आज़ादी के प्रचार पर - फिलिप पेटिट

डेविड श्मिट्ज और जेसन ब्रेनन के आलेख “आज़ादी की अवधारणाएं” पर फिलिप पेटिट की प्रतिक्रिया

इसैया बर्लिन (Isaiah Berlin) द्वारा प्रसिद्ध बना दिए गए शब्दों को इस्तेमाल करके और इसमें तोड़-मरोड़ की बात को भी स्वीकारते हुए जेसन ब्रेनन और डेविड श्मिट्ज, नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी के बीच अंतर के जिक्र के साथ अपनी बात शुरु करते हैं। आपके पास 'एक्स' काम करने की नकारात्मक आज़ादी होती है जब कोई आपका ऐसा करने में विरोध नहीं करता, भले ही विरोध चाहे जो हो; आपके पास 'एक्स' काम करने की सकारात्मक आज़ादी (या प्रभावी) होती है और साथ में आपके पास यह काम करने की क्षमता भी होती है। वे इस मिथक को भी, जो कि उनको दिखाई देता है, तोड़ने की कोशिश करते हैं कि आज़ादी की ये दो संकल्पनाएं सरकार की भूमिका की दो संकल्पनाओं के साथ जोड़ी बनाती हैं, क्रमशः दक्षिणपंथी और वामपंथी। चूंकि ये संकल्पनाएं या धारणाएं इस तरह से जोड़ी नहीं बना पाती सो वे कहते हैं, ऐसा -एक 'खराब' कल्पना-इसलिए है कि यह धारणा ही झूठी है कि आज़ादी के दोनों स्वरुपों को 'प्रत्यक्ष तौर पर' प्रोत्साहन देने का काम सरकार का है।1

यह कल्पना कथित तौर पर इसलिए झूठी है क्योंकि यह जानने के लिए कि 'नकारात्मक आज़ादी कितनी मूल्यवान है' या 'सकारात्मक आज़ादी कितनी मूल्यवान है,' हमें कुछ अनुभव आधारित जांच करना होगीः हमें 'आरामकुर्सियों से उठकर जाकर जांचना होगा।' लेखक यह मानकर चल रहे हैं कि सरकार या समाज की कामयाबी को लोगों को हासिल 'प्रसन्न या स्वस्थ या संपन्न जीवन' संक्षेप में 'बेहतर जीवन' से मापा जा सकता है। उनका तर्क है, जैसा कि मैंने उन्हें पढ़ा है, यह है कि सरकार को सीधे तौर पर किसी किस्म की आज़ादी को प्रोत्साहित करने का काम देना दार्शनिक अक्खड़पन (philosophical hubris) ही होगा। यह भी कि मूल्यांकन अनुभव आधारित इस कमजोर दावे पर ही आधारित किया जा सकता है कि ऐसी आज़ादी को प्रोत्साहन से लोगों का जीवनस्तर बेहतर होगा। क्या लेखक यह सोचते हैं कि सरकार का काम, आज़ादी को प्रोत्साहन देने की बजाय, लोगों के जीवन को प्रत्यक्ष तौर पर बेहतर बनाना है? ऐसा है नहीं, क्योंकि एक बिंदु पर वे सरकार को लेकर एक गहन संदेह का भी जिक्र करते हैं, जिसके मुताबिक सरकार इतने बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिहाज से विसंगतिपूर्ण हो सकती है। 'वास्तविक दुनिया में, सरकारी अधिकारी को किसी काम 'अ' को करने का अधिकार देने का मतलब होता है कि उम्मीद है कि वह काम 'अ' कर देगा, यह जानते हुए कि ऐसा अधिकारी भले ही कोई भी हो, वह काम 'अ' करने का भरपूर दिखावा करते हुए इस अधिकार का प्रयोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए करेगा।' ऐसे में हम भला सरकार को क्या लक्ष्य दे सकते हैं, यह सोचते हुए कि हम अराजकता या सरकार से ही निराश नहीं होंगे? जवाब इस बात पर चर्चा के बाद मिलता है कि कितनी बार सरकार किसी बात का वादा करती है-किसी बात की गारंटी देती है-बिना वास्तविकता में उसे पूरा किए हुए और इस मुद्दे पर उनका संदेह मर्यादित हो जाता है,'हम चाहते हैं कि सरकार उसी स्तर तक गारंटी दे, जहां तक वह कारगर हो।' और हम यह कैसे जान सकते हैं कि कौनसी गारंटी कारगर होती है? फिर एक बार अनुभव आधारित रिसर्च की शरण लेकर, 'हमें जांचना होगा कि हमारी दुनिया में कानूनसम्मत गारंटी कितनी कारगर होती हैं।