आर्थिक असमानता और अन्याय की मृगमरीचिका - विल विलकिंसन
बराक ओबामा के चुनाव से पहले आय में असमानता एक गर्म मुद्दा था। इसका ज्यादातर श्रेय न्यूयॉर्क टाइम्स के दमदार स्तंभकार और अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुगमैन को जाना चाहिए। अमेरिका में आय में असामनता को लेकर उनकी चेतावनी भरी आक्रामक किताब द कांशंस ऑफ ए लिबरल ने इस विषय को जनता के बीच काफी लोकप्रिय बना दिया, जो ओबामा के पद संभालने के बाद और मंदी के पैर जमा लेने के बाद काफी शांत हो गया था। क्रुगमैन का तर्क है कि आय में बढ़ते अंतर कारण ढांचागत समस्या नहीं मुख्य तौर पर राजनीतिक है। इस स्थिति में सुधार के लिए राजनीतिक खासतौर पर पुनर्वितरण से जुड़े कदम की जरुरत है। शायद एक डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति और वाशिंगटन में कांग्रेस में बहुमत के कारण ही क्रुगमैन जैसे समतावादी उदारवादियों (egalitarian liberal) में यह भाव पैदा हुआ होगा कि मामला अब सक्षम हाथों में है और वक्त आने पर इस पर ध्यान दिया जाएगा। लेकिन अब जबकि बेरोजगारी और बढ़ती गरीबी की दर दोहरे अंक में पहुंच गई है, इस बात पर ध्यान देना वक्त की जरुरत है कि क्या आय असमानता हमारी सबसे जरूरी समस्याओं में से एक है। यहां तक कि सरकार की भी किसी बात पर ध्यान देने की सीमित अवधि होती है। इस और अन्य दुर्लभ संसाधनों के ज्यादा सावधानी के साथ आवंटन का स्वागत ही होगा। इस निबंध में, मैं इन तीन बिंदुओं पर तर्क करुंगा:
- हममें से कई यह सोचने लगे हैं कि वास्तविक आर्थिक असमानता का स्तर, मामले की चर्चा के स्तर के लिहाज से कम है
- आर्थिक असमानता का स्तर किसी समाज में न्याय या अन्याय का अविश्वसनीय सूचक है
- असमानता हमारा ध्यान वास्तविक अन्यायों से बंटा देती है, जिन पर हम ज्यादा ध्यान नहीं देते।
इस मामले में मैं अपने पेपर, 'थिंकिंग क्लियरली एबाइट इकानॉमिक इनइक्वेलिटी',से कुछ निष्कर्ष निकालूंगा, जो केटो ने जुलाई में प्रकाशित किया था, हालांकि इसमें कुछ ताजा संदर्भ भी हैं और इनमें से अधिकांश नये।
सीधे मुद्दे की बातः किसी भी मुद्दे या कहानी पर सीधी बात के लिए जरूरी है कि हम मुख्य किरदार को पहचानें। आर्थिक असमानता पर अधिकांश चर्चाएं नाममात्र आय असमानता (nominal income inequality) की प्रवृत्ति पर केंद्रित होती है। नाममात्र आय असमानता की कहानी पर सबसे जानी-पहचानी बात यह है कि 1970 से आय असामनता स्थिर गति से बढ़ रही है और अब उस स्तर पर है जो बातों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के युग (Gilded age) के बाद से नहीं देखा गया। मैं मानता हूं कि यह कहानी शुरुआत से ही गलत पटरी पर चली गई है। जहां तक मैं बता सकता हूं, अधिकांश लोग जब आर्थिक असमानता को लेकर चिंतित होते हैं, तो वे वास्तव में जीवन स्तर में वास्तविक अंतर को लेकर चिंतित होते हैं-जिंदगी की वास्तविक भौतिक परिस्थितियों को लेकर। इस कहानी में आय की महत्वपूर्ण भूमिका तो है, लेकिन वह सहायक की है। किसी व्यक्ति या परिवार का जीवन स्तर आय के स्तर के बजाय खपत के स्तर से तय होता है। वर्तमान आय निश्चित तौर पर वर्तमान खर्चों की पूर्ति करती है, लेकिन कर्ज और बचत भी ऐसा करते हैं। अगर हम खपत के उपायों का सीधा निरीक्षण कर सकते हैं, हम कर सकते हैं, तो हमें शायद ऐसा करना चाहिए। जब हम ऐसा करते हैं, तो हम पाएंगे कि आय में असमानता की कहानी गुमराह करने वाली है और यह भी कि खपत में असमानता की प्रवृत्तियां काफी कम नाटकीय हैं। अलग-अलग आंकड़े और विश्लेषण की अलग विधियों के नतीजे अलग होते हैं, लेकिन खपत असमानता की अधिकांश कहानियों में स्थायित्व या तुलनात्मक तौर पर बहुत कम बढ़ोतरी आम बात है।
