आज़ादी तो आज़ादी है - टॉम जी. पामर
डेविड श्मिट्ज और जेसन ब्रेनन के आलेख “आज़ादी की अवधारणाएं” पर टॉम जी. पामर की प्रतिक्रिया
मेरी राय में इस चर्चा के लिए चुना गया प्रमुख निबंध “आज़ादी की अवधारणाएं” शिक्षाप्रद नहीं उकसाने वाला है। मैं पहले ही इस बात को स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं डेविड श्मिट्ज को पसंद करता हूं, उनका सम्मान करता हूं और उनका प्रशंसक भी हूं, उनको मैं जानता हूं और उनसे मैंने कई सालों तक सीखा है। साथ ही हाल ही में ही मैंने मैकगिल यूनिवर्सिटी में जेसन ब्रेनन के साथ लेक्चर दिया है, जिनसे मैं पहली बार मिला था। वहां उनकी प्रस्तुति ने एक बात साफ कर दी कि वे एक गंभीर विचारक हैं। मैं यह इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि हालांकि मैं खुद को इन दोनों के योगदान पर चर्चा में शिरकत के कारण भाग्यशाली समझता हूं, लेकिन मेरी टिप्पणियां इनके खिलाफ होंगी और मैं इस बात पर भी जोर देना चाहूंगा कि विरोधी टिप्पणियों का मतलब द्वेष नहीं है। अरस्तु निश्चित तौर पर किसी निष्कर्ष पर ही पहुंचे थे, जब उन्होंने कहा था, 'हालांकि दोनों ही प्रिय हैं, लेकिन धर्मनिष्ठता के लिहाज से सच्चाई दोस्ती से ऊपर है।' इसके बावजूद मुझे उम्मीद है कि मैं दोनों के ही साथ सत्य व्यवहार करुंगा। अपनी आलोचना का जिक्र करने से पहले इस विषय में रुचि रखने वालों को मैं ए ब्रीफ हिस्टरी ऑफ लिबर्टी पढ़ने (खरीदने तक की) सलाह दूंगा, जिससे मुख्य निबंध लिया गया है। वाकई यह इसे काफी गंभीरता के साथ पढ़े जाने की जरुरत है।
- मैं शुरुआत श्मिट्ज और ब्रेनन द्वारा 'नकारात्मक' और 'सकारात्मक' आज़ादी में किए गए अंतर के तरीके से करुंगा। वे इस मामले में श्रेय इसैया बर्लिन को देना चाहते हैं, जिन्हें वे 'इस मिथक का मुख्य समर्थक' मानते हैं कि 'नकारात्मक आज़ादी, आज़ादी के समर्थकों के लिए चिंता का प्रमुख विषय होता है, जबकि सकारात्मक आज़ादी, मार्क्सवादियों, समाजवादियों और आज़ादी के आधुनिक समर्थकों के लिए चिंता का मुख्य कारण होती है।' लेकिन वे इसके साथ इस बात को भी मानते हैं कि बर्लिन द्वारा इस्तेमाल शब्द और उनके अर्थ इन दोनों द्वारा इस्तेमाल शब्दावली से 'कुछ भिन्न' थे और 'इन शब्दों का इस्तेमाल अब बर्लिन के मूल शब्दों की तुलना में अलग तरह से किया जाने लगा है।' ऐसा लगता है कि इन दोनों ने बर्लिन के शब्दों को न केवल 'हल्का' सा संशोधित किया है, बल्कि उन्होंने तो इनका संदर्भ ही बदल डाला है और दूसरों के साथ इनका ऐसा मिश्रण किया है कि जिनमें शब्द तो यही हैं, लेकिन उनके उद्देश्य और चिंताएं बिलकुल ही अलग हैं। खासतौर पर उन्होंने बर्लिन के नकारात्मक/सकारात्मक आज़ादी के अंतर का 'नकारात्मक' और 'सकारात्मक' अधिकारों के साथ घालमेल कर दिया है। परिणाम फायदेमंद नहीं हैं। (साथ ही मामले को उन्होंने कांस्टेंट के व्यक्तिगत [आधुनिक] और सामूहिक [पुराने] आज़ादी के अंतर के साथ मिला दिया है, खैर इसका जिक्र बाद में)।
बर्लिन ने दूसरे लोगों के हस्तक्षेप और बाधा वाली आज़ादी जिसे उन्होंने 'नकारात्मक' कहा और अपने भीतर की रुकावटों वाली आज़ादी के बीच अंतर करने का प्रयास किया। यानी आंतरिक सोच, लक्ष्यों और दमित उच्च निजत्व (higher self) पर विचार मानो वह किसी असत्य, बड़े, बाहरी, धोखादायक दबाव से बाधित हो। यह एक रोचक अंतर है और एक पुरानी परंपरा से जुड़ा है जो प्लेटो के काल से चली आ रही है, जिसमें आज़ादी को 'तर्कसंगत आत्मनिर्धारित दिशा' माना जाता है।