आज़ादी की अवधारणाएं
आज़ादी का बड़ा मिथक
'आज़ादी' शब्द को लेकर एक आम मिथक है, एक ऐसा मिथक जिसको वामपंथियों ने ही नहीं, दक्षिणपंथियों ने ही नहीं, अनुदार, परिवर्तनवादी, आधुनिक उदारवादी और परंपरागत उदारवादी सभी ने खूब हवा दी। इस मिथक की शुरुआत एक विशिष्टता से होती हैः आज़ादी के दो मूल रुप होते हैं- नकारात्मक और सकारात्मक। नकारात्मक आज़ादी (negative liberty) का संबंध प्रतिबंधों, रुकावटों या बाधाओं से होता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति को संपत्ति की आज़ादी होती है- इसे नकारात्मक आज़ादी माना जाता है-अगर दूसरे उसकी संपत्ति को हासिल न कर सकें या उसके द्वारा इसके इस्तेमाल में हस्तक्षेप न कर सकें तो। इसके विपरीत, सकारात्मक आज़ादी (positive liberty) का संबंध अपनी मर्जी का काम करने की क्षमता या अधिकार होता है या फिर आज़ादी के साथ अधिकारों के इस्तेमाल की इजाजत से। किसी व्यक्ति की संपत्ति की आज़ादी को तभी सकारात्मक आज़ादी माना जाता है, जब वह वास्तविकता में उसका मालिक हो या फिर कुछ अंश पर उसका अधिकार हो। बिल गेट्स और मुझे दोनों को ही याट (yatch) रखने की नकारात्मक आज़ादी है, लेकिन केवल गेट्स में ही याट खरीदने की कूवत है। उनके पास ऐसा कुछ करने की ताकत है, जो मेरे पास नहीं है, इस लिहाज से वह मुझसे ज्यादा स्वतंत्र हैं। अब बात आज़ादी के मिथक की। मिथक यह है कि नकारात्मक आज़ादी, परंपरागत उदारवादियों और आज़ादी के समर्थकों की चिंता का और सकारात्मक आज़ादी को लेकर मार्क्सवादी, समाजवादी और आधुनिक उदारवादी ज्यादा चिंतित होते हैं। कई परंपरागत उदारवादी, सकारात्मक आज़ादी को खारिज कर देते हैं। उनका तर्क होता है कि अपनी मर्जी का काम करने की आज़ादी या फिर फैसले की आज़ादी, कितनी भी कीमती क्यों न हो, आज़ादी का वास्तविक रुप नहीं है। अगर ऐसा होता है तो सरकार को हम पर आज़ादी थोपने के लिए कुछ भी करने की आज़ादी मिल जाएगी। इसके विपरीत, मार्क्सवादियों की शिकायत होती है कि आज़ादी का मतलब अगर केवल हस्तक्षेप नहीं होना है तो आज़ादी का कोई मूल्य या अर्थ ही नहीं रह जाएगा। उनकी राय में नकारात्मक आज़ादी का मतलब गरीब रहने, बेरोजगार रहने और फुटपाथ पर सोने की आज़ादी है। मार्क्सवादी यह भी कह सकते हैं कि कोई एक बेघर के कामकाज में बाधा नहीं डालता, लेकिन उसकी आज़ादी का कोई मतलब ही नहीं है। इन मसलों पर परंपरागत उदारवादी जितने गलत हैं, उतने ही मार्क्सवादी भी।
इसैया बर्लिन इस मिथक के मुख्य प्रतिपादक है। संभव है कि इसके जनक भी वही हों। नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी के बीच अंतर की बात करने के बाद बर्लिन ने तर्क दिया कि आज़ादी के इन दो विचारों को अलग धारणा की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, ये तो सरकार की भूमिका और संभावनाओं को लेकर विरोधी राजनीतिक विचारधाराएं हैं। यह सोच कि आज़ादी को लेकर अलग धारणा ही अलग राजनीतिक ध्रुवीकरण का कारण बनती है, इस शब्द के राजनीतिक अर्थ के चलते नया रुप ले लेती है। यहां मसला भाषा के इस्तेमाल का नहीं बल्कि पुलिस के इस्तेमाल के तरीके का हो जाता है। मिथक अविरत जारी रहता है क्योंकि बहस के दोनों ही पहलू एक ही सोच पर आधारित हैं-आज़ादी-इसका मतलब फिर चाहे जो हो-को सीधे सरकार ही प्रोत्साहित कर सकती है। