क्या खपत, असमानता के संशयवादियों के लिए अंतिम प्याला है? - लेन केनवर्दी
उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ आंकड़ों के मुताबिक 1979 में कर कटौती के बाद अमेरिकी निवासियों के शीर्ष एक फीसदी लोगों की औसत आय लगभग 340,000 डॉलर थी। 2006 तक यही आय बढ़कर 1,200,000 डॉलर तक पहुंच गई थी। इसकी तुलना में निचले 60 फीसदी घरों में औसत आय में 1979 के 29,000 डॉलर की तुलना में हल्का सा इजाफा होकर यह 35,000 डॉलर हो सकी। इस दौरान कुल कमाई के लिहाज से जहां शीर्ष एक फीसदी की आय 7 फीसदी से बढ़कर 16 फीसदी हो गई, वहीं निचले तीन स्तरों के लोगों की आय 36 फीसदी से गिरकर 28 फीसदी हो गई। यह आय असमानता में पर्याप्त बढ़ोत्तरी है। बहुत कम ही सामाजिक वैज्ञानिक इस हकीकत से इनकार करते हैं। उनके बीच की बहस का मुद्दा लक्षणों, समय, आकार और कारणों तक ही सीमित होती है।
लेकिन इस बात को लेकर काफी कम सहमति है कि क्या, और अगर ऐसा है तो कितने स्तर तक, हमें इस घटनाक्रम को लेकर चिंतित होना चाहिए। असमानता को लेकर संदेहवादियों (skeptics) ने इसके महत्व को कम आंकने के लिए ढेर सारे कारण गिनाए हैं-असमानता तो मुक्त विकल्पों की देन है, जो बात महत्वपूर्ण है वो है मौकों में समानता, आय असमानता के उपाय ऊपर की ओर तरक्की की अनदेखी करते हैं, ज्यादा असमानता से आर्थिक विकास में तेजी आती है, किसी एक देश पर ही ध्यान केंद्रित करने से राष्ट्रीय सीमाओं को लेकर पागलपन सा आ जाता है, आदि आदि।
आय और खपत के अंतर को विल विलकिंसन जोर देकर स्पष्ट करते हैं 'जहां तक मैं बता सकता हूं,जब ढेर सारे लोग असमानता को लेकर चिंतित हों, तो उनकी चिंता आमतौर पर वास्तविक जीवन स्तर में असमानता को लेकर होती है-जिंदगी के भौतिक सुखों को लेकर...एक व्यक्ति या घर का जीवन स्तर आय की बनिस्बत खपत के स्तर से तय होता है।...आंकड़ों के विभिन्न समूहों और विश्लेषण के तरीकों से अलग-अलग परिणाम हासिल होते हैं, लेकिन खपत असमानता के अधिकतर मामले दरअसल स्थायित्व या हल्के इजाफे को लेकर ही होती है।'
पहले के केटो के निबंधों, के अलावा इसी जगह विलकिंसन कुछ और तर्क भी देते हैं। लेकिन मैं इसी बिंदु पर बात को केंद्रित करना चाहता हूं। मैं इसे आकर्षक नहीं मानता। कारण साफ है कि खपत की असमानता का विश्लेषण एक ऐसी समस्या से प्रभावित है जिसने आय असमानता के अध्ययन को भी प्रभावित किया था, और वह है शीर्ष पर मौजूद लोगों के बारे में सीमित आंकड़े। खपत के आंकड़े कन्ज्युमर एक्सपेंडिचर सर्वे (सीईएक्स) से आते हैं। आय के मामले में अपने समकक्ष करंट पॉपुलेशन सर्वे (सीपीएस) की ही तरह सीईएक्स को भी वितरण प्रणाली के शीर्ष मौजूद लोगों की गतिविधियों को दर्ज करने के लिहाज से सक्षम नहीं बनाया गया है। चूंकि यही क्षेत्र आय असमानता में तेजी का केंद्र है, अनुसंधानकर्ताओं ने खपत असमानता के स्तर को कम आंकने की गलती कर दी होगी।