1 बर्लिन के दिमाग में सकारात्मक आज़ादी का मतलब ज्यादा आय या याच का मालिक होना नहीं है। साथ ही बर्लिन के लिए आज़ादी के यह परस्पर विरोधी विचार, केवल कुछ भिन्न विचार नहीं है जिन्हें मिलाया जा सके या फिर कोई समग्र राशि जिसे कोई ज्यादा से ज्यादा बढ़ाना चाहे। जब श्मिट्ज और ब्रेनन ने सकारात्मक आज़ादी को दौलत और योग्यता (सचमुच दोनों ही बहुत अच्छे और वांछनीय हैं) से जोड़ा तो उन्होंने1 विश्लेषणात्मक स्पष्टता और2 संस्थाओं और परिणामों के बीच संबंधों को लेकर सार्थक निष्कर्ष निकालने, जो उनके लिए महत्वपूर्ण है, दोनों को घटा दिया। पहले बिंदु के लिहाज से उनको बर्लिन की बात पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए था, जिसने उसी निबंध में लिखा है, जिसका वो हवाला देते हैं कि 'शब्दों के घालमेल से कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता।' 'हर बात वही है जो वो है, आज़ादी आज़ादी ही है, समानता या निष्पक्षता या न्याय या संस्कृति या इंसानी खुशी या शांत संस्कृति नहीं।'2 इन सभी बातों का वर्णन करने के लिए हमारे पास अच्छे शब्द हैं (पिछला ही वाक्य देख लो) इन सभी बातों को 'आज़ादी' कहने से स्पष्टता की बजाय ज्यादा असमंजस ही पैदा होता है। - दौलत या अपनी परिसंपत्तियों को आज़ादी कहने से आज़ादी एक सामाजिक सोच की बजाय कुछ और ही हो जाती है। आज़ादी एक नैसर्गिक सामाजिक विचार है, समाज की सोच के बाहर कुछ भी नहीं, जबकि दौलत या परिसंपत्ति का विचार सामाजिक विचार नहीं। अगर कोई एक ही आदमी पूरे ग्रह पर हो तो उसे स्वतंत्र या गुलाम नहीं कहा जा सकता। वह एक मुक्त समाज में नहीं रहता, ठीक उसी तरह से जैसे वह एक उदार समाज में नहीं रहता। इसी कारण के चलते उसे गुलाम नहीं कहा जा सकता। वह किसी भी किस्म के समाज में रहता ही नहीं है। उदारता और दयालुपन की ही तरह आज़ादी भी लोगों के बीच संबंधों (या कम से कम किसी किस्म के नैतिक बंधन के बीच) से ही ताल्लुक रखती है। (इसमें कुछ और शब्दों का प्रयोग हो सकता है, लेकिन लोगों की विविधता की चर्चा के बगैर आज़ादी की चर्चा बेमानी है)। दूसरी ओर भूख और प्यास जैसी बातों का किसी अन्य से कोई संबंध नहीं होता। एक एजेंट किसी के साथ भी संबंध रखे बगैर ही परिसंपत्तियों और दौलत का आनंद उठा सकता है। उसके ग्रह पर खाने-पीने की कमी या बहुलता हो सकती है। पत्थर से बना औजार एक औजार है, भले ही उसे हाथों की केवल एक जोड़ी ने ही तैयार किया हो। रॉबिनसन क्रुजो अपने द्वीप पर अकेले परिसंपत्तियों और दौलत के मजे लूट सकता था, सामाजिक सहयोग के अभाव में वह भले ही कम लगता हो, लेकिन वह तभी तक स्वतंत्र कहा जा सकता है जब तक फ्राइडे उससे नहीं जुड़ती। फ्राइडे के साथ उसके संबंध ही उसके उदार या दयालु होने का खुलासा करेंगे।
बर्लिन ने 'नकारात्मक आज़ादी' जो किसी बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त हो (एक संबंध जिसे कई तरीकों से समझा जा सकता है, इनमें से सभी पारंपरिक उदारवादी सोच से सुसंगत नहीं हैं) और 'सकारात्मक' आज़ादी, जिसे खुद के ऊंचे, सही या प्रामाणिक लक्ष्य से जोड़कर देखा जाता है, जो अपने अनुभव और जुनून, काहिली, अंधविश्वास आदि आदि की बाधाओं से मुक्त हो, के बीच अंतर स्थापित किया था। पहले वाली आज़ादी, श्मिट्ज और ब्रेनन के इस्तेमाल शब्द से पूरी तरह से तालमेल बिठा लेती है, लेकिन जब वे दूसरी आज़ादी के लिए 'मर्जी के मुताबिक काम करने की ताकत' और 'फैसले लेने की आज़ादी' का इस्तेमाल करते हैं तो मामला उलझ जाता है(पहले ही 'संपत्ति' के संदर्भ में इस्तेमाल ऐसी परिस्थिति में जब किसी का 'संपत्ति पर मालिकाना हक हो या वह उसके नियंत्रण में हो')। बाद वाला शब्द बर्लिन के इस्तेमाल से मेल खाता है, लेकिन पहले का नहीं और किसी और ही बात को इसके साथ जोड़ देता है।