डेनियल स्टिक का कहना है अमेरिका में असमानता के पूर्ण परिवर्तन (u turn) की बातें कल्याण के लिए पारिवारिक आय को साक्ष्य मान लेने के अनुपयुक्त प्रयास का नतीजा है। जब संपन्नता या बेहतरी को प्रति समतुल्य खपत (per equivalent consumption) का काम करार दिया जाता है तो असमानता या तो घटी या फिर अध्ययन अवधि (sample period) के दौरान घटी या फिर अपरिवर्तित ही रही।
डर्क क्रूगर और फैब्रिजियो पैरी का कहना है अमेरिका में आय असमानता में वृद्धि, खपत की असमानता में वृद्धि की तुलना में स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है...खपत असमानता...पर्याप्त तौर पर स्थिर रही है।
और मेरे द्वारा देखे गए असमानता के आंकड़ों के आज तक के सबसे प्रभावी विस्तृत और तकनीकी तौर पर अत्याधुनिक आकलन में, जोनाथन हीशोट, फैब्रिजियो पैरी और गियोवानी वायलेंत कहते हैं-पहली बात, आधारभूत आर्थिक सिद्धांत से मेल खाती है कि खपत में असमानता, आय में असमानता से पर्याप्त तौर पर कम है। दूसरा खपत में असमानता में इजाफा, व्यय योग्य आय असमानता (disposable income instability) से काफी कम है। अगर हम हमारी असमानता की कहानी में आय को ही प्रमुख स्थान पर रहने दें तो भी इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि आय असमानता के मामले में बात का बतंगड़ बना दिया गया है। ताजा सबूतों के रुझानों को एक सूत्र में पिरोने वाले एक नये पेपर में, रॉबर्ट गॉर्डन लिखते हैं कि आय संबंधी उपलब्ध आंकड़ों के बेहतर इस्तेमाल से पता चलता है कि 1993 के बाद आबादी के निचले 99 फीसदी हिस्से में असमानता में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई और इसे शीर्ष एक फीसदी आय के व्यवहार से समझाया जा सकता है।'
आखिर शीर्ष एक फीसदी में क्या हुआ? अधिकांश सबूत कार्यकारी मुआवजे (executive compensation) की ओर इशारा करते हैं। इन परिवर्तनों पर बहस का खुलासा यहां चर्चा के लिहाज से काफी जटिल है, हालांकि इसमें से एक का जिक्र मैं यहां नीचे करुंगा। फिलहाल तो मुझे इस जानकारी का ही मुख्य जिक्र करने दिया जाए कि एक दशक से ज्यादा वक्त तक निचले 99 फीसदी लोगों में आय असमानता में कोई इजाफा नहीं हुआ।
कई अन्य ताजा अध्ययनों से संकेत मिलते हैं कि मापी गई आय असमानता बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए जाने के कारण मूल्य सूचकांक बनाने और वास्तविक आय के आकलन के परंपरागत तरीकों में खामियां हैं। उदाहरण के लिए, क्रिश्चियन ब्रोडा और जॉन रोमालिज के काफी चर्चित पेपर की दोबारा बात करें तो, हम पाते हैं कि इस काल में उन कम गुणवत्ता वाले उत्पादों के तुलनात्मक मूल्य कम हुए जिनका कम आय वाले उपभोक्ताओं ने अनुपातहीन उपभोग किया। यह बात इस बात की ओर इशारा करती है कि कम आय वाले उपभोक्ताओं द्वारा वास्तविकता में खरीदे जा रहे उत्पादों की कीमत, की तुलना में उनकी 'वास्तविक' आय में स्थिर तौर पर बढ़ोत्तरी होती है। परिणामस्वरुप, 1994-2005 के दौरान असमानता के परंपरागत उपाय में आधे का इजाफा तो विभिन्न आय समूहों में अस्थायी माल के समान मूल्य सूचकांक का इस्तेमाल है।