2' अब यह बात पता लग चुकी है कि ब्रेनन और श्मिट्ज द्वारा किया गया मूल दावा यह है कि सरकार को कोई काम या भूमिका देते वक्त- गारंटी का एक पुलिंदा जिसकी वह हामी भरे, नीतियों का एक पुलिंदा जिसका वह पालन करे-हमें अनुभव आधारित रिसर्च पर ही भरोसा करना होगा। और जहां तक इस दावे की बात है मैं उससे पूरी तरह से सहमत हूं। लोकतंत्रवादी आज़ादी पर किताब के पहले ही पेज पर उन्होंने भी इसे तरजीह दी है, मैंने यह सर्वश्रेष्ठ नीतियों और संस्थाओं का फैसला अंततः 'अनुभवजन्य सवालों' के अलावा 'बातों के आदर्श होने की सोच' पर भी निर्भर हैं। (पेटिट, 1997, पेज 1)। यही कारण है कि आज़ादी पर नवलोकतंत्रवादियों की सोच पर लेख में फ्रैंक लोवेट और मैंने उपशीर्षक 'प्रामाणिक और संस्थागत रिसर्च कार्यक्रम' का इस्तेमाल किया है (लोवेट और पेटिट 2009)। हालांकि मैं इस बात पर ब्रेनन और श्मिट्ज से सहमत हूं कि नीति निर्धारण और संस्था निर्माण की परियोजना-और प्रामाणिक राजनीतिक तर्क की परियोजना के विस्तार में-अनुभव आधारित रिसर्च के साथ प्रतिमानों (modeling) का भी इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आता कि वे यह क्यों सोचते हैं कि इससे किसी एक किस्म की आज़ादी को अपनाने की सरकार की आधारभूत चिंता को लेकर दार्शनिक बहस कमजोर पड़ जाती है। मुझे समझ नहीं आता कि नकारात्मक या सकारात्मक आज़ादी पर किसी राजनीतिक बहस की गुंजाईश क्यों नहीं रह जाती। या फिर आज़ादी के गैर-प्रभुत्व पर कोई बहस नहीं होती जो मेरी राय में लोकतांत्रिक परंपरा की विचारधारा का ही हिस्सा है। क्या उन्हें लगता है कि केवल अनुभव आधारित ज्ञान ही इस बात के फैसले के लिए काफी है कि क्या नीतियां या कार्यक्रम-उनकी भाषा में गारंटी-सरकार को अपनाना चाहिए? अनुमानतः नहीं, क्योंकि अनुभव आधारित ज्ञान हमें यह तो बता सकता है कि कौनसी नीतियां कारगर और संभव हो सकती हैं, लेकिन वह यह नहीं बता सकता कि किन नीतियों की दरकार है। नीतियों की दरकार का ताल्लुक नीतियों की व्यावहारिकता से भी है। हमें संभाव्य नीतियों की जानकारी के लिए अनुभव आधारित ज्ञान की जरुरत पड़ सकती है, लेकिन जब बात संभाव्य नीतियों में से जरुरी नीति के चयन की आती है तो प्रामाणिक मापदंड की जरुरत पड़ेगी। मेरी राय में वे यह सुझाना चाहते हैं कि जब हम सरकार की नीतियों का आकलन करते हैं या नीतियों के लिए सुझाव देते हैं तो हमें केवल विचारों के कुछ स्वरुपों की दरकार होती है कि अब यह नीति और अब यह। यह सब काम आकलन के किसी एक ही नजरिये के बगैर होता है। हम कह सकते हैं कि यह या वह नीति जरुरी है, जिसे सरकार को अपनाना चाहिए, बिना कोई ठोस कारण दिए या बिना इस बात को लेकर बहस के कि इसका सकारात्मक या नकारात्मक आज़ादी पर क्या असर पड़ेगा। यहां तक कि किसी भी तरह से यह तर्क भी नहीं देते कि यह लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाने का वादा करती है। राजनीतिक मूल्यांकन से उनका कुछ ज्यादा ही लगाव दिखता है। यानी इस बात का खंडन करते हैं कि जब हम किसी नीति विशेष की बात करते हैं तो हमें उसके उन मुख्य गुणों का उल्लेख करना होगा, जिनके कारण वह जरुरी है।3

