हत्थेदार कुर्सी से बाहर, अनिश्चिचता की ओर - जॉन क्रिसमैन
डेविड श्मिट्ज और जेसन ब्रेनन के आलेख “आज़ादी की अवधारणाएं” पर जॉन क्रिसमैन की प्रतिक्रिया
जेसन ब्रेनन और डेविड श्मिट्ज के बेहद रोचक निबंध के कई अंतर्निहित विचारों में से एक यह है कि नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी विचारों का एक समूह है न कि विभाजन। इसी तरह वे ध्यान दिलाते हैं कि, मेरी सोच से सही भी है, नागरिकों को दी जाने वाली आज़ादी के स्तर और प्रकार का फैसला केवल वैचारिक विश्लेषण से ही नहीं किया जा सकता, और (उन शब्दों में जिनका वो इस्तेमाल नहीं करते) आज़ादी एक ऐसा विचार है जिसे चुनौती दी जा सकती है और इसलिए इसका इस्तेमाल राजनीतिक विवादों के निपटारे के लिए नहीं किया जा सकता। क्योंकि ऐसे विवादों के कारण ही इस विचार को लेकर विरोधाभासी विचार जन्म लेते हैं। लेखकों का मुख्य मुद्दा, हालांकि यह है कि कथित नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी के विचारों में वैचारिक अंतर को ज्यादा जरुरी अनुभव आधारित सवाल के पक्ष में खारिज किया जा सकता है कि जब सरकार इनमें से किसी एक (या दोनों) को प्रोत्साहित करती है तो यह लोगों के लिए अच्छा होता है। वे इस अवधारणा पर सवाल उठाना चाहते हैं कि आज़ादी, किसी भी मूल भाव में, सरकार द्वारा ही प्रोत्साहित की जानी चाहिए, फिर वह प्रत्यक्ष तौर पर हो या अप्रत्यक्ष। उनका तर्क है कि दार्शनिक और राजनीतिक विचारकों की सोच को इसैया बर्लिन की इस सोच ने परे कर दिया है कि आज़ादी को कुछ मामलों में सार्वजनिक तौर पर आदर्श मान लिया जाना खतरनाक है और इसलिए हमें किसी विकल्प (नकारात्मक) को प्रोत्साहित करना चाहिए। लेखकों की राय में वह परियोजना समाजशास्त्र के वास्तविक परिणामों को परखने के मुश्किल काम की जगह-सकारात्मक या नकारात्मक आज़ादी (या उनका कोई संकर प्रकार) को प्रोत्साहित करने का कारण चाहे जो हो-हत्थेदार (आराम) कुर्सी वाले निरर्थक दर्शन को लागू करना है। वे आज़ादी के वास्तविक अर्थ के पचड़े में पड़ने की बजाय संबंधित सरकारी नीतियों के इस पर प्रभाव का अनुभव आधारित अध्ययन करना चाहते हैं।
यह एक रोचक परियोजना है। मैं महज दार्शनिक विचारों की बजाय कई शास्त्रों के भीतर जाकर वास्तविक नीतियों के विश्लेषण की मुखर प्रशंसा करता हूं। हालांकि इस परियोजना को सुसंगत बनाने के लिए, मुझे भय है कि हम हत्थेदार कुर्सी से बच नहीं सकेंगे। उदाहरण के लिए, हमें आज़ादी के विचार (जिसका वर्गीकरण लेखकों ने हमें मुहैया करा दिया है) के मुद्दे का कामकाजी खाका तैयार करना होगा। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हालांकि यह है कि हमें 'सरकार' को लेकर एक सोच तैयार करनी होगी और ऐसी सामाजिक गतिविधियों/संबंधों की जो सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त हों ताकि हम दूसरे के पहले पर प्रभाव का अध्ययन कर सकें। लेकिन जैसा कि मेरा कहना है यहां हमें एक मौलिक दिक्कत का सामना करना पड़ेगा। आज़ादी को प्रोत्साहन के लिए तय 'सरकारी नीतियों' का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है या नहीं, यह जानने के लिए हमें पहले यह स्पष्ट करना होगा कि 'आज़ादी' का क्या मायने है और कब इन नीतियों का ऐसा लक्ष्य होता है। और अधिक आधारभूत तौर पर ऐसी परियोजनाओं में आंख मूंदकर यह मान लिया जाता है कि इन नीतियों की जरुरत तब