असमानता की अधिकांश लोकप्रिय बखान तो इस कथित तथ्य पर आधारित हैं कि वितरण के मध्य और निचले स्तर पर पारिश्रमिक और आय दशकों से निष्क्रिय (stagnant) है। ऐसा लगता है कि यह भी मुद्रास्फीति की गणना के लिए तैयार मूल्य सूचकांकों के निर्माण के लिए इस्तेमाल अपर्याप्त परिष्कृत तरीकों में खामी के कारण है। एक अद्यतन मूल्य सूचकांक का इस्तेमाल करके क्रिश्चियन ब्रोडा, ईफ्रैम लेतबग और डेविड वेनस्टेन (पीडीएफ) ने पाया कि 1979 से 2005 के दौरान सैकड़े के 10 फीसदी तक वास्तविक पारिश्रमिक (real wages at the 10th percentile) में 30 फीसदी का इजाफा हुआ। कम आय वालों का वास्तविक पारिश्रमिक निष्क्रिय नहीं रहा, जैसा कि परंपरागत तरीके बताते हैं, बल्कि इसमें हर साल औसतन एक फीसदी का इजाफा हुआ। इसमें कोई शक नहीं है कि इन सभी अध्ययनों को लेकर समझदारी भरी सुसंगत आपत्तियां हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह प्रभावशाली हैं। मान लीजिए हम उनके परिणाम को मान लेते हैं। मान लीजिए आर्थिक असमानता हाल ही के वक्त में काफी कम बढ़ी है। मान लीजिए कि अमेरिकी निचले और मध्यम वर्ग ने पिछले कुछ दशकों में आर्थिक विकास का उतना ही लाभ उठाया, जितना कि अधिक आय वाले वर्ग ने। तो क्या आप इस परिणाम पर पहुंचेंगे कि क्रुगमैन ने झूठी चेतावनी दी थी? क्या आप कहेंगे कि अमेरिका का सामाजिक-आर्थिक तंत्र वास्तविकता में काफी न्यायसंगत है? क्या यह क्या करना और क्या किया जाना चाहिए को लेकर आपके विचार बदल देगा?
शायद ऐसा न हो।
असमानता, अन्याय का संकेत नहीं हैः अधिकांश लोकप्रिय उदारवादी राजनीति और आर्थिक समीक्षा, देश के आर्थिक असमानता के स्तर को संबंधित सरकार या संस्थान द्वारा किए गए न्याय या अन्याय का सूचक मानते हैं। इस किस्म के पॉप उदारवादी समतावाद इस बात के संकेत देगा कि ऊपर दिए गए परिणामों के बाद तो हमारे दिमाग में चल रही हलचल शांत हो जाना चाहिए। लेकिन मैं सोचता हूं कि असमानता को न्याय का पैमाना मान लेने का नजरिया एक गलती पर आधारित है और यह अन्य लोगों को असमंजस में डाल सकता है और उनका ध्यान बंटा सकता है। अमेरिका में मौजूद आय असमानता के खिलाफ ज्यादा शोरशराबा नहीं करने का कारण यह नहीं है कि यह बहुत अच्छा और विचारणीय मुद्दा है। इसके बारे में चिंता नहीं करने का कारण यह है कि आय असमानता के स्तर को लेकर कोई नैतिक तौर पर प्रासंगिक जानकारी नहीं है और इसका कारण वास्तविक समस्याओं से मेल खाता है।
एक देश के भीतर असमानता कई कारकों से प्रभावित हो सकती है। देश के किसी संस्था के न्याय या तारीफ की काबिलियत के निर्धारण के लिए आबादी के उम्र का अनुपात जैसे कारकों का कोई मतलब नहीं है। कुछ अच्छी बातें भी असमानता में बढ़ोतरी का कारण बनती हैं। कुछ खराब वस्तुएं असमानता में गिरावट लाती हैं। असमानता के समान स्तर का मूल कारण अच्छा या बुरा हो सकता है। उदाहरण के लिए, गिनी के गुणांक (gini coefficient) के अनुसार अमेरिका और घाना में आय असमानता का स्तर एक जैसा है, लेकिन बात जब न्याय या अच्छाई की हो तो अमेरिकी संस्थान निश्चित तौर पर बेहतर हैं। असमानता का न तो स्तर और न ही रुझान किसी समाज के संस्थान या उसकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था हमें जिम्मेदाराना तरीके से कोई फैसला देने के लिए जरुरी जानकारी मुहैया कराती है।
