सरकार और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम

गरीबी उन्मूलन का मुद्दा दुनियाभर की सभी साम्यवादी व समाजवादी सरकारों की प्राथमिकता में होती है। दूरदर्शिता व अच्छी नीति अपनाने की बजाए वे अपनी 'अच्छी' नियत का हवाला देती हैं। अपने आप को लोक कल्याणकारी सरकार घोषित करने के चक्कर में सरकारें अक्सर गरीबों का नुकसान करने लगती हैं। आम तौर पर सरकारें गरीबी उन्मूलन के लिए मुफ्त भोजन, मुफ्त आवास, मुफ्त शिक्षा, मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं आदि आदि प्रदान करना शुरू कर देती हैं। इनमें से अधिकांश योजनाएं या तो फंड के आभाव में दम तोड़ देती हैं या फिर जनता पर नए कर आरोपित करने का कारण बनती है। इसके अलावा उक्त सभी योजनाओं के निर्माण से लेकर उनके क्रियान्वयन तक तमाम कर्मचारियों व अधिकारियों की नियुक्ति और उसके बाद उन कर्मचारियों और अधिकारियों पर नजर रखने के लिए पुलिस, उनके ऊपर इंटेलिजेंस, उनके ऊपर एक जवाबदेह मंत्रालय व उस मंत्रालय के काम को सुचारु रखने के लिए मंत्री व उसके कर्मचारियों की फौज की नियुक्ति की जाती है। 
 
इस प्रकार, अंततः गरीबी उन्मूलन के लिए शुरू की गई योजना अपने वास्तविक ध्येय से भटककर मंत्रालय के लिए कोष जमा करने व नौकरियों के सृजन की योजना बनकर रह जाती है। फिर दौर आता है कर्मचारियों के वेतन, भत्ते, पेंशन, उनके आश्रितों की देखभाल का। इन सब के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था के लिए अमीर व उद्योगपतियों पर अतिरिक्त कर थोपे जाते हैं। अतिरिक्त कर चुकाने के लिए उद्योगपति कर्मचारियों की छंटनी कर देते हैं जिससे बेरोजगारी बढ़ने लगती है। कम से कम कर्मचारियों से ज्यादा से ज्यादा काम लेना मजबूरी बनती जाती है। अंततः सरकार को चुकाए जाने वाले अतिरिक्त कर की राशि भी उत्पाद के मूल्य में जोड़ ली जाती है। इस प्रकार, पहले से ही परेशान आम जनता और अधिक त्रस्त हो जाती है।
 
दूसरी तरफ, मुक्त बाजार समर्थक सरकारें जनता को निशुल्क भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं आदि प्रदान करने की बजाए उन्हें स्वतंत्रता प्रदान करती हैं। उद्योग धंधों के लिए दोस्ताना माहौल तैयार करती हैं। करों का बोझ कम करती हैं और बाजार में प्रतिस्पर्धा पैदा की जाती है। निजी संपत्ति के अधिकार में वृद्धि करती हैं और पारदर्शी माहौल का निर्माण करतीं हैं। ज्यादा से ज्यादा उद्योग धंधों के स्थापित होने से ज्यादा रोजगार पैदा होता है व उत्पादन में वृद्धि होती है। इससे सरकार को और अधिक कर भी प्राप्त होने लगती है। लोग समृद्ध होने लगते हैं और प्रति व्यक्ति व्यय बढ़ने लगती है और नए स्कूल, अस्पताल आदि खुलने लगते हैं। फलस्वरुप जनता को उपरोक्त सभी चीजें सस्ती दरों पर और सुविधाजनक तरीके से प्राप्त होने लगती हैं। इस प्रकार, गरीब स्वतः ही अपनी समस्याओं का समाधान करने में सफल हो जाते हैं। 
 
 
- आजादी.मी

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