सो आखिर वे बर्लिन के इन शब्दों के इस्तेमाल को अपनाएं या नहीं, इससे क्या फर्क पड़ता है? फर्क पड़ता है क्योंकि बर्लिन एक गूढ़ वैचारिक परंपरा का पालन कर रहे थे जो प्लेटो के वक्त से मौजूद थी और जो 20वीं सदी के अधिकांश वक्त में मौजूद विचारधाराओं के टकराव को बयां करती थी। 20वीं सदी की उदारवादी लोकतंत्र और सर्वाधिकरवाद की जंग को दोनों ही पक्षों ने दो किस्म की 'आज़ादी' के बीच की जंग ही करार दिया था। हर व्यक्ति की अपनी जिंदगी को सजाने, संवारने और संभालने की आज़ादी और बिना किसी हस्तक्षेप के विकल्प चुनने की आज़ादी, खुद को पहचानने की आज़ादी और 'झूठी चेतना' के बंधन को तोड़ने की आज़ादी, फिर वह झूठी चेतना मार्क्सवादियों के कारण हो, समाजवादियों के कारण हो या फिर फासीवादियों और राष्ट्रीय समाजवादियों की दी हो। अपने भाग्यविधाता खुद ही बनने की आज़ादी। इसीलिए जब बर्लिन के विचारों की बात की जाए तो हमें उसके संदर्भों को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। 1919 में सोवियत संघ की हत्यारी सरकार की स्थापना के वक्त उसके संस्थापक ने अपने अपराध को आज़ादी शब्द की आड़ में ढंकने की कोशिश की थी। उसने इसे परंपरागत आज़ादी की बजाय 'वास्तविक आज़ादी' का नाम दिया थाः उन्होंने हमें सभी ओर से घेरकर यह चिल्लाना शुरू कर दिया था कि तुमने आज़ादी, समानता और लोकतंत्र का उल्लंघन किया है। हमारे संविधान के तहत किसानों और कामगारों में असमानता का भी ढिंढोरा पीटा गया। संविधान सभा को बर्खास्त करके अधिक अनाज और अन्य बातों को जबर्दस्ती जब्त कर लिया गया। हमारा जवाब है-दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जिसने वास्तविक असमानता को दूर करने का इतना काम नहीं किया। वह वास्तविक आज़ादी जिससे मजदूर किसान सदियों से वंचित थे।
बर्लिन के शब्दों में, इस किस्म की 'वास्तविक आज़ादी' को थोपना तो एक मौका होगा, 'उनको उनके वास्तविक अस्तित्व की आड़ में प्रताड़ित करना, उनका दमन करना है, इस सुरक्षित जानकारी के साथ कि इंसान का वास्तविक लक्ष्य (खुशी, कर्तव्य का निर्वाहन, बुद्धिमानी, एक समता वाला समाज, आत्मसंतोष) चाहे जो हो इसका उसकी आज़ादी के समरुप होना चाहिए-अपने निजत्व का सही विकल्प, हालांकि अधिकांशतया यह डुबा हुआ और अस्पष्ट सा निजत्व होता है।' - परंपरागत उदारवादी आमतौर पर दौलत का मजाक नहीं उड़ाते (जिसे श्मिट्ज और ब्रेनन 'सकारात्मक आज़ादी' का एक उदाहरण करार देते हैं), लेकिन रोचक मुद्दा यह है कि कैसे दौलत का संबंध आज़ादी से है, वंश के प्रजाति की तरह नहीं बल्कि प्रभाव और कारण के बीच के संबंध की तरह। उनकी हेतुपूर्ण संबंध में रुचि स्पष्ट हो जाती है, जब वे लिखते हैं 'कुछ विचारक सोचते हैं कि एक समाज की शुरुआत के लिए हमें एक न्यूनतम नकारात्मक आज़ादी की दरकार होती है, जो कई पीढ़ियों के बाद सकारात्मक आज़ादी का जनक बन जाती है।' यहां दिए गए संदर्भ से स्पष्ट हो जाता है कि 'सकारात्मक आज़ादी' से उनका मतलब दौलत से है। कोई भी स्वायत्तता और आत्मबोध के लिहाज से 'विस्फोटक उपलब्धि' की बात नहीं करता। दरअसल वे दौलत को ही सकारात्मक आज़ादी के साथ जोड़कर देख रहे हैं, जो बात उस वक्त स्पष्ट हो जाती है जब वे समृद्धि को 'सकारात्मक मुक्ति' एक-दूसरे का विकल्प करार देते हैं। श्मिट्ज और ब्रेनन के मुताबिक, 'समाजविज्ञान और इतिहास इस बात का खुलासा कर सकते हैं कि नकारात्मक आज़ादी का सम्मान जीवन को बेहतर बनाने का एक पुराना, कामयाब और सुरक्षित रास्ता रहा है। यह भी पता चल सकता है कि सकारात्मक आज़ादी को प्रोत्साहित करने का सबसे अच्छा तरीका ही नकारात्मक आज़ादी का संरक्षण है।' 