तक महसूस नहीं होती, जब तक हम इन्हें खोज नहीं निकालते। लेकिन क्या हो अगर ये सरकारी नीतियां न्यायोचित हों अधिकार के स्वतंत्र मापदंड पर खरी (अगर ऐसा कोई है तो)? ऐसे में उनका आज़ादी पर चाहे जो प्रभाव हो (इसका हम चाहे जो अर्थ लगाएं) कम से कम उनके खिलाफ तो नहीं जाएगी। इसकी बजाय, हम केवल इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि 'आज़ादी' के सरनामे के तहत आने वाले कदम, मौके और क्षमताएं और जो यह नीतियां प्रोत्साहित करती हैं, मूलतः ही प्रोत्साहन के लायक नहीं हैं।
यह कुछ ऐसा ही है कि हम एक संस्थागत अस्तित्व के कामकाज की कल्पना करें-सरकार-और घटनाओं का एक और समूह-निजी क्षमताएं, गतिविधियां और सामाजिक नाते-और फिर यह सवाल पूछें कि कैसे बाद वाली बात के कामकाज का पहली बात पर असर पड़ता है। लेकिन आखिर एक तय सामाजिक ढांचे में दर्ज बातों के अलावा हम भला कैसे सामाजिक गतिविधियों और रिश्तों को समझ सकते हैं? उदाहरण के लिए, कलप्ना कीजिए सही लोकतांत्रिक तरीकों को अपनाते हुए एक कानून पारित किया गया जो मुझे तुम्हारे अधीन मौजूद संपत्ति को, जिसे उचित तौर पर तुम्हारी ही संपत्ति घोषित किया हुआ है, पर कब्जे से रोकता है। ऐसे में मुझे कानूनी तौर पर ऐसा करने से रोकना कानून के खिलाफ नहीं जाना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए अगर हम कानून के औचित्य में यकीन रखते हैं। निश्चित तौर पर, कोई इस औचित्य पर यह कहते हुए सवाल उठा सकता है कि आज़ादी मूलतः ही अच्छी होती है और कोई भी चीज जो इसे प्रतिबंधित करती हो, उसका मूल्यांकन इस लिहाज से होना चाहिए कि यह इसके अच्छे प्रभाव पर कितना असर डालती है। लेकिन अगर बहस इस दिशा में चल निकलती है तो हमें निश्चित तौर पर आज़ादी की धारणाओं पर चर्चा करनी होगी। इसके लिए यह विवाद का विषय हो सकता है कि 'आज़ादी' को अच्छा मानने के बाद इसे लोकतांत्रिक बहुमत के न्यायसंगत कदम को छोड़कर संरक्षित और स्वतंत्र माना जा सकता है।
इस मसले का सबसे विवादास्पद पहलू, मेरी राय में, संपत्ति का अधिकार होगा। स्कूलों के लिए धन एकत्रित करने के लिए नये कर को आज़ादी में इजाफा माना जाएगा या कटौती? इस नये प्रावधान के कारण कर के दायरे में आने वाले लोग उस धन के इस्तेमाल को लेकर स्वतंत्र नहीं होंगे, लेकिन अगर नीति न्यायसंगत (किसी तरह से) है तो यह स्पष्ट नहीं है कि इसे आज़ादी में कमी माना जाएगा या नहीं। क्या यह मेरी आज़ादी में कमी होगी कि मैं उस लाईन से तुम्हारी इजाजत के बगैर न गुजर सकूं, जो तुम्हारे अधीन है? और शिक्षा नीति सुधारने की कोशिश का क्या, जिसका उद्देश्य संभवतया छात्रों में सकारात्मक आज़ादी की सोच के लिहाज से क्षमताएं विकसित करना हो? क्या इसे आज़ादी में इजाफे के तौर पर देखा जाएगा? एक किस्म की आज़ादी के लिए दूसरी किस्म की आज़ादी के साथ समझौता? यह सवाल बाकी बचे काम के महज संकेत नहीं है। बल्कि ये तो मेरी समझ से यहां किए गए रिसर्च प्रोग्राम की अनिश्चितता की ओर इशारा करते हैं।