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि आज़ादी (इसका मायने चाहे जो निकले) को बढ़ावा देना सरकार का ही काम है और दोनों ही इस बात पर भी सहमत हैं कि सरकार को इसे सीधे बढ़ावा देना चाहिए। जब हम कहते हैं कि सरकार को कोई आदर्श (value) स्थापित करना चाहिए तो यह प्रत्यक्ष भी हो सकता है और अप्रत्यक्ष भी। एक उपमा से यह अंतर स्पष्ट हो जाता है। मान लीजिए आपको लगता है कि सरकार का काम कारोबार को बढ़ावा देना है। सरकार नए निगमों, अनुदानों या राहतों, उत्पादों की खरीद के जरिये प्रत्यक्ष मदद कर सकती है या फिर एक संस्थागत आधारभूत ढांचा (जैसे कानून, कोई संवैधानिक प्रतिनिधि लोकतंत्र, अदालत या संपत्ति के अधिकार का एक ढांचा) तैयार करके अप्रत्यक्ष मदद भी कर सकती है।
इस सोच पर कि सरकार को आज़ादी को सीधे तौर पर बढ़ावा देना चाहिए, यह तय करना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि कौनसी आज़ादी वास्तविक है, या ज्यादा महत्वपूर्ण है। इस सोच पर कि 'आज़ादी' का सबसे अच्छा स्वरुप 'खुद के लिए चुनने की आज़ादी है' वाकई सरकार को हमें स्वतंत्र होने के लिए मजबूर करने का अधिकार दे देगा। वैसे यह सोच अच्छी नहीं है। सरकार की भूमिका-या किसी अन्य संस्थान की भी-को आज़ादी के संरक्षक या प्रेरक के तौर पर स्थापित करने के लिए तर्क भी ठोस होना चाहिए। इसके लिए जरुरी है कि सरकार की अच्छी तरह से काम करने की क्षमता (और किस तरह से) के आकलन के लिए हम ऐतिहासिक, आर्थिक, विधिसम्मत और सामाजिक सबूतों को जांचें। सरकार को एक विशेष किस्म की आज़ादी को बढ़ावा देने का काम तभी मिलता है, जब वह ऐसा करने के लिए सर्वश्रेष्ठ विकल्प हो। हम इस बिंदु पर आगे और बात करेंगे।
सकारात्मक और नकारात्मक स्वतंत्रता
बर्लिन ने सकारात्मक/नकारात्मक आज़ादी के अंतर को गढ़ा था। (हकीकत में तो उनका इसका इस्तेमाल हमारे द्वारा वर्णित परिभाषा से कुछ अलग था। हालांकि यह बर्लिन के मूल विचारों से थोड़ा ही अलग है)। नकारात्मक/सकारात्मक अंतर स्वाभाविक तौर पर यही सुझाता है कि नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी की श्रेणियां संयुक्त तौर पर सभी संभावनाओं को खंगाल देती हैं। ऐसा नहीं है, बर्लिन कहते हैं कि इतिहासकारों ने इस शब्द (आज़ादी) के इस्तेमाल के 200 तौर-तरीके दर्ज करके रखे हैं और वह इनमें से केवल दो प्रमुख के बारे में ही लिख रहा है। यहां हम लोगों द्वारा 'आज़ादी' के इस्तेमाल में से कुछ दे रहे हैं-
नकारात्मक स्वतंत्रता
- हॉब्स की राय में आज़ादी का मतलब 'बाहरी रुकावट का अनुपस्थिति' है।1 हॉब्स के इस विचार के आधार पर हम ज्यादा करीबी परिभाषा दे सकते हैं।
- आज़ादी का अर्थ दूसरे लोगों द्वारा थोपी गई रुकावटों का अनुपस्थिति है।
- और सुस्पष्ट तरीके से हम यह परिभाषा दे सकते हैं कि आज़ादी का अर्थ दूसरे लोगों द्वारा जानबूझकर डाली गई रुकावटों की अनुपस्थिति है।
- या फिर हम आज़ादी को दूसरे लोगों द्वारा गलत तरीके से डाली गई रुकावटों की अनुपस्थिति के तौर पर परिभाषित कर सकते हैं।