'बेहतर जीवन' के लिए 'सकारात्मक आज़ादी' के अलावा और क्या अतिरिक्त कारण जोड़ा गया था? कोई भी गंभीर व्यक्ति इस बात की शर्त नहीं लगाएगा कि 'नकारात्मक आज़ादी पारिभाषिक तौर पर ही समृद्धि का कारण बनती है,' लेकिन इस बात को स्वीकारकर कि ' नकारात्मक आज़ादी' और समृद्धि एक तरह की आज़ादी है, वे वैचारिक स्पष्टता के लिहाज से उतना ही बड़ा अपराध कर रहे हैं। जैसा कि एफ.ए. हायेक ने श्मिट्ज और ब्रेनन के तौर-तरीकों को खारिज करते हुए कहा था, 'अगर आज़ादी के बारे में चर्चा में किसी स्पष्टता की दरकार है तो इसकी परिभाषा इस बात पर कतई निर्भर नहीं होना चाहिए कि क्या हर कोई इस किस्म की आज़ादी को एक अच्छी बात मानता है या नहीं।'
'बेहतर जीवन' और 'सकारात्मक आज़ादी' को एक-दूसरे का पूरक मानने से स्पष्टता बढ़ने की बजाय घट जाती है। वाकई, दोनों के घालमेल से हम वो नहीं कर पाते जो श्मिट्ज और ब्रेनन हमसे चाहते हैं। यानी कि आज़ादी और दौलत के बीच के संबंध की वैज्ञानिक पड़ताल। क्या हो अगर हम दौलत को आज़ादी कहने की बजाय आज़ादी को दौलत कहने लगें? तब हम आर्थिक इतिहास के अध्ययन के दौरान यह सवाल पूछ सकते हैं कि क्या ज्यादा दौलत से ज्यादा दौलत हासिल की जा सकती है। जब हर अच्छी और वांछनीय आज़ादी है, कोई भी अच्छी या वांछनीय बात का किसी अन्य अच्छी और वांछनीय बात से भेद नहीं किया जा सकता। (हकीकत में तो कोई यह कह सकता है, 'जब मैं कार चलाता हूं तो खुद को स्वतंत्र महसूस करता हूं' या 'जब मैं स्वस्थ होता हूं खुद को स्वतंत्र महसूस करता हूं' या फिर 'जब मैं स्कायडाइविंग करता हूं खुद को स्वतंत्र महसूस करता हूं' यह एक ऐसी कमजोर स्वीकारोक्ति होती है जो कहती है कि पैसा, स्वास्थ्य या आसमान से छलांग लगाना 'आज़ादी के ही प्रकार' हैं)। - ऊपर से मेरी राय में, उनका सूत्रीकरण सरकार और आज़ादी के बीच संबंध को लेकर असमंजस को और अधिक बढ़ा देता है। वे इस 'आम सोच' को खारिज कर देते हैं, 'आज़ादी-फिर वह चाहे जो हो-को सरकार द्वारा ही सीधे तौर पर प्रोत्साहित किया जाना है।' शब्द के तौर पर परंपरागत 'संरक्षण' की बजाय 'प्रोत्साहन' का इस्तेमाल मेरी राय में इस असमंजस का एक कारण है। दौलत में तो असीमित इजाफा हो सकता है, लेकिन मेरी राय में आज़ादी एक बार सभी को बराबर मिलने के बाद उसमें लगातार इजाफा नहीं किया जा सकता। आज़ादी के संरक्षण या उसे 'सुरक्षित' रखने के परंपरागत उदारवादी अभियान का सीधा और अंतरंग संबंध समाज के एक गुण की तरह है जिसे सभी को साझा करना होता है। 'समान आज़ादी' परंपरागत उदारपंथियों का ब्रह्मवाक्य था। समानता ऐसी बात है जो या तो आपके पास होती है या नहीं होती। एक बार हम समान हो जाएं तो हम और अधिक समान नहीं हो सकते। हम समानता के करीब पहुंच सकते हैं या उससे दूर जा सकते हैं, लेकिन गर्मी की तरह की कोई वस्तु नहीं जिसमें असीमित इजाफा किया जा सकता है। दौलत को असीमित तौर पर बढ़ाया जा सकता है, लेकिन विधिसम्मत समानता को नहीं। एक बार आपको यह मिल गई सो मिल गई। इसलिए जहां इसे संरक्षण दिया जा सकता है या सुरक्षित रखा जा सकता है, यह 'प्रोत्साहन या बढ़ावा' देने के लिहाज से योग्य नहीं है। मुझे नहीं लगता कि मेरी आज़ादी को 'बढ़ावा या प्रोत्साहन' देने का काम सरकार का है, लेकिन मेरी साफ राय में इसे संरक्षण देना और इसे सुरक्षित रखना सरकार का कर्तव्य है। उसे अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले हर व्यक्ति के लिए ऐसा ही करना चाहिए। अगर हमारी आज़ादी को सुरक्षित रखना सरकार का काम नहीं है तो आखिर उसका क्या काम है?