इसलिए अपनाए गए तरीके पर मेरी दो सवाल उठाने की इच्छा हैः सरकार की नीति आज़ादी में बढ़ोतरी में कारगर है या नहीं इसका पता इस नीति की पूर्व समीक्षा या मूल्यांकन के भला कैसे संभव है? दूसरा, नागरिकों और द्वारा आज़ादी के आनंद की सीमा और इससे पड़ने वाले प्रभाव का अंदाजा लगाने के लिए, पूरा ध्यान केवल सरकार पर ही क्यों केंद्रित किया जाए और आर्थिक फर्म व कार्पोरेट एजेंटों की भूमिका को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है? वाकई 'सरकारी' नीति और सार्वजनिक उपक्रम, जिसकी कानूनी हैसियत कानूनी नियमों से तय की जाती है, के बीच भला अंतर कैसे किया जा सकता है? ब्रेनन और श्मिट्ज एक बिंदु पर कहते हैं-'सरकार -या किसी भी अन्य संस्थान-की आज़ादी के एक संरक्षक या प्रोत्साहक के तौर पर भूमिका के निर्धारण के लिए वास्तविक तर्क की दरकार होती है।' लेकिन बाकी की चर्चा में, 'किसी अन्य संस्थान' का नामोल्लेख गायब हो जाता है और पूरा ध्यान 'सरकार' पर ही केंद्रित होकर रह जाता है। हैरत होती है कि निगमों की तरह की संस्थाओं पर भी यह पूछते हुए ध्यान दिया जाएगा कि क्या कारोबारी फैसलों और कार्पोरेट रणनीतियों का भी सकारात्मक या नकारात्मक आज़ादी पर असर पड़ता है। निश्चित ही ऐसी कई रणनीतियां (और उन्हें अधिकार देने वाली सरकारी नीतियां) लोगों की योग्यता पर असर डालती है, जिससे उनकी अनचाही बाधाओं से मुक्त जीवन जीने की राह में रुकावटें आती हैं। क्योंकि ऐसे फैसले चिकित्सा, शिक्षा, आवास या आम आदमी के लिए बेहद महंगे किसी भी दुर्लभ संसाधन के इस्तेमाल को लेकर हो सकते हैं। इससे उनको अपनी प्रतिभा के विकास का मौका नहीं मिलता और अपनी पसंद की जिंदगी जीने का मौका भी नहीं मिलता। या वे ऐसे संसाधनों का इस्तेमाल भी करना चाहें तो उनको रोक दिया जाता है, इस तरह उनकी प्रजाति के कुछ लोगों के लिए यह नकारात्मक आज़ादी होगी। ऐसी घटना को भला कैसे समझा जाएगा? क्योंकि आखिर किसी निजी व्यक्ति (या निजी संस्था) की यह हरकत जटिल कानूनी और सामाजिक व्यवस्था के तहत कानून की ताकत के तहत (और शायद, कुछ अधिकार क्षेत्रों में तो, लोकतांत्रिक तरीके से पुनर्विचार और पुनर्समीक्षा का भी विषय हो सकती है) मान्यता रखती हो?
उदाहरण के लिए, जब चीनी सरकार गूगल पर मौजूद सामग्री को सेंसर करने के लिए दबाव डालती है तो कंपनी चीन में अपना काम ही बंद करने पर विचार करने लगती है। आखिर हमें चीनी नागरिकों को इस साइट के इस्तेमाल से रोकने के लिए किसे जिम्मेदार ठहराना चाहिए? यह सवाल निश्चित तौर पर जटिल है। अगर कोई केवल चीनी सरकार को ही दोषी करार दे दे तो भी चीनी लोगों को उनकी इच्छा की जानकारी देने वाला इकलौता सर्च इंजिन होने के कारण उनकी आज़ादी की सीमा के मूल्यांकन के लिहाज से प्रासंगिक है। महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करने की आज़ादी का न होना, जटिल सार्वजनिक नीतिगत फैसलों का ही परिणाम है जो वर्तमान विवाद से काफी परे है, कम से कम उतना जिसने गूगल को इतना बड़ा बाजार बना लेने में मदद की। भले ही कोई यह सोचे कि गूगल की नित नया खोजने वाली सर्च इंजिन प्रौद्योगिकी ही इसके बाजार पर प्रभाव का कारण है, लेकिन इसके अपने कारोबारी फैसले (भले ही दबाव में लिए गए हों या नहीं) चीनी असंतुष्टों की आज़ादी को सीमित कर देते हैं तो इसका मतलब यह है कि आज़ादी में जो कमी आई है उसका ठीकरा अकेले 'सरकार' के सिर नहीं फोड़ा जा सकता।
