बंधन मुक्त कृषि मूल्य

9 मई, 1977 को लिखा बी. आर. शिनॉय का  यह निबंघ “कृषि मूल्य आयोग के मिथ्या तर्क” शीर्षक से यह निबंध छपा था. शिनॉय ने इस सिद्वांत का विरोध इस गलत धारणा को दूर करने के लिए किया कि मजदूरी की दरें बढ़ाने से बढ़ीं खाघान्नों की कीमतों मुद्रास्फीति में इजाफे का कारण बनती है। यह तो मुद्रा के एक हाथ से दूसरे हाथ में जाने का साधारण मामला है जिसके तहत धन किसानों की जेब से होते हुए वितरण प्रणाली के जरिए होते हुए शहरी आबादी की जेब में जाता है।

12 अप्रैल 1977 नई गेहूं मूल्य नीति की घोषणा हुई थी जिसके अनुसार किसानों को खुले बाजारों से गेहूं की कीमतें प्राप्त होनी थी। नई नीति में कहा गया कि गेहूं मंडल के ढांचों को समाप्त कर किसानों और व्यापारियों को गेहूं इकट्ठा करने पर कोई नियंत्रण नहीं होगा। अतः कोई सरकारी खरीद कीमतें नहीं होगी। 110 रु. प्रति क्विंटल गेहूं की कीमत घोषित की गई, जो आधारभूत कीमत होगी। ये तभी लागू होगी जब बाजार में अच्छे भाव प्राप्त नहीं होगे। यह सरकारी मूल्य स्वागत योग्य था जिसने क्योंकि इससे पहले लागू दण्डनीय उपार्जन मूल्यों ने  उत्पादन को बढ़ाने पर रोक लगाई और खाद्यान्नों के आयात को बढ़ावा दिया।

प्रति क्विटंल 105 रु. से बेहतर कीमत किसानों को देने पर आम आपत्ति थी कि इसके परिणामस्वरूप साधारण कीमतों पर पड़ेगा और फिर इसके बाद मुद्रास्फीति में वृद्वि होगी। कृषि मूल्य आयोग (एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन या एपीसी) ने लगातार चार साल तक यही कीमतें निर्धारित की थीं.

इस सिद्वांत को बल नई मूल्य नीति से मिल सकता है जिसके अनुसार गेहूं की आवक खुले बाजारों में हो और कीमतें 105 रु. प्रति क्विंटल से ज्यादा मिले और गेहूं मण्डल समाप्त हो जाए, किन्तु यह सिद्वांत दोषपूर्ण तर्क पर आधारित है और इसमें सावधानीपूर्वक अनुसंधान का समावेश नहीं है। वर्तमान में देश के थोक व्यापार का 3.4 फीसदी हिस्सा गेहूं, 8.5 फीसदी गेहूं और चावल का और 10.7 प्रतिशत हिस्सा समूचे अनाज का है। गेहूं और चावल की कीमतों में वृद्वि या सभी किस्म के अनाज को साथ मिलाकर भी मूल्यों में वृद्वि की जाए तो साधारण मूल्य सूचकांक (जनरल प्राइस इंडेक्स या जीपीआइ) पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा जो मुद्रास्फीति का संकेतक और मापक है।

इस सूचकांक का बढ़ना अन्य व्यापारिक वस्तुओं पर निर्भर करता है जिसकी हिस्सेदारी थोक बाजार में 89.3 प्रतिशत या इससे अधिक है। इस तरह अगर देखा जाए तो कृषि मूल्य आयोग और उनके दल ने घोषणा करने के पूर्व विचार नहीं किया। इसमें कोई तर्क और अनुभवजन्य प्रमाण नहीं है कि अन्य व्यापारिक वस्तुओं की कीमतें गेहॅू, चावल या अन्य खाद्यान्नों की कीमतें एक दूसरे के साथ किस तरह आपस में संबंधित हैं। व्यापारिक वस्तुएं जिनका उत्पादन परस्पर निर्भर होता है, जैसे सूत और सूती वस्त्र इनका निर्धारण साधारणतः क्षणिक अनौपचारिक तत्वों द्वारा निर्धारित होता है। अन्य वस्तुओं का मूल्य निर्धारण खाद्यान्नों के मूल्यों द्वारा संचालित नहीं होता। मुद्रास्फीति एक वस्तु के मूल्य बदलाव द्वारा चलित नहीं होती चाहे वह अनियंत्रित या क्रियाशील हो।

मुद्रास्फीति पूरी तरह और हर हाल में एक मौद्रिक घटना है। यह राज्य सत्ता की वहज से होती है यानी यह राज्य का काम है न कि किसानों या साधारण व्यक्ति का। धन विस्तार तब होता है जब आय और पूंजी खातों में औसत सरकारी खर्च उसकी औसत आय से अधिक होता है। परिणामस्वरूप बजट घाटे की पूर्ति छापेखाने से नया धन प्राप्त कर या रिजर्व से ऋण लेकर की जाती है। धन विस्तार में फुलाव तब आता है जब राष्ट्रीय उत्पाद की भौतिक इकाई के मूल्यों में बढ़ोतरी होती है। जब यह प्रक्रिया चलती रहती है तब साधारणतः व्यापारिक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी और परिणाम स्वरूप सार्वजनिक मूल्य सूचकांक में बढ़ोतरी होती है। धन आपूर्ति से राष्ट्रीय उत्पाद की भौतिक इकाई में 3.10 गुना बढ़ोतरी हुई जिसका मूल्य 1954-55 में 1865 रु. था यह वर्तमान मुद्रास्फीति दौर का शून्य या आधार वर्ष था जो 1975-76 में 5,777 रू था और सार्वजनिक मूल्य सूचकांक 3.86 गुना बढ़ा। यह बात घ्यान में रखी जाएगी कि खाद्यान्नों की सरकारी खरीदी मूल्य का मुद्रास्फीति की प्रक्रिया में कोई स्थान नहीं है।