उनका दावा केवल इतना हो सकता है कि लाखों वैशिष्ट्य ऐसे होते हैं जिनका नीति निर्धारण में महत्व होता है। और यह भी संभव है कि किसी नीति विशेष की सिफारिश करके हम, एक-एक मामला करके, फिर वह किसी भी गुणधर्म विशेष से मेल खाता हो, आज़ादी जैसी किसी आम सोच तक ही सीमित रहने से इनकार कर देते हैं। वे राजनीतिक आकलन के लिए वही मॉडल अपना सकते हैं जो संभव है सौंदर्यबोध के लिए आवश्यक हो, जहां हम अपनी पसंद की कलाकृतियों का चयन कर लेते हैं, और कुछ ऐसा खोज ही लेते हैं जिससे हम अपनी पसंद को सही भी करार दे दें, लेकिन संभव है कि उसमें कोई ऐसा आम सौंदर्यबोध वाला तत्व न हो जो हमारे लिए जरूरी है। यह व्यावहारिक नजरिया कई लोगों को आकर्षित कर सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि हमें इसका प्रतिकार करन चाहिए या कम से कम इतना तो सोचना ही चाहिए कि यह हमें राजनीतिक आकलन और तर्क के लिए जरूरी पर्याप्त नजरिया मुहैया नहीं कराता। जब हम राजनीतिक आकलन करते हैं तो हम अपने साथी नागरिकों के साथ-वास्तविकता में या फिर कल्पना में-हमारे द्वारा सिफारिश की जा रही संस्थाओं और नीतियों को लेकर मंत्रणा कर रहे होते हैं। इसका यह मतलब हुआ कि हमें उन्हें अपनी बात समझाने के लिए आकलन का एक आधार तैयार करना होगा, इस कल्पना के साथ कि हम किसी सीमित हित या विचार तक ही सीमित नहीं है। और अधिक मजबूत तरीके से हमें उन्हें अपनी बात समझाने के लिए आकलन का एक आधार तैयार करना होगा, जो आमतौर पर सहमति वाला हो, कोई नहीं सोचेगा कि यह अप्रासंगिक है या न ही यह सोचेगा कि दूसरे इसे अप्रसांगिक मान सकते हैं। प्रस्तुत राजनीतिक सिफारिशों के जरिये समाज के सभी तबकों के जुड़ने की आकांक्षा, दरअसल अस्पष्ट तौर पर यह दावा ही कर देना है कि इन सिफारिशों के पक्ष में कुछ ऐसे पुख्ता कारण हैं जिनको कोई तर्कों से खारिज नहीं कर सकता। हो सकता है लोग इसे दिए जा रहे महत्व के स्तर को लेकर सवाल उठाएं, लेकिन इसके अप्रसांगिक होने की बात कोई नहीं करेगा। राजनीतिक आकलन और तर्क के प्रचार के लिए यही जरूरी है। तो आखिरकर आकलन के दौरान हासिल कारणों का समूह किसी एक ही नहीं दूसरे लक्षण के साथ क्यों न देखने को मिले? कारण सरल सा है। सार्वजनिक बहस में जितने ज्यादा कारण लागू होंगे, यह बात उतनी ही स्पष्ट होती जाएगी कि यही वे कारण हैं जो समाज के विभिन्न वर्गों के लिए महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि सार्वजनिक बहस के लिए कुछ निराकार, अनिवार्य विचारों, मूल्यों के मामले में शुरुआत में एक समान विचार बिंदु की बात की जाती है। विचार-विमर्श के लिए समुदाय की स्थापना में-एक ऐसा समुदाय जहां