आज़ादी को लेकर परंपरागत उदारवादी ('नकारात्मक') नजरिये न तो कोई तानाशाह और न ही गुलामों का मालिक ही स्वतंत्र है, क्योंकि वे एक मुक्त समाज में नहीं रहते, वे दोनों ही मनमर्जी की ताकत के इस्तेमालकर्ता हैं और इसके अधीन हो सकते हैं। यही केंद्रीय अत्याचारी सरकार के अधीन रहने वाले लोगों के लिए भी सच है, हालांकि अभिजात्य वर्ग अपने स्तर पर लोगों पर अत्याचार कर सकते हैं। वे अपने खेतीहर व अन्य किस्म के गुलामों पर हुकुम चलाते हुए किसी अन्य की सत्ता के तहत स्वतंत्र रह सकते हैं। परंपरागत उदारवादी अभियानों में आज़ादी की असमानता एक महत्वपूर्ण मुद्दा हुआ करता था। इसके तहत सभी के लिए समान आज़ादी की मांग की गई। परंपरागत उदारवादी खेतीहर मजदूरों और गुलामों के खिलाफ थे और उनकी राय में यह इन लोगों की आज़ादी से खिलवाड़ है। कई बार आज़ादी के अभाव में यह मालिकों और गुलामों के संबंधों में खटास का कारण भी बनता था। ब्राजील के उदारवादी गुलामी प्रथा के विरोधी जोकिम नेबुको ने गुलामी के बारे में लिखा, 'यह सरकार जो कर रही है वह हम जानते हैं। नैतिक तौर पर यह हर तरह से धार्मिक या सकारात्मक शालीनता के सिद्धांतों पर-परिवार, संपत्ति, सामाजिक सौहार्द्र, मानवीय आकांक्षाओं पर कुठाराघात ही है। राजनीतिक तौर पर यह नीचता है, लोगों के जीवनस्तर में गिरावट, नौकरशाही की बीमारी, देशभक्ति का कमजोर पड़ना, देश के विभिन्न हिस्सों को सामंतशाही में बांटना है। हर किसी का अपना कानून, अपना फैसला देने वाला जज है, पुलिस और अदालतों से भी ऊपर।' उन्होंने ब्राजीलवासियों से अपील की, 'अपने बच्चों को और खुद को दूसरों की आज़ादी से प्रेम की शिक्षा दो। क्योंकि ऐसा होने पर ही आपकी खुद की आज़ादी भी किस्मत से मिले किसी तोहफे की तरह होगी। आपको इसका मूल्य पता होगा और इसके संरक्षण का साहस भी होगा।' - आज़ादी के साथ दौलत के मेल की शर्त परंपरागत उदारवादियों की 'आज़ादी की उपधारणा (presumption of liberty)' के ठीक उल्टी है। आज़ादी की उपधारणा के मुताबिक, सबूत देने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की है जो दूसरे के काम को बाधित कर रहा हो और न कि उस व्यक्ति की जो काम करना चाह रहा हो। यह 'नकारात्मक' आज़ादी के लिहाज से ही खरी है। बेगुनाही की उपधारणा भी इसी तरह उस व्यक्ति से सबूत मांगती है जो दूसरे की आज़ादी को बाधित करता है, किसी आरोपी के खिलाफ सभी सबूत जुटाकर आरोप साबित करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन आरोपी अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि की मांग कर सकता है। इसी तरह से किसी की आज़ादी में हस्तक्षेप के संभावित कारणों को खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन दूसरों द्वारा इसमें बाधा डालने के लिए दिए गए कारणों की पड़ताल की जा सकती है। उदाहरण के लिए, किसी के लकड़ियां जलाने से उठा धुंआ किसी पड़ोसी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। इस मामले में उपधारणा हो सकती है कि मुझे दूसरे के काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, यानी हस्तक्षेप के लिए कोई ठोस कारण होना चाहिए। लेकिन दूसरे के पास दौलत या परिसंपत्ति होनी चाहिए या नहीं इसे लेकर कैसी उपधारणा हो सकती है? इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि दौलत और आज़ादी दो बिलकुल अलग बातें हैं और उनको एक ही बता दिए जाने से असमंजस की स्थिति और अधिक बढ़ जाती है। आज़ादी वह है जिसका आपको आनंद मिलता है जब आप किसी को दूसरे के काम में हस्तक्षेप से रोकने का अधिकार रखते हैं, लेकिन लोगों को दूसरे लोगों को स्वतंत्र होने से रोकने के लिए इस्तेमाल अधिकार आनंद का विषय नहीं है। आज़ादी दूसरों की रुकावट और बाधाओं की गैरमौजूदगी है किसी अन्य बात की मौजूदगी नहीं। लोगों पर बलप्रयोग के लिए व्यक्ति को कुछ करना पड़ता है, लोगों को मुक्त छोड़ देने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता।