हम खाद्यान्नों की सरकारी खरीदी मूल्य के इतने अभ्यस्त हो चूके है कि हम चकित हो जाते जब हमे याद दिलाया जाता है कि खाद्यान्नों और अन्य कृषि संबंधी उत्पादो की स्वतंत्र बाजार में कीमतें देहातियों और किसानों का जन्मसिद्व अधिकार है, उसी प्रकार विशुद्व बाजार के अनुरूप श्रमिकों द्वारा किए गए कार्य के परिणामस्वरूप मजदूरी प्राप्त करना श्रमिकों का जन्मसिद्व अधिकार है और सरकारी खरीदी की कीमतों में खाधान्न उत्पादन करने वाले- देहातियों और किसानों की असली कमाई की कुर्की शामिल होती है। सरकारी खरीदी मूल्य की घटना का सामाजिक लेखा और आर्थिक सहायता प्राप्त खाघान्नों का वितरण मोटे तौर पर हम यह अतिरिक्त कीमत हम केन्द्रीय और राज्य के बजट से ले लेते है और संपूर्ण धन का उपयोग नगरीय जनता को भोजन के लिए कम कीमत पर बाजारों में वितरीत करते है।

भारतीय खाघ निगम को माल के हिसाब से 1976-77 के दौरान अनुमानतः 175 करोड़ रु. का सरकारी अनुदान दिया गया। देहातियों और किसानों से अधिक सहायता लेना अस्पष्ट है। राष्ट्रीय बाजार मंडलो क्षेत्रों में विभाजित है और क्षेत्रीय मूल्य (जो अकेले उपलब्ध है) जो बनावटी तरीके से कम है। इन कीमतों का अवलोकन करने पर हमें पता चलता है कि उत्पादकों द्वारा जो आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है वह सरकारी बजट में दी जाने वाली आर्थिक सहायता से अधिक होती है। आर्थिक प्रभाव के विचार अनुसार हमारे पास धन परिवर्तन की आसान क्रिया है जिसके अनुसार जो किसानों और देहातियों की जेब से वितरण प्रणाली द्वारा नगरीय जनसंख्या की जेब में पहुचता है। धन परिवर्तन की यह प्रक्रिया धन प्रवाह में कोई बदलाव नहीं लाती, परिणामस्वरूप हमारे पास मुद्रास्फीति को रोकने का कोई प्रभावी तरीका नहीं है। पूर्णधन प्रवाह जिस पर मुद्रास्फीति निर्भर करती है का उद्गम धन मुद्राखानों को बजट में होने वाले व्यय से होता है। धन प्रवाह और मुद्रास्फीति पर नियंत्रण इन व्ययों पर पाबंदी लगाकर किया जा सकता है। कृषि मूल्य आयोग की आय परिवर्तन की प्रक्रिया जो खाद्यान्न उत्पादकों से राशन की दुकानों पर होती है इसका प्रभाव मुद्रास्फीति प्रक्रिया पर नहीं पड़ता। कृषि मूल्य आयोग द्वारा प्रस्तावित कोई भी मूल्य क्रिया न तो मुद्रास्फीति का कारण है और ना ही उसे नियंत्रित करती है।

अनुभवजन्य सबूत इस विवरण को प्रतिपादित करते है। 1964-65 में होन वाली फसल के सरकारी खरीदी मूल्य से राष्ट्रीय उत्पाद की भौतिक इकाई के मूल्य प्रवाह के खिचाव में कोई इजाफा नहीं हुआ पर परिणाम स्वरूप सार्वजनिक मूल्य सूचकांक में वृद्वि हुई। उसके बाद से 1975-76 के खत्म होने तक राष्ट्रीय उत्पाद की भौतिक इकाई के धन प्रवाह में 2.2 गुना वृद्वि और सार्वजनिक मूल्य सूचकांक में 2.3 गुना वृद्वि हुई। मुद्रास्फीति द्वारा होने वाली मूल्यवृद्वि पर कोई प्रभाव नहीं पडा। 1973-74 में गेहूं की सरकारी खरीद मूल्य जो 105 रु. प्रति क्विंटल था उसमें भी कोई बदलाव नहीं हुआ उसी प्रकार धान की कीमतें भी 75 रु. प्रति क्विंटल रही।

लगातार आर्थिक कमी के कारण सार्वजनिक मूल्य सूचकांक में वृद्वि हुई। 1973-74 के खत्म होने पर 283.6 से जो 26 मार्च 1977 को 326 (1961-62=100) जो पूर्णतः कृषि मूल्य आयोग क मुद्रास्फीति के सिद्वांत के बचाव में है।

अगर हम गेहूं और अन्य खाद्यान्नों की कीमतों को नियंत्रित करना चाहते है तो इसका सही तरीका मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना होगा साथ ही घरेलू उत्पादन में वृद्वि और विदेशों से भरपूर आयात करना होगा। इस प्रक्रिया की पुच्च्िट के पक्ष में यह प्रमाण है कि लगातार बढ़ती हुई खाधान्न कीमतों में 1970-71 और 1975-76 में रोक लगी। घरेलू उत्पादन से बाजार की आवश्यकताओं की पूर्ति हुई। जब सरकारी खरीदी कीमतें कम होगी तब आवश्यकता से कम उत्पादन और मूल्य वृद्वि का खतरा बना रहेगा।

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