केवल संख्या को ही सबकुछ नहीं माना जाता-कुछ तय आदर्श (value) होते हैं जो हो सकता है नाकाम हो जाएं, लेकिन माना जाता है कि यह पूरी दुनिया के लिए चिंता का सबब हैं। इस किस्म की भूमिका के लिए आखिर क्या आदर्श  उपलब्ध होंगे? एक आदर्श जो उपलब्ध हो सकता है वो है उच्च स्तर पर विचार, जिसमें नीति को एक समझौते के तौर पर स्वीकारा जा सकता है, कुछ कारणों से एक वर्ग को अच्छी लगने वाली और कुछ अन्य कारणों से दूसरे वर्ग को भी भाने वाली। लेकिन ऐसा आकस्मिक समरुपता (fortuitous convergence) से उपजी परिस्थितियों में ही सुसंगत हो सकता है। वे आदर्श जिन्हें आमतौर पर ज्यादा लोगों द्वारा स्वीकारा जाएगा वो सामान्य से रोजमर्रा के ही हैं, जैसे कल्याण या समृद्धि या समानता या न्याय-या निश्चित तौर पर आज़ादी। कौनसा आदर्श  सबसे बेहतर है यह जानने के लिए हो रही बहस न चाहकर भी इस सवाल से जुड़ जाएगी कि यह नीतियों के आकलन के लिहाज से यह कितना आदर्श है और इसे नीति निर्माण की कसौटी के तौर पर इसे कितना आदर्श होना चाहिए। ब्रेनन और श्मिट्ज द्वारा चर्चा किए जा रहे मामलों का पृथक्करण किसी मृगमरीचिका (will-o-the-wisp) की तरह है।  मैं अपनी बात उन निरीक्षणों से करना चाहूंगा जिनके चलते मैं आज़ादी के गैर-प्रभुत्व वाला होने का पक्षधर हूं। शायद अपने विचार व्यक्त करने का यही सबसे अच्छा तरीका होगा। मुझे लगता है कि किसी राजनीतिक संस्था और कार्यक्रम के आकलन के लिए पेश किए गए किसी भी आदर्श को कई बाध्यताओं को संतुष्ट करना होगा। आदर्श तो यही होगा कि समाज की संस्कृति में इसका कोई ऐतिहासिक उदाहरण मौजूद हो। यह ऐसा होना चाहिए कि जिसे कोई भी शायद अप्रासंगिक करार न दे, इसमें हर किसी को पसंद होने वाला निहितार्थ होना चाहिए-कम से कम सतही तौर पर तो रुचिकर-ताकि संविधान और देश, सरकार को दिशा मिल सके। गैर-प्रभुत्व वाली आज़ादी वो आज़ादी है जिसमें आप पर किसी भी एजेंट या एजेंसी की इच्छा को नहीं लादा गया है। आप खुद अपने मालिक हैं या आप अपनी शर्तों पर जीते हैं-आप पुरानी लातिनी कहावत के मुताबिक हैं, अद्वितीय (sui juris)। इस ध्येय या आदर्श की हमारी संस्कृति में गहरी जड़ें हैं और कोई भी इसके राजनीतिक महत्व को नहीं नकार सकता। केटो'स लेटर नाम के 18वीं सदी के एक छोटे से लेखन में एक अच्छा सूत्रीकरण किया गया है, 'आज़ादी अपनी शर्तों पर जीना है, गुलामी केवल दूसरों की ही दया पर जीना है।' (ट्रेचर्ड एंड गार्डन 1971, खंड 2, 249-50)। मुझे लगता है कि इस लिहाज से आज़ादी का अर्थ बहुत रोचक है और समकालीन चेतना ने इसकी जगह ले ली थी। कारण एक ही था कि यह विचार उछल आया था कि आज़ादी भी दो तरह की होती है सकारात्मक और नकारात्मक। यह सकारात्मक आज़ादी के बराबर नहीं है क्योंकि इसमें प्रभुत्व का अभाव है, यह नकारात्मक आज़ादी भी नहीं है, क्योंकि इसमें हस्तक्षेप का भी अभाव है। यह दो अन्य कारणों से भी नकारात्मक आज़ादी के बराबर नहीं है। आप दूसरे की इच्छा पर निर्भर होकर भी संभव है कि किसी कष्ट का सामना न करें, जबकि आपके ऊपर स्थित व्यक्ति जब चाहे आपको रोक-टोक सकता