आइए हम एक आसान सा वैचारिक प्रयोग करते हैं। यह अंतर्ज्ञान की परीक्षा लेगा, लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई गंभीर व्यक्ति इसमें भाग लेकर इस बात से सहमत नहीं होगा कि दौलत और आज़ादी के मिलाप में कुछ अजीब है। 1927 और 1939 (बात को और भी स्पष्ट करना हो तो जर्मनों की 1878 और 1939 में जिंदगी की बात करें) में औसत जर्मन व्यक्ति की जिंदगी का ही विचार करें। बाद वाले जर्मन लोगों के पास फोक्सवैगन और ऑटोबांस थे, टेलीफोन थे और वह हवा में सैर कर सकते थे, उनकी पहुंच यहूदियों से लूटी गई संपत्ति तक भी थी। अगर दौलत को 'आज़ादी' कहा जाए तो कहा जा सकता था कि उनके पास ज्यादा 'सकारात्मक आज़ादी' थी। लेकिन क्या वाकई उनको ज्यादा आज़ादी हासिल थी? वह दौर एक पार्टी की तानाशाही का था, प्रेस पर सेंसर था, लोगों का कहीं आना-जाना प्रतिबंधित था और लोग भय में जीते थे, लोग सत्ता के मनमाने ढंग से इस्तेमाल की ताकत से डरते थे। इसी शब्द ('आज़ादी') का दौलत और आज़ादी दोनों के लिए ही इस्तेमाल बताता है कि सतह के नीचे किसी बात की ओर इशारा करता है जिसे बढ़ाया जा सकता है या जिसके आधार पर किसी के नफे या नुकसान का अंदाजा लगाया जा सकता है। 1939 की दहशत भरी तानाशाही के तहत ज्यादा दौलत के इस्तेमाल को ज्यादा आज़ादी करार देना इसका अपमान सा होगा। इस तरह की तानाशाही, अराजक सरकार के तहत दौलत में किसी भी तरह के इजाफे को ज्यादा 'आज़ादी बनाने' वाला नहीं कहा जा सकता। (कोई यह तर्क भी दे सकता है कि यहूदियों और हिटलर के अन्य विरोधियों की आज़ादी का छिनना उसका समायोजन कर देता है, लेकिन मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि गैर-यहूदी और अति उत्साहित राष्ट्रीय समाजवादी भी कम ही स्वतंत्र थे, क्योंकि वे जिन बातों का आनंद ले रहे थे वे सब फ्यूहरर पर ही निर्भर थी)। - परंपरागत उदारवादियों की मुख्य धारा आज़ादी की पहचान संस्थाओं, खासतौर पर व्यवहारों, अपेक्षाओं और संस्थाओं के समूह से करते हैं, जिन्हें 'कानून का राज' कहा जाता है। लॉक ने आज़ादी को न केवल सत्ता से जोड़ा था, बल्कि उससे उपजे रुझान और अपेक्षाओं से भी जोड़ा था। ('हर एक व्यक्ति को अपनी सूची के मुताबिक काम करने की आज़ादी'), लेकिन एक ऐसी आज़ादी जिसके तहत उसे अपनी सूची, अपने काम, अपनी संपत्ति के इस्तेमाल की आज़ादी हो, उस कानून के तहत वह जिसके अधीन आता हो, और निश्चित तौर पर किसी अन्य व्यक्ति की जोर-जबर्दस्ती से नहीं अपनी मर्जी से। दूसरे की मनमानी भरी इच्छा से परे रहने के ही विषय को कांत, कांस्टेंट, स्पेंसर, हायेक और अन्य कई उदारवादियों ने भी उछाला था, समान कानून और समान न्याय की परिधि में अबाधित आज़ादी के साथ। उनके लिए संस्था के बाहर आज़ादी जैसी कोई बात ही नहीं है। (इस लिहाज से, क्वेंतिन स्किनर द्वारा 'परंपरागत उदारवादी' और 'नव-रोमन' के बीच किया गया अंतर अस्वीकार्य लगता है, स्किनर के मुताबिक परंपरागत उदारवादियों का संबंध केवल 'सत्ता और उसके जबर्दस्ती प्रयोग' से ही था, सत्ता पर 'निर्भरता की शर्त' से नहीं, लेकिन यह दावा साफ झूठा है, जैसा कि रुढ़िवादी परंपरागत उदारवादियों के कई बयानों से साफ हो जाएगा)। मैं इस बात को 'आधुनिक' और 'पुराने', व्यक्तिगत और सामूहिक आज़ादी पर चर्चा की संभावना को देखते हुए कर रहा हूं।