आज़ादी की नकारात्मक धारणा को लेकर ऐतिहासिक संयोग ही यह बता सकेगा कि किस किस्म की आज़ादी से लोगों की जिंदगी खुशहाल या स्वस्थ या संपन्न बनी। नकारात्मक आज़ादी से हमारे हालात सुधरने की कोई गारंटी नहीं होती, लेकिन विटामिन सी और वर्जिश भी ऐसी कोई गारंटी नहीं होती-इसलिए गारंटी की तो बात ही न की जाए। नकारात्मक आज़ादी में आज़ादी से मिलने वाली गारंटी की बात कम और आज़ादी से लोगों को अपने लिए काम करने के लिए मिलने वाले मौकों की चर्चा ज्यादा है। गारंटी के अभाव के बावजूद समाज शास्त्र और इतिहास इस बात का खुलासा कर देते हैं कि नकारात्मक आज़ादी के सम्मान का जीवन बेहतर बनाने के लिहाज से लंबा, कामयाब और सुरक्षित रिकार्ड है। इससे यह निष्कर्ष निकल सकता है कि सकारात्मक आज़ादी के प्रोत्साहन के लिए नकारात्मक आज़ादी का संरक्षण जरुरी है। खैर वैसे भी हम नकारात्मक आज़ादी के लोगों पर प्रभाव की बहस में केवल वैचारिक स्तर पर विश्लेषण से कुछ हासिल नहीं कर सकते।2
हमें इस बात को जांचना होगा, जब नकारात्मक आज़ादी को पर्याप्त तौर पर सुरक्षित बना दिया जाता है तो लोगों का क्या होता है और जब ऐसा नहीं होता है तो क्या होता है। मतलब यह कि अगर आपको नकारात्मक आज़ादी की उपयोगिता को जांचना है तो आपको अपनी आराम की कुर्सी छोड़कर मैदान में उतरना होगा।
सकारात्मक स्वतंत्रता
- सकारात्मक तौर पर बात की जाए तो हम आज़ादी को अपनी मर्जी का काम करने की ताकत के तौर पर परिभाषित कर सकते हैं। बर्लिन इसे दूसरे लोगों द्वारा उत्पन्न असहायताओं को छोड़कर सामान्य मामलों में राजनीतिक आज़ादी (चाहे सकारात्मक या नकारात्मक) का ही विश्लेषण करार देकर खारिज कर देंगे।3 फिर भी, अगर ऐसी असहायता का राजनीतिक आज़ादी पर कोई असर न हो तो वे सकारात्मक आज़ादी के वैचारिक परिदृश्य का ही हिस्सा बने रहते हैं।
आज़ादी के इस सकारात्मक, क्षमता जनक नजरिये के बाद भी यह संयोग की ही बात होती है कि आज़ादी बढ़ने से क्या जीवन बेहतर होता है। एक बच्चे और एक वयस्क के तौर पर हममें से कुछ लोगों की इच्छाएं आत्मघाती होती हैं और ऐसे में हमारी मांग को पूरा करने की ताकत हमारे लिए अच्छी नहीं होती। यह हमारे लिए अच्छी है या नहीं, यह हमारी इच्छा और हमारी परिपक्वता के स्तर पर निर्भर होगी।
(नोटः हमें ज्यादा उत्साह दिखाते हुए इस निष्कर्ष पर कतई नहीं पहुंचना चाहिए कि अगर अपनी कुछ इच्छाओं को पूरा करने के लिए मुझे अधिकार देना हानिकारक है तो मेरे लिए यही बेहतर होगा कि नौकरशाहों और पुलिस को मुझे इन इच्छाओं की पूर्ति से रोकने का अधिकार दे दिया जाना चाहिए)।
केवल वैचारिक विश्लेषण से ही हम यह इस बहस के निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकते कि सकारात्मक आज़ादी का लोगों के जीवन पर क्या असर पड़ता है। हमें इस बात की जांच करना होगी कि सकारात्मक आज़ादी का लोगों की जिंदगी में मौजूदगी या गैरमौजूदगी का क्या असर पड़ता है। दूसरे शब्दों में, अगर आप जानना चाहते हैं कि सकारात्मक आज़ादी कितनी मूल्यवान है तो आपको आरामकुर्सी छोड़कर खुद जाकर जांचना होगा। हम आसानी से ऐसी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं, जहां लोगों को ढेर सारी सकारात्मक आज़ादी मिली हुई है, लेकिन फिर भी उनकी जिंदगी काफी मुश्किलों भरी है। हालांकि वास्तविकता में, होना तो यह चाहिए था कि जिन लोगों की जिंदगी में सकारात्मक आज़ादी थी, उन्हें खुश होना चाहिए। किसी भी स्तर पर दर्शनशास्त्र से इस बहस का फैसला नहीं हो सकता। - पिछली ही परिभाषा को नैतिक आधार बनाकर हम कह सकते हैं, आज़ादी को सही काम करने का अधिकार करार दे सकते हैं,
- या हम 'आज़ादी' को सही बात करने का अधिकार कह सकते हैं, जो किसी भी तरह के लालच से परे है।
