाहिए। विशिष्ट रणनीतियों को लेकर आप मेरे विचारों से सहमत हों या नहीं, मेरा वक्त बर्बाद नहीं कहा जाएगा अगर मैं ज्यादा से ज्यादा आज़ादी समर्थकों को लोकतंत्र के फायदों से माथापच्ची करने से रोक सकूं। या फिर सरकार के स्थायित्व को लेकर लोगों का अज्ञानता का रोना रोने की बजाय बता सकूं कि वे खुद इसे लेकर कितने अज्ञानी हैं। और उन्हें यह सोचने के लिए तैयार कर सकूं कि कैसे हम बाड़ में बंद सत्ता संरचना के बाहर पूरे तंत्र में बदलाव कर सकते हैं, जो हमें वास्तविक तौर पर ज्यादा स्वतंत्र दुनिया की ओर ले जाएगा।
नोट्सः मैंने हाल ही में जोनाथन वाइल्ड और माइक गिबसन के साथ मिलकर सरकार को बाजार में सुधार के काम में मदद करने के लिए एक ब्लॉग लेट ए थाउजैंड नेशंस ब्लूम [27] की शुरुआत की है। इस पर हम अतिथियों की टिप्पणियों का स्वागत करते हैं। मैंने कुछ ऐसा काम भी खोज निकाला है, जो सीधा इसी क्षेत्र से ताल्लुक रखता है और हम और संदर्भ का भी स्वागत करेंगे, यहां मेरी जानकारी में मौजूद कुछ पेश हैं-
- केन बिनमोरः गेम थ्योरी एंड द सोशल कांट्रेक्ट वॉल्यूम I, वॉल्यूम II
- ब्रूस बेनसनः द एंटरप्राइज ऑफ लॉः जस्टिस विदाउट द स्टेट
- पैट्री फ्रीडमैनः सीस्टिडिंगः हाउ टू होमस्टीड द हाई सीज
- डेविड फ्रीडमैनः मशीनरी ऑफ फ्रीडम (डेविड मेरे पिताजी हैं)
- हैंस-हर्मन होपः डेमोक्रेसी, द गॉड देट फेल्ड
- अलबर्ट हर्शमैनः एक्जिट, वॉइस एंड लॉयल्टी-रिस्पोंसेस टू डिक्लाइन इन फर्म्स, ऑर्गेनाइजेशन एंड स्टेट
- अरनोल्ड किंगः कम्पीटिटिव गवर्नमेंट वर्सेज डेमोक्रेटिक गवर्नमेंट(पीडीएफ)
- मेनसियस मोल्डबग का ब्लॉग अनक्वालिफाइड रिजर्वेशंस, उदाहरण के लिए अगेन्स्ट पॉलिटिकल फ्रीडम या सार कंडेंस्ड मोल्डबगरी (मेनसियस अधिकांशतया बातों के उतार-चढ़ाव का कोई भरोसा नहीं होता, आपकी नमकदानी से भी यही होता है)
- मेनकर ओलसनः द राइज एंड डिक्लाइन ऑफ नेशंस, शुरुआत फिलिप ग्रीनस्पन के लांग रिव्यू से कीजिए।
आभारः क्रिस रैश, चक ग्रिमेट, डेनियल होल्ट, जेम्स होगन, माइक गिबसन, माइकल हार्टल, माइकल कीनान, लिज लेसी, जस्टिन लेम और वेन ग्रेमलिच का इस निबंध के शुरुआती लेखन पर टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
पैट्री फ्रीडमैन सीस्टिडिंग इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक हैं, जो अंतरराष्ट्रीय जलसीमा में प्लेटफॉर्म बनाकर लोगों को स्थायी आवास मुहैया कराने की योजना रखती है। इसमें सैद्धांतिक तौर पर विविध सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं के अध्ययन का मौका है, खासतौर पर स्वाधीनता के समर्थकों के लिए। फ्रीडमैन गूगल के पूर्व इंजीनियर हैं और ट्रांस ह्यूमेनिस्ट ग्रुप ह्यूमेनिटी + के बोर्ड सदस्य रहने के अलावा प्रतिस्पर्धात्मक पोकर के अच्छे खिलाड़ी भी रहे हैं।
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