फिर भी मान लीजिए कि बहुत ज्यादा अमीर लोग अपनी अतिरिक्त आय के काफी कम हिस्से की खपत करते हैं। तो क्या हमें इस नतीजे पर पहुंच जाना चाहिए कि हम जिस आर्थिक असमानता को लेकर चिंतित हैं, वह बहुत ज्यादा नहीं बढ़ी है? नहीं। इस आय को खर्च नहीं किया जाना इसे अप्रासंगिक नहीं बना देता। अगर मेरी आय तेजी से बढ़कर मिलियन डॉलर तक पहुंच जाती है तो इसका यह मतलब कतई नहीं है कि मेरी घरेलू खपत भी इसी अनुपात में बढ़ जाएगी। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि यह अतिरिक्त आय कहीं गुम हो जाएगी। हो सकता है कि मैं पढ़ाने का काम करके अपना ज्यादा वक्त अनुसंधान को देने लगूं। या फिर कोई अवकाशकालीन मुफ्त काम (unpaid sabbatical)। मेरी पत्नी अपनी नौकरी छोड़ सकती है और बच्चों को ज्यादा वक्त दे सकती है या फिर ज्यादा स्वयंसेवा कार्य से जुड़ सकती है। या फिर हम अपने धन को निवेश कर सकते हैं, जो आने वाले वर्षों में पर्याप्त आय दे सकता है। यह इस बात को सुनिश्चित कर सकता है कि हम अपने बच्चों को महंगे निजी कॉलेजों में भेज सकेंगे। या हम वक्त से पहले सेवानिवृत्ति ले सकते हैं। या बस संपदा बनाकर मरने से पहले अगली पीढ़ी को सौंप जाएं। इनमें से कोई भी इस्तेमाल आंकड़ों के सर्वे में आपको खपत की मद में देखने को नहीं मिलेगा (केवल कॉलेज के भुगतान, हालांकि वह भी काफी वर्ष बाद ही देखने को मिलेगा)। लेकिन वह हमारे जीवन स्तर को निश्चित तौर पर ऊंचा कर देंगे।
मुद्दा यह है कि आय की कीमत होती है, चाहे उसे तत्काल खर्च न किया जाए। राजनीतिक स्वतंत्रता को संभावित रुप से उपयोगी सादृश्य (potentially helpful analogy) के तौर पर देखिए। राजनीतिक स्वतंत्रता की लगभग हर गणना या वर्गीकरण में अमेरिका को हर मामले में सबसे ज्यादा संभावित अंक हासिल होते हैं। अमेरिकी इस स्वतंत्रता का बहुत कम इस्तेमाल करते हैं। राष्ट्रपति के चुनाव में मताधिकार हासिल लोगों में से लगभग आधे लोग ही इसका इस्तेमाल करते हैं। हर एक साल छोड़कर होने वाले चुनावों और स्थानीय चुनावों में तो यह हिस्सेदारी और भी कम हो जाती है। मतदान करने वालों में से भी कई को मुख्य मुद्दों का पता ही नहीं होता और सोच के लिहाज से उनका नजरिया बुरी तरस से प्रभावित होता है। दूसरी तरह से भी चंद अमेरिकी ही राजनीति में भाग लेते हैं, जैसे पार्टी या अन्य राजनीतिक संगठन में सक्रिय भागीदारी, किसी उम्मीदवार का प्रचार करना या फिर किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार को चुनावी चंदा। दूसरे शब्दों में कहें तो अमेरिकियों का एक छोटा सा हिस्सा ही उपलब्ध राजनीतिक स्वतंत्रता का पूरा इस्तेमाल करता है। अगर हम राजनीतिक स्वतंत्रता को लोगों के इसके इस्तेमाल से आंकते हैं, तो हमें अपने देश को उपलब्ध राजनीतिक स्वतंत्रता के लिहाज से कम ही आंकना चाहिए।
हालांकि, मुझे नहीं लगता कि यह सही आकलन होगा। इस बात से काफी फर्क पड़ता है कि अमेरिकियों को मताधिकार, कहीं एकत्रित होने, किसी राजनीतिक संगठन से जुड़ने और प्रदर्शन करने का अधिकार हासिल है, भले ही वो अपनी इस स्वतंत्रता का पूरा इस्तेमाल न करते हों। इसी तरह से अगर शीर्ष पर मौजूद लोगों की आय में तीन गुना से चार गुना का इजाफा होता है तो इस बात का महत्व है, भले ही वो इस अतिरिक्त आय में से कुछ ही हिस्से का ही खपत बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करते हों।
मुद्दा यह भी है कि मध्य और निचले आर्थिक वर्ग की बढ़ती खपत का आर्थिक पोषण कैसे होता है। खपत का एक सरल जीवनचक्र-जब युवा हों तो कर्ज लो, जब आय बढ़े तो भुगतान करो-एक बात है। लेकिन जब निचले 99 फीसदी लोगों में खपत असमानता में बढ़ोत्तरी को गरीब और मध्यम आय वाले अमेरिकियों द्वारा उधार लेकर दबाया जाए तो यह चिंता का विषय होना ही चाहिए।