- हम इससे ही जुड़े विचारों के एक मिलते-जुलते समूह की कल्पना कर सकते हैं, जिसके मुताबिक आज़ादी अपनी मर्जी का काम करने की ताकत है, जिसमें खुद थोपी हुई बातें (दूसरे शब्दों में किसी वचन, या ज्यादा सामान्य शब्दों में कहा जाए तो जो योजनाओं, वादों, भावनात्मक बंधन या फिर ऐसा विचार जो उस बदल चुके व्यक्ति से मेल न खाता हो) से स्वतंत्र हो।
सकारात्मक आज़ादी की इस सोच से एक चिंताजनक और किसी लिहाज से महज सैद्धांतिक नहीं रह गई गुत्थी का ही खुलासा होता है। मुख्य रुप से हमारे पास वास्तविक विकल्प हो सकते हैं और फिर भी यह अपर्याप्त प्रेरणा, अपर्याप्त स्वतंत्र निर्णय या हमारे विकल्प और क्षमता के बारे में अपर्याप्त जानकारी-काफी हद तक हमारे लक्ष्य की प्रामाणिकता के अभाव जैसे कारकों से नाकामी में बदल सकते हैं। हमारे पास उपलब्ध विकल्पों के लिहाज से हमें बहुत ज्यादा या बहुत कम बातों की जरुरत हो सकती है। कुल मिलाकर, आज़ादी की राह में आने वाली तमाम रुकावटें बाहरी ही नहीं होती। मनोवैज्ञानिक आज़ादी और इसके आज़ादी के अन्य स्वरुपों के साथ संबंध, हामरी नई किताब ए ब्रीफ हिस्टरी ऑफ लिबर्टी (1) के अंतिम अध्याय का विषय है। हम सकारात्मक और नकारात्मक आज़ादी की बात को जारी रख सकते हैं, लेकिन हम इस बात से भी अवगत हैं कि बर्लिन और उनके आलोचकों ने इस बात पर जोर दिया है कि सकारात्मक बनाम नकारात्मक आज़ादी महज एक विरोधाभासी विचार है। नकारात्मक और सकारात्मक आज़ादी को संबंद्ध विचारों के समूह के तौर पर देखा जा सकता है। और फिर फिलिप पेटिट की आज़ादी की संकल्पना जैसी धारणाएं भी हैं, जिनकी आज़ादी के गैर-प्रभुत्व वाला होने की बात सभी वर्गों से अलग है।
संकल्पना या धारणा का चयन
लोग 'आज़ादी' शब्द का इस्तेमाल विभिन्न बातों की एक श्रृंखला के जिक्र के लिए करते हैं। वक्त पर आधारित आज़ादी की संकल्पना किसी एक कारण से ही वक्त विशेष के लिए होती है। वे आम सोच में कई बार अलग, समकालीन भूमिका निभाती हैं। इन सभी संकल्पनाओं और धारणाओं के मूल को पहचानने का भी मूल्य है, लेकिन इनके अंतर से भी काफी-कुछ हासिल किया जा सकता है। इन सभी आज़ादीओं को हासिल करने के लिए लोगों ने कुछ हद तक संघर्ष किया ही है। इन सभी संदर्भों में आम आदमी का सरोकार आज़ादी से है और ये सभी एक-दूसरे से संबंधित हैं, भले ही एक समान न हों। कुछ विचारकों की राय में किसी भी समाज की शुरुआत के लिए संरक्षित नकारात्मक आज़ादी का एक न्यूनतम स्तर होता है, जो कई पीढ़ियों से गुजरने के बाद सकारात्मक आज़ादी में धमाकेदार लाभ देता है। अन्य गारंटी चाहते हैं और उनकी राय में केवल नकारात्मक आज़ादी के तंत्र में यह गारंटी नहीं होती। हो सकता है कि मैं सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त हूं, किसी जातिगत प्रणाली से मुक्त हूं, फिर भी महज गरीब होने के कारण हो सकता है कि मैं ज्यादा कुछ न कर सकूं।
ऐसे मसले वास्तविक हैं, इसलिए नकारात्मक आज़ादी की बहस को केवल शाब्दिक या पारिभाषिक विवाद तक ही सीमित रखना शर्मनाक होगा। शायद, हकीकत में नकारात्मक आज़ादी गरीबी का कारण बनती है। हम इस बात को कैसे जान सकते हैं? केवल परिभाषाओं से छेड़छाड़ से ऐसा संभव नहीं होगा। किसी बात को परिभाषित करने का मकसद उसे समाप्त करना नहीं बल्कि बहस के लिए आधार तैयार करना हैः ऐसा कुछ न करें कि जिससे यह निष्कर्ष न निकाल लिया जाए कि नकारात्मक आज़ादी परिभाषा से ही हमें समृद्धि की ओर ले जाती है, बल्कि जरुरत है कि हम हर सवाल को जवाबदेह बनाएं। उदाहरण के लिए, ऐसी