है। और आपके कामकाज में बाधा डालने वाले की इच्छा के बगैर भी बाधा हो सकती है-उलिसिस के नाविकों की तरह-आपकी शर्तों में बाधा, जो आपकी इच्छा से हो सकती है। अगर गैर-प्रभुत्व वाला होने के कारण आज़ादी मुझे लुभाती है तो ऐसा केवल किसी हवाई किले की वजह से नहीं बल्कि इस महत्वपूर्ण विचार के कारण कि इसके राजनीतिक प्रभावों को जानने के लिए भी काफी काम किया जाना है। आज़ादी को गैर-प्रभुत्व के तौर पर प्रोत्साहित करने के लिए संविधान और सरकार को क्या करना होगा? यही वह सवाल है जो मेरी राय में नव-लोकतंत्रवाद के रिसर्च के केंद्र में है और यह इस संबंध में बढ़ रहे काम का भी केंद्र बिंदु है। कहने की जरुरत नहीं कि इस काम में मार्गदर्शन के लिए अनुभव की दरकार है और आदर्श स्थापना की है और इस मामले में तो ब्रेनन और श्मिट्ज को भी कोई आपत्ति नहीं दिखाई देती।  लेकिन क्या वे मार्गदर्शन करने वाले सवालों को यह कहकर खारिज कर देंगे कि ये विश्लेषण और नीति निर्धारक मसलों को अलग नहीं करते? क्या वे कहेंगे कि मैं 'भाषा का इस्तेमाल कैसे किया जाए' की बहस से परे हट रहा हूं। मुझे उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

नोट्स:

  1. ब्रेनन और श्मिट्ज एक आदर्श (value) के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष के बीच अंतर को बताते हैं-जैसे इसका 'एक आधारभूत संस्थागत ढांचे' के माध्यम से प्रोत्साहन। मुझे नहीं पता कि इसका उनके लिए क्या महत्व है (देखें फूटनोट 2)। यह शायद उनकी किताब से स्पष्ट हो सकता है, जो मैंने नहीं पढ़ी। चूंकि आज़ादी जैसे आदर्श के अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन के पक्षधर हैं, इसलिए हो सकता है कि हमारे बीच का अंतर बहुत ज्यादा न हो।
  2. चूंकि यह बिंदू प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही किस्म के प्रोत्साहन के लिए लागू होता है, मुझे नहीं समझ आया कि इनका अंतर उनके लिए क्यों इतना महत्वपूर्ण है (देखें फूटनोट 1)।
  3. आकलन के किसी भी क्षेत्र में कारण विशेष (particularism) का अतिरेक भी यही कहता है कि किसी भी मूल्यांकन के पक्ष में रहने वाला स्थायी लक्षण कोई भी नहीं है। दूसरे शब्दों में, कोई भरोसेमंद अच्छा या बुरा गुणधर्म (किसी आलोचक के लिए, देखें जैकसन, पेटिट और स्मिथ 1999) नहीं है। लेकिन ब्रेनन और श्मिट्ज जिस बात का समर्थन कर रहे हैं, इस मामले में उनकी कोई भी टिप्पणी नहीं होने के कारण, वह कम कट्टरपंथी दिखती है।

संदर्भः

  • जैकसन, एफ., पी. पेटिट आदि (1999), एथिकल पर्टिक्यूलरिज्म एंड पैटर्न्स पर्टिक्यूलरिज्म. बी.हुकर और एम. लिटल, लोवेट, एफ. और पी. पेटिट (2009)
  • "नियो रिपब्लिकनिज्मः ए नॉर्मेटिव एंड इंस्टीट्यूशनल रिसर्च प्रोग्राम." एन्युअल रिव्यू ऑफ पॉलिटिकल साइंस 12, पेटिट, पी. (1997)
  • रिपब्लिकनिज्मः ए थ्योरी ऑफ फ्रीडम एंड गवर्नमेंट, ऑक्सफोर्ड, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