अगर अमेरिका में आय असमानता अन्याय का प्रतीक है तो मूल समस्या असमानता की नहीं है, बल्कि व्यवस्थागत कामकाज या सामाजिक आदर्श की है। जैसे राजनीतिज्ञों के अभिजात्य वर्ग के हाथों अन्याय (predation) या फिर जातीय अल्पसंख्यकों को आर्थिक मौकों से परे रखना। ये आय असमानता का कारण बनते हैं। अगर आप सोचते हैं कि अमेरिकी आय में असमानता, अमेरिकी संस्थाओं में मौजूद अन्याय की ओर इशारा करती है तो यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि केवल असमानता की ही बात तक सीमित रहने की बजाय हमें पता करना होगा कि व्यवस्था कहां और कैसे अन्यायपूर्ण है। अगर असमानता का स्तर आधारभूत अन्याय की एक झलक भर देता है तो हमें पूरा ध्यान मूल कारण पर देना चाहिए। समस्या आग है न कि वे लोग जो अलार्म बजने पर इधर-उधर देखते हैं।
आइए मैं अपने विचार को असमानता को प्रभावित करने वाली दो सबसे लोकप्रिय कार्यप्रणालियों-'कौशल के लिहाज से पक्षपाती तकनीकी परिवर्तन (skill biased technical chage)' और कार्यकारी मुआवजे (executive compensation) के परीक्षण से बताना चाहूंगा।
तो, प्रौद्योगिकी में कुछ परिवर्तन एक समूह की तुलना में कर्मचारियों के दूसरे समूह की उत्पादकता बढ़ाते हैं। एक कर्मचारी का पारिश्रमिक उसकी उत्पादकता (अन्य बातों के साथ) का प्रतीक होता है। और नई प्रौद्योगिकी जहां कुछ कर्मचारियों की उत्पादकता को बढ़ा सकती है वहां दूसरों के लिए इसमें बहुत कम या कुछ नहीं भी हो सकता है। जैसा कि हो रहा है, पिछले कुछ दशकों में अधिकांश नई प्रौद्योगिकी 'कौशल के लिहाज से पक्षपाती' रही है। जिसका साफ मतलब यही है कि ज्यादा कुशल कर्मचारियों की उत्पादकता कम कुशल कर्मचारियों से ज्यादा बढ़ गई। यह आर्थिक पेशे की बढ़ते पारिश्रमिक और आय असमानता के लोकप्रिय सिद्धांत का मुख्य हिस्सा है।
तो हम इससे क्या निष्कर्ष निकालें? अगर बात केवल 'कौशल के लिहाज से पक्षपाती तकनीकी परिवर्तन' की हो तो यह न्याय या सामाजिक नैतिकता के लिहाज से तटस्थ लगता है। कौशल का वास्तविक वितरण तो शिक्षा प्रणाली जैसी जगहों पर देखा जा सकता है। (मेरी राय में ऐसा होता है)। लेकिन निर्विवाद तौर पर संतोषजनक स्कूली शिक्षा भी किसी तरह से कुशलता में असमानता को नहीं मिटा सकती, जो कौशल के लिहाज से पक्षपाती तकनीकी परिवर्तन की स्थिति में पारिश्रमिक की असमानता में बदल जाता है। इस तरह से नैतिक तौर पर तटस्थ प्रक्रिया से आय में अंतर के बढ़ने की संभावना ही हमें असमानता को लेकर न्याय के मापदंड पर सवालिया निशान लगा देती है। निश्चित तौर पर कौशल के लिहाज से पक्षपाती तकनीकी परिवर्तन महज एक संभावना नहीं है।
कौशल के लिहाज से पक्षपाती तकनीकी परिवर्तन की कहानी में आपूर्ति के लिहाज से कुशल कामगारों की मांग एक और पहलू है। पारिश्रमिक उत्पादकता को प्रदर्शित करता है, लेकिन यह आपूर्ति और मांग का भी खुलासा करता है। ऐसा माना जाता है कि अमेरिकी स्कूली शिक्षा, मांग के लिहाज से पर्याप्त कुशल कर्मचारी नहीं दे पाती। इससे कुशल कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने के लिए ईनामी पारिश्रमिक बढ़ गया है, जिसने असमानता को और अधिक बढ़ा दिया है।
क्या मांग के लिहाज से कुशल कर्मचारियों की आपूर्ति भी असमानता को प्रभावित करने वाला तटस्थ कारक है? असमानता के स्तर को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों की ही तरह मुझे नहीं लगता कि यह नैतिक तौर पर तटस्थ है, लेकिन मुझे यह भी नहीं लगता कि राष्ट्रीय स्तर पर असमानता में इसके प्रभाव का इससे कुछ लेना-देना है।