- मेरी अंतिम आपत्ति आज़ादी और दौलत जैसे बिलकुल भिन्न बातों को एक साथ रखने पर है। आपत्ति का कारण यह है कि उदारवादियों की पिछली पीढ़ियां इसे उदारतावाद के पतन के मुख्य स्रोतों में से एक मानते थे। ई.एल. गॉडकिन, ने 1900 में द नेशन में लिखते हुए वस्तुओं की बहुतायत के आज़ादी के साथ घालमेल को उदारतावाद पर लगे ग्रहण का जिम्मेदार ठहराया थाः उदारवाद के सिद्धांतों और समादेश (principles and percept) के लिए उस युग के भौतिकवाद की प्रगति तो तय सी थी। सरकार के हस्तक्षेप से मुक्ति मिलते ही इंसान खुद की बेहतरी के अपने पसंदीदा काम में लग गया। इसके बेहतरीन परिणाम आज हमारे चारों ओर देखे जा सकते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि भौतिक सुखों ने नई पीढ़ी की आंखें उन कारणों के लिहाज से मूंद दी है, जिनके कारण यह संभव हो सका। दुनिया की राजनीति में उदारवाद पतन की ओर अग्रसर और लगभग खत्म सी विचारधारा है। आज़ादी और दौलत के बीच संबंध बाधित हो चुके थे और लक्ष्य महज अच्छी बातों को प्रोत्साहन ही रह गया था, जबकि आज़ादी के खास गुणों की अनदेखी की जाने लगी। हरबर्ट स्पेंसर का भी तर्क था कि आज़ादी और अच्छी चीजों को लेकर नाना प्रकार के भ्रमों ने उस 'किस्म के भ्रम को जन्म दिया जिसमें उदारवाद गुम होकर रह गया।' किस लोकप्रिय विचार या इसे प्रभावित करने वाले लोगों के विचारों के लिए उदारवादियों ने इतिहास में परिवर्तन किए? लोगों की शिकायतों का निवारण या इसका कुछ अंश, जो उस युग में लोगों के दिमाग पर सबसे ज्यादा हावी रहता था। बुराई का शमन, जिसे नागरिकों के बड़े समूह ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर महसूस किया। इसे लोगों की बुरी हालत और खुशी की राह की रुकावट माना गया। और चूंकि अधिकांश लोगों के दिमाग में एक सुधरी हुई बुराई हासिल अच्छाई के बराबर होती है, इन उपायों को भी काफी अच्छा मान लिया गया और उदारवादी राजनीतिज्ञों और उदारवादी मतदाताओं द्वारा लोकहित को ही उदारवाद का लक्ष्य मान लिया गया। इससे असमंजस और भ्रम और अधिक बढ़ गया। शुरुआती दिनों में अधिकाधिक लोगों में लोकप्रिय भलाई के कदम का एक चलन सा चल गया। (उन दिनों यह बाधाओं को हटाकर ही किया जाता था)। ऐसा होने लगा कि लोकप्रिय भलाई को ही उदारवादी बाधाओं के शमन से अप्रत्यक्ष तौर पर हासिल की बजाय इसके कारण प्रत्यक्ष तौर पर हासिल बात समझने लगे। और इसे सीधे हासिल करने के लिए वे मूल तौर पर इस्तेमाल तरीकों की बजाय आंतरिक तौर पर विरोधी तरीकों को इस्तेमाल करने लगे।
मैं समझता हूं कि श्मिट्ज और ब्रेनन ऐसे परिणामों को यह कहकर टालना के लिए किसी भी किस्म की आज़ादी को 'प्रोत्साहन' देना सरकार का काम नहीं की बजाय यह कहते हैं कि सरकार को शायद 'सकारात्मक आज़ादी' को अप्रत्यक्ष तौर पर प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके लिए प्रत्यक्ष तौर पर 'नकारात्मक आज़ादी' को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि 'नकारात्मक आज़ादी कुछ अंशों में लाभदायक होती है क्योंकि भले ही यह दोषपूर्ण हो यह सकारात्मक आज़ादी को प्रोत्साहित करने के लिहाज से प्रभावी है।' लेकिन मुझे भय है कि उनका आज़ादी का समृद्धि के साथ घालमेल और अधिक भ्रम का कारण बनेगा। वह भ्रम जिसकी चेतावनी स्पेंसर और गॉडकिन ने 19वीं सदी के अंत में दे दी थी। 20वीं सदी में उदारवाद को एक सुसंगत बौद्धिक और राजनीतिक ताकत के तौर पर खारिज कर दिए जाने का कोई लाभ नहीं हुआ। मैं उम्मीद करता हूं कि हम ऐसी गलती दोबारा नहीं करेंगे।
नोट्स