फिलिप पेटिट प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में राजनीति और ह्यूमैन वैल्यूज के लॉरेंस एस. रॉकफेलर यूनिवर्सिटी प्रोफेसर हैं। वे वहां 2002 से राजनीतिक सिद्धांत और दर्शनशास्त्र पढ़ाते हैं। आयरलैंड की पृष्ठभूमि के और वहीं से प्रशिक्षण पाने के बाद वे डबलिन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में लेक्चरर, ट्रिनिटी हॉल कैम्ब्रिज में रिसर्च फेलो और ब्रेडफोर्ड यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रहने के बाद 1983 में ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कूल ऑफ सोशल साइंस में पहुंचे। वहां वे सामाजिक और राजनीतिक सिद्धांत और दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे। 2009 में वे अमेरिकन अकादमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंस के लिए चुने गए और विज्ञानेतर व सामाजिक विज्ञान के ऑस्ट्रेलियन अकादमी में फेलो रहे।

पेटिट दार्शनिक मनोविज्ञान (philosophical psychology) और सामाजिक सत्तामीमांसा (social antology) के पृष्ठभूमि के विषयों के अलावा नैतिक और राजनीतिक सिद्धांतों पर काम करते हैं। उनकी अकेले लिखी ताजा किताबों में द कॉमन माइंड (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1996), रिपल्बिकनिज्म (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1997), ए थ्योरी ऑफ फ्रीडम (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2001), रुल्स, रीजन्स एंड नॉर्म्स (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2002), पेनसर एन सोसायटी (पीयूएफ, पेरिस 2004), एक्जामिन ए जपारेतो (तेमास डी होय, मैड्रिड 2008) और मेड विद वर्ड्सः हॉब्स ऑन माइंड, सोसायटी एंड पॉलिटिक्स (पीयूपी 2008) शामिल हैं। साथ ही ज्यॉफ्री ब्रेनन के साथ मिलकर उन्होंने इकानॉमी ऑफ एस्टीम (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2004) और फ्रैंक जैकसन व माइकल स्मिथ के साथ मिलकर माइंड, मोरेलिटी एंड एक्सप्लेनेशन (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2004), जो कुछ पेपर का चुनिंदा कलेक्शन था, लिखी थी। क्रिश्चियन लिस्ट, एलएसई के साथ उनकी किताब ग्रुप एजेंट्स अंतिम चरण में है और वह वर्तमान में लेक्चरों के दो सेट पर भी काम कर रहे हैं। एक, 2009 में ब्राउन यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के ब्लेकवेल लेक्चर्स में और दर्शनशास्त्र में ही स्टेट यूनिवर्सिटी बफेलो में हूरानी लेक्चर्स में शामिल था, जिसका शीर्षक द कन्वरशेसनल इम्पेरेटिवः कम्युनिकेशन, कमिटमेंट एंड द मोरल पॉइंट ऑफ व्यू (विली ब्लेकवेल, प्रतिक्षित)। दूसरा 2009 में दर्शनशास्त्र में कोलोन यूनिवर्सिटी में अल्बर्टस मैग्नस लेक्चर और 2010 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में सीली लेक्चर्स के तहत दिया गया था, जिसका शीर्षक ऑन द पीपुल्स टर्म्सः ए रिपब्लिकन थ्योरी ऑफ डेमोक्रेसी (सीयूपी, प्रतिक्षित), कॉमन माइंड्सः थीम्स फ्रॉम द फिलॉसॉफी ऑफ फिलिप पेटिट जो 2007 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने ज्यॉफ्री ब्रेनन, आर.ई. गूडिन, फ्रैंक जैकसन और माइकल स्मिथ के संपादन में प्रकाशित की थी।