ज्यादा प्रौद्योगिकी भले ही समान रुप से उत्पादकता को प्रभावित नहीं करती, इसके विपरीत कुशल कर्मचारियों की कमी प्रत्यक्ष तौर पर सरकारी नीतियों के कारण कम या ज्यादा हो सकती है। अगर पब्लिक स्कूल प्रणाली में अन्याय कम कुशलता और कॉलेज में प्रवेश की बढ़ती संख्या का कारण है तो हम कुशल कर्मचारियों की कम संख्या को तटस्थ तथ्य नहीं मान सकते। साथ ही, अमेरिका और अधिक विदेशी कुशल कर्मचारियों को अपने यहां ला सकता है, लेकिन नहीं लाता। कुशल कर्मचारियों की बढ़ती संख्या के संदर्भ में विदेशी कुशल कर्मचारियों के वीजा पर अनेक तरह के अंकुश, अमेरिकी कुशल कर्मचारियों के लिए तो मदद का ही काम करते हैं और यह अमेरिका के भीतर ही आय में असमानता पर दबाव को बढ़ा देता है।
अब मैं कह सकता हूं कि विदेशी कुशल कर्मचारियों के वीजा का कोटा निर्धारित करने का अमेरिकी आय असमानता के स्तर पर प्रभाव न तो अच्छा है और न ही बुरा। मेरी राय में जहां तक न्याय की बात है तो वास्तविक प्रश्न ये हैं-पर्याप्त शिक्षा तक पहुंच, सरकार द्वारा दिए गए अस्पष्ट अनुदान का औचित्य और अमेरिकी श्रम बाजार का विदेशी कर्मचारियों को लेकर खुलापन। हो सकता है कि इन्हें असली मसले मानने को लेकर मैं गलत हूं। सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा दरअसल असली समस्याओं की तलाश ही है, फिर वह चाहे जो हों। आय में असमानता पर ठहरते हुए सीधे पुनर्वितरण के विचार पर जाकर हम गलती करते हैं।
अंतिम उदाहरण के तौर पर सीईओ का वेतन देखें। वितरण के शीर्ष एक फीसदी की आय में नाटकीय तरीके से भारी बढ़ोतरी में कार्यकारी मुआवजा (executive compensation) का भी हाथ है। आय के तमाम आंकड़ों और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के तमाम बौद्धिक विश्लेषण के बाद यहीं पर ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है। तो आखिर ये परिवर्तन क्यों हुए? मैं नहीं जानता कि क्यों, लेकिन इस मामले को जानना जरूरी है। अगर मामला कर संहिता में बदलाव पर आकर ठहरता है और मुआवजे को लेकर सामाजिक तौर-तरीकों पर तो हमें मामले की और गहराई तक जाना होगा। क्या कर संहिता में परिवर्तन गलत था? क्या इसका उद्देश्य दुर्भावना भरा था? या ये किसी अन्य अनदेखी समस्या का हल था? क्या एन रैंड के उपन्यासों के बोझ तले लाभकारी सुधार धराशायी हो गए? या क्या? मान लीजिए कि माजरा यह है कि योजना बनाने वाले सीईओ के पुराने सहपाठियों के नेटवर्क ने एक-दूसरे के निदेशक मंडल में मौजूदगी का लाभ उठाते हुए अपनी फर्म के शेयरधारकों और कर्जदाताओं की अनदेखी करते हुए एक-दूसरे को भारी वेतन बढ़ोतरी दे डाली। यह एक बड़े पैमाने पर चोरी की कहानी है। लेकिन चोरी तो एक अन्याय है, फिर भले ही उसका गिनी के गुणांक (gini's coefficient) पर असर पड़े या न पड़े। इस वजह से राष्ट्रीय आय असमानता में बढ़ोतरी या यूं कहें कि बर्नी मैडॉफ की अंतहीन लालसा तो अन्याय की महागाथा ही होगी, बंदूक की गोली के किसी धमाके की तरह।
अन्याय पर नजरः पॉल क्रुगमैन और अन्य बहुतेरे लोगों की जीवनस्तर में अंतर में इजाफे की सोच पर संदेह करने के पर्याप्त कारण हैं। मेरा कहना है कि तो क्या? यह तथ्य हमें यह तो नहीं बताता कि हमें क्या जानना चाहिए।