- "टू कंसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी," इसैया बर्लिन की लिबर्टी से, एड. हैनरी हार्डी (ऑक्सफोर्डः ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2005), पेज 191
- "टू कंसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी," पेज 172,
- वी.आई.लेनिन, "इकानॉमिक्स एंड पॉलिटिक्स इन द इरा ऑफ डिक्टेटरशिप ऑफ द प्रोलेटरिएट," लेनिन के कलेक्टेड वर्क्स में, चौथा अंग्रेजी संस्करण (मास्कोः प्रोग्रेस पब्लिशर्स, 1965)। वॉल्यूम 30, पेज 107-117, http://www.marxists.org/archive/lenin/works/1919/oct.30.htm लेनिन की "वास्तविक आज़ादी" की सोच का खुलासा रॉबर्ट गेलालेती ने किया है, लेनिन, स्टालिन एंड हिटलरः द एज ऑफ सोशल केटोस्ट्रोफी (लंदनः विंटेज बुक्स, 2008), खासतौर पर अध्याय 2, 'ऑन द वे टू कम्युनिस्ट डिक्टेटरशिप।'
- "टू कंसेप्ट्स ऑफ लिबर्टी," पेज 180
- एफ.ए.हायेक, द कांस्टिट्यूशन ऑफ लिबर्टी (शिकागोः यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो प्रेस, 1971), पेज 18
- जोकिम नेबुको, ओ एबोलिसियोनिज्मो (लंदनः अब्राहम किंगडन, 1883) 241, 254
- आज़ादी की उपधारणा को एंथनी डे जेसी ने 'लिबरलिज्म, लूज एंड स्ट्रिक्ट,' द इंडिपेंडेंट रिव्यू, v. IX, नं.3, विंटर 2005, पेज 427-432, http://www.independent.org/publication/tir/article.asp?a=505 पर अच्छी तरह से समझाया गया है।
- जैसा कि एडम स्मिथ ने न्याय के बारे में कहा है, 'केवल न्याय अधिकांश मामलों में महज नकारात्मक नैतिकता होता है और केवल हमें पड़ौसी को नुकसान पहुंचाने से रोकता है। इसमें दूसरे को नुकसान नहीं पहुंचाने वाले व्यक्ति की कोई निजी काबिलियत या गुण नहीं होता। हालांकि वह न्याय के तहत आने वाले तमाम नियमो का पालन करता है। वह सब काम भी करता है जिसके लिए उस पर दबाव बनाया जाता है वरना उसे सजा का भी भय होता है। हम सब बिना कुछ किए खाली बैठकर भी न्याय के तमाम नियमों का पालन कर सकते हैं।' एडम स्मिथ, द थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स (ऑक्सफोर्डः ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1976) पेज 82
- जैसा कि एलगरनन सिडनी ने कहा, 'चूंकि आज़ादी अपनी मर्जी का काम करने का अधिकार है, गुलाम से हमारा ताल्लुक ऐसे व्यक्ति से होता है जो दूसरे की इच्छा के मुताबिक ही काम करता है, वह मौज उड़ा सकता है लेकिन मालिक के ही कहने पर, प्रकृति में गुलाम जैसी कोई चीज नहीं है, अगर वह देश और लोग गुलाम नहीं है तो भला फिर क्यों वे किसी राजकुमार की इच्छा के मुताबिक काम करते हैं।' एलगरनन सिडनी, डिस्कोर्सेस कंसर्निंग गवर्नमेंट, एड. थॉमस जी. वेस्ट (इंडियानापोलिसः लिबर्टी फंड 1996), अध्यायः खंड पांचः टू डिपेंड अपऑन विल ऑफ ए मैन इज स्लेवरी. देखें http://oll.libertyfund.org/title/223/22227/904233 2010-03-09
- जॉन लॉक, टू ट्रीटाइज ऑफ गवर्नमेंट, एड. पीटर लेसलेट (कैम्ब्रिजः कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1988), II, vi, * 58, पेज 306
- क्वेंतिन स्किनर, लिबर्टी बिफोर लिबरलिज्म (कैम्ब्रिजः कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1998), पेज 84
- ई.एल. गॉडकिन, 'द एक्लिप्स ऑफ लिबरलिज्म,' द नेशन, 9 अगस्त 1900, द लिबरटेरियन रीडर में पुनः प्रकाशित, एड. डेविड बोज (न्यूयॉर्कः फ्री प्रेस, 1998) पेज 324-26
- 'द न्यू टोरिज्म,' हर्बर्ट स्पेंसर के पॉलिटिकल राइटिंग्स में, एड. जॉन ऑफर (कैम्ब्रिजः कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1994), पेज 69
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