मैं यह सुझाव नहीं दे रहा हूं कि हमें आय और खपत के बीच के अंतर को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं होना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है कि शीर्ष पर आय में इजाफे ने आवास के एक छलावे का निर्माण किया जिसमें महंगे मकानों के दाम और अधिक बढ़ गए, खासतौर पर शहरों के भीतर और आसपास, जहां शीर्ष एक फीसदी आय वाले लोगों का असंतुलित भाग रहता है। इस बात से फर्क पड़ता है कि वालमार्ट और चीन से किया जाने वाले आयात ने कम आय वाले अमेरिकियों के लिए कई उपभोक्ता सामानों की कीमत को कम कर दिया। इस बात से फर्क पड़ता है कि अब कई लोगों की ईमेल-सेलफोन के जरिये संचार, इंटरनेट के जरिये सूचना और केबल टीवी आईपोड के जरिये मनोरंजन तक पहुंच बन गई है। और जब सरकारी सेवाएं भौतिक सुखों में इजाफा करती हैं-उदाहरण के लिए, हिंसक अपराधों में कमी या स्वास्थ्य बीमा तक सबकी पहुंच। मैं अपने बाद वाले बिंदु को अपनी ताजा टिप्पणी में इस तरह रखता हूं।
एक ऐसे अमेरिका की कल्पना कीजिए जहां पर उच्च कोटि की सार्वजनिक सेवाओं के कारण खपत का स्तर ऊंचा उठ जाता हैः अधिकांश नागरिक अपने बच्चों को उच्च कोटि की देखभाल के बाद अच्छे पब्लिक स्कूलों और फिर अच्छे कॉलेजों में भेज सकते हैं। पूरी जिंदगी बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाएं उनकी पहुंच के भीतर हैं। वे अपने काम के स्थान तक साफ, सक्षम सावर्जनिक परिवहन या सड़क के जरिये बिना किसी ट्राफिक जाम के पहुंचते हैं। उनका आसपास का परिसर साफ-सुथरा और स्वास्थ्यप्रद है। पार्क, म्यूजियम, लाइब्रेरी और अन्य सार्वजनिक स्थान हैं। सूचना, संचार और मनोरंजन के साधन उन तक हाईस्पीड ब्रॉडबैंड के जरिये सस्ते में पहुंच रहे हैं। हर साल उनको चार सप्ताह की भुगतान वाली छुट्टी (paid leave) या बीमारी पर भी भुगतान वाली छुट्टी मिलती है और किसी बच्चे या परिजन की देख-रेख के लिए एक साल तक की भुगतान छुट्टी मिलती है। अगर आय असमानता का स्तर आज से कम भी हुआ और हमारे पास ऐसे सीईओ, वित्त प्रबंधक और मनोरंजनकर्ता हुए जो एक साल में करोड़ों डॉलर कमा लेते हों तो ऐसा समाज हमारे वर्तमान समाज से कम असमान होगा।
मैं इस बात से सहमत हूं कि हमें आर्थिक असमानता के परिवर्तनों का जायजा लेने के लिए खपत पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन हमें शीर्ष पर मौजूद लोगों के बारे में बेहतर आंकड़े भी चाहिए। और भले ही खपत असमानता में हल्का सा ही इजाफा हुआ हो, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आय असमानता इतना बड़ा विवाद का विषय है।
लेन केनवर्दी यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना में समाजशास्त्र और राजनीतिक शास्त्र के प्रोफेसर हैं। उनका काम गरीबी, असमानता, गतिशीलता (mobility), रोजगार, आर्थिक विकास और सामाजिक नीतियों के कारणों और परिणामों पर केंद्रित रहा है। केनवर्दी इगेलिटेरियन कैपिटलिज्मः जॉब्स, इंकम्स एंड ग्रोथ इन एफ्ल्युएंट कंट्रीज (2004) और जॉब्स विद इक्वेलिटी (2008) के लेखक हैं। उन्होंने मेडिसन की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कोन्सिन से समाजशास्त्र में पी.एचडी. की। इससे पहले उन्होंने बी.ए. की डिग्री समाजशास्त्र में हारवर्ड यूनिवर्सिटी से हासिल की थी।
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