नक्सलवाद:एक गंभीर समस्या...

सीआरपीएफ के 74 जवानों की नक्सली हमले में मौत ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है. इस समस्या पर केंद्र और राज्य सरकारों की बड़ी-बड़ी बातें हम कई बार सुन चुके हैं लेकिन इस समस्या का समाधान होने की बजाए पुलिस और सुरक्षा बलों के ज्यादा से ज्यादा कर्मी तथा साथ ही आम नागरिक दिन-ब-दिन इस समस्या की चपेट में आ रहे हैं. केंद्र और राज्य सरकारों के बीच इस समस्या को लेकर कोई खास समन्वय दिखाई नहीं देता. दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री के बयानों और राज्य सरकारों की कोशिशों की चर्चा तो बहुत होती है लेकिन समस्या और ज्यादा गहरी हो रही है.

घरेलू मोर्चे पर इन दिनों भारत सरकार को जिन सबसे भयानक समस्यों का सामना करना उनमें से एक है नक्सलवाद की समस्या. समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं. सरकार इसके लिए तरह-तरह की योजनाओं की घोषणाएं भी करती रहती है. लेकिन शायद अब तक कोई कारगर और वास्तविक कल्याणकारी उपाय नहीं उठाए गए हैं जिनके चलते आदिवासी और ग्रामीण इलाके के लोगों की मूल समस्याओं को दीर्घकालिक नीतियों के साथ समाधान हो सके.

सरकारें काफी समय तक नक्सलवाद को कानून और व्यवस्था की समस्या कह कर इसकी भयावहता का सही अंदाजा लगाने में नाकामयाब रही हैं. या फिर सब कुछ पता होते हुए कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं. नक्सल समस्या से निबटने के लिए आबंटिक धनराशि इतने वर्षों से पानी में बहाई जा रही है. आदिवासी क्षेत्रों में समावेशी विकास की बातें करने वाली सरकारों की कथनी और करनी के अंतर की उचित समीक्षा भी जरूरी है. राज्य सरकारों के सहयोग से केंद्र सरकार को यह पता लगाना होगा कि नक्सलियों के पास इतने उन्नत हथियार कहां से आते हैं, उनके आर्थिक स्रोत क्या हैं और वे देश के सुरक्षा तंत्र को भेदने में हर बार क्यों कामयाब हो जाते हैं?

  • नक्सलवाद की समस्या को लेकर आपके क्या विचार हैं?
  • क्या आपको लगता है कि इस दिशा में सरकारी कोशिशें सही हैं?
  • इस समस्या के हल के लिए आपकी नजर में क्या उपाय हैं?

इन पिछले पाँच सालों ने नक्सली

इन पिछले पाँच सालों ने नक्सली समस्या अपने भयंकरतम स्वरूप में पहुँच गई है। जो आंदोलन आर्थिक विषमता के खिलाफ खड़ा हुआ था, आज उसने एक व्यापार का रूप ले लिया है। इस आंदोलन से ईमानदार लोग दूर हो गए हैं और इसका लक्ष्य कहीं खो गया है। इस मामले में एक तरफ तो सरकार की नीतियाँ दोषी है तो दूसरी ओर प्रशासन की अकर्मण्यता और काहिली....। चाहे यह आंदोलन भटक गया हो, लेकिन फिर भी आदिवासियों के बीच इसकी लोकप्रियता का एक कारण यह भी है कि कहीं-न-कहीं आदिवासी इस कथित सभ्य समाज से नाराज है, उपेक्षित है। वे अपने प्राकृतिक जीवन से दूर होते जा रहे हैं और इसके लिए वे प्रशासन और सरकार की नीतियों को जिम्मेदार मानते हैं। इसीलिए नक्सलियों को वे आश्रय दे रहे हैं। सरकार को दो तरह से प्रयास करने होंगे। एक तो आदिवासियों के प्राकृतिक जीवन को किसी भी तरह से संरक्षित करें और दूसरी ओर नक्सलियों पर कड़ी कार्यवाही करे। यदि आर्थिक असमानता नक्सली आंदोलन का स्रोत हैं तो सबसे पहले इस स्रोत पर प्रहार करने की जरूरत है। जबकि हो यह रहा है कि विकास के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आदिवासियों के जंगलों और जमीनों को उजाड़ने की खुली छुट दी जा रही है। फिर राज्य और केंद्र सरकारों के बीच की खींचतान भी इस समस्या को और ज्यादा उलझा रही है। यहाँ इसे याद रखने की जरूरत है कि नक्सली समस्या देश में आतंकवाद की समस्या से भी ज्यादा गंभीर रूप अख्तियार कर चुकी है। और संकेत तो ये भी मिलने लगे हैं कि कहीं इसके तार अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से जुड़ने लगे हैं, यदि ऐसा है तो ये इस राष्ट्र राज्य के लिए दोहरा खतरा है।
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