अब यह कहा जा सकता है कि चूंकि एक कार्पोरेशन अपने अधिकारक्षेत्र में ही काम करता है, इसलिए इसके कदम से जिन लोगों के विकल्प कम हो जाते हैं उनकी आज़ादी में कोई कमी नहीं आती। लेकिन यह आज़ादी की उस अवधारणा पर निर्भर होना है, जो संपत्ति के अधिकारों की योजनाओं को विधिसम्मत करार देती है। मुक्त बाजार के समालोचक इसी अवधारणा पर सवालिया निशान लगाते हैं। इस तरह से आज़ादी की परिभाषा तो मामले को फिर एक बार उलझाकर ही रख देगी। निश्चित तौर पर यहां सवाल यह नहीं है कि सरकारी नीतियां वास्तविकता में आज़ादी को घटाती या बढ़ाती हैं, बल्कि यह है कि सरकार के आज़ादी बढ़ाने के कैसे प्रयास, सीधे या अप्रत्यक्ष, वास्तविकता में लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में कामयाब होते हैं (किसी अन्य आयाम में)। लेकिन कौनसी नीतियों का हम परीक्षण करेंगे, वे जिनका विधिसम्मत लक्ष्य 'आज़ादी' में इजाफा है? यह एक भरोसेमंद मार्गदर्शक नहीं होगा क्योंकि किसी भी कानून के लक्ष्य तय करना अधिकांशतया मुश्किल ही होता है। ऐसे में क्या हमारे पास यही सवाल बचता है कि क्या ऐसी नीतियों की किसी तरह की आज़ादी को घटाने या बढ़ाने में भूमिका होती है? अगर योजना यह है तो हम उसी मुश्किल सवाल पर लौट आते हैं जिसे मैं उठाने का प्रयास कर रहा हूं। वह यह कि 'आज़ादी' को किस तरह से परिभाषित किया जाए, इस सवाल के अतिरिक्त कि क्या ऐसी नीतियां स्वतंत्र तौर पर न्यायोचित होती हैं।
हम इन सवालों का किसी भी तरह से जवाब दें, ब्रेनन और श्मिट्ज का जवाब होगा कि उनका प्रस्ताव तो सरकारी नीतियों के उन उदाहरणों को देखने का है जिनको इसी आधार पर बचाने की कोशिश की जाती है कि वे आज़ादी (सकारात्मक या नकारात्मक) को प्रोत्साहन देती हैं और यह भी देखने का कि क्या ऐसी नीतियों से वाकई नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार आता है। निजी फर्मों के कामकाज को परे रखकर यह सोचते हुए कि जब सरकारी नीतियां क्रमानुसार आज़ादी को प्रोत्साहित करते हुए जब लोगों के जीवन स्तर में सुधार में नाकाम हो जाती हैं तो हमें वह काम गैर-सरकारी संस्थाओं पर छोड़ देना चाहिए, जो समाज का निर्माण करती हैं, और निजी के साथ-साथ सामूहिक तौर पर भी काम करती हैं। लेकिन दोहराना चाहूंगा कि 'सरकारी नीतियों' की सीमा को आर्थिक फर्म और कार्पोरेट एजेंटों के कामकाज, जिसे सरकारी फैसले ही कानूनी स्वीकृति देते हैं, से अलग करके देख पाना मुश्किल काम है। (उदाहरण के लिए संपत्ति की प्रणाली का खुलासा जो ऐसी संस्थाओं के कानूनी हैसियत बताती है)।
अंत में, हममें से कई के लिए, आर्थिक ताकतों और प्रतिस्पर्धी बाजार का लोगों का जीवन स्तर एक न्यायसम्मत और नैतिक कदम से सहमतिपूर्ण तरीके सुधारने के लिहाज से प्रदर्शन, एक ऐसी दुनिया में जहां एक अरब से ज्यादा लोग एक डॉलर प्रतिदिन की कमाई पर जीवित हैं और जहां बाजार की खोजों से इसमें बदलाव की कोई गुंजाईश नहीं दिखती, पहले ही स्पष्ट और निराशाजनक विफलता भरा है। मैं हम सभी से हत्थेदार कुर्सी छोड़कर वास्तविक नीतियों के प्रभाव को जानने के प्रयास के आह्वान का स्वागत करता हूं, लेकिन उन लोगों के लिए जो ऐसा कर चुके हैं और विश्व आबादी के बुरी तरह से कुपोषित लोगों को देख चुके हैं, हम कह सकते हैं, 'धन्यवाद, लेकिन हमने काफी कुछ देख लिया है।'
जॉन क्रिसमैन, पेन स्टेट में दर्शनशास्त्र, राजनीति शास्त्र और महिला अध्ययन के एसोसिएट प्रोफेसर हैं. क्रिसमैन “दि पॉलिटिक्स ऑफ पर्सन्सः इंडिविजुअल ऑटोनॉमी ऐंड सोश्यो-हिस्टॉरिकल सेल्व्ज़ [The Politics of Persons: Individual Autonomy and Socio-Historical Selves (Cambridge University Press, 2009)” के भी लेखक हैं.]
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