सबसे ज्यादा दिलचस्प तो यह बात है कि आखिर असमानता का क्यों अधिक अंदाजा लगाया गया है। अगर, उदाहरण के लिए, बड़ी व्यवस्थित आर्थिक ताकतें-चीन से बढ़ता कारोबार, वालमार्ट का कीमतों को नीचे ले जाने का दबाव-ने गरीब अमेरिका को हमारी सोच से कुछ ज्यादा अमीर बनने में मदद की...तो यह विलक्षण बात है। और सूचनाप्रद भी। इस बात से यह पता चलता है कि किसे नुकसान होगा अगर अमेरिका की चीन से कारोबारी लड़ाई हो जाए या फिर वालमार्ट भी यूनियनबाजी में उलझकर रह जाए और कारोबार से होने वाले फायदे उपभोक्ताओं की बजाय कर्मचारियों के खाते में जाने लगें। किसी भी मुद्दे के सीधे मूल पर ही बात एक अच्छी बात होती है।
आर्थिक असमानता बहुत आरामदायक है। यह हमें अन्याय के खिलाफ जंग में आलस्य से भर देती है, जो आखिरकार पाना भी इतना मुश्किल नहीं है। यह मानने के लिए ढेर सारे कारण हैं कि अमेरिका में सबकुछ कुछ लोगों के खिलाफ है। परिणामस्वरूप, लाखों लोग अपनी काबिलियत से कम ही काम कर रहे हैं।
आधारहीन पब्लिक स्कूलों में पढ़ रहे अनगिनत शहरी बच्चे हमारी संस्थाओं में पूरी क्षमता के साथ भाग लेने के काबिल ही नहीं बन पाते और न ही उसके लाभ ही उठा पाते हैं। अमेरिका दुनिया के किसी भी देश की तुलना में अपने नागरिकों को ज्यादा कैद करके रखता है, वास्तविकता में हजारों हजार पुरुषों और महिलाओं को मताधिकार से वंचित रखता है (इसमें वैसे पुरुष ज्यादा हैं) और कुछ और हजार को हताशाजनक और टूटा-फूटा सा छोड़ देता है। अपंजीकृत प्रवासी कर्मचारी स्थायी तौर से स्पष्टतया एक आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्ग में इजाफा करते रहते हैं। इन्हें नागरिकों को हासिल आधारभूत अधिकार भी हासिल नहीं होते और सरकार के साथ निजी क्षेत्र से भी लानत ही मिलती है। और मौकों और उपलब्धियों की राह में संस्कृति, निजी भेदभाव जैसे वास्तविक लाखों मकड़जाल बाधा बनकर खड़े होते हैं। इससे अपने आप तैयार होते हैं कम महत्वाकांक्षी और अपनी प्रतिभा का लाभ न उठा पाने वाले लोग। हमें अपना पूरा ध्यान और ऊर्जा इन दोषपूर्ण अन्यायों में सुधार के लिए इस्तेमाल करने चाहिए।
शायद इन सबका निराकरण राष्ट्रीय आय में भेदभाव को कम करेगा। लेकिन यह सोच कि इस सबमें सुधार के लिए आय के तरीकों में सुधार की जरुरत है, वास्तविक समस्या से मुंह फेरना है और समस्या का सुधार नहीं है।
विल विलकिंसन केटो इंस्टीट्यूट में नीति विश्लेषक हैं और केटो अनबाउंड के संपादक भी। विलकिंसन ने सामाजिक सुरक्षा के नैतिक आयामों से लेकर खुशी के मनोविज्ञान के प्रभाव जैसे विविध विषयों पर लेखन किया है। केटो से जुड़ने से पहले विलकिंसन, सोशल चैंज प्रोजेक्ट और जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के मर्केटस सेंटर के ग्लोबल प्रॉस्पिरिटी इनिशेएटिव के शैक्षणिक समन्वयक थे। वहां पर उन्होंने अपना काम सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं और आर्थिक विकास में संस्थानों की भूमिका पर केंद्रित रखा। उन्होंने इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन स्टडीज में कार्यक्रम निदेशक के पद पर भी काम किया। विलकिंसन का लेखन रीजन, पॉलिसी, प्रॉस्पेक्ट, स्लेट और फिलाडेल्फिया इन्क्वायरर, द ऑस्ट्रेलियन फाइनेंशियल रिव्यू सहित कई पत्रिकाओं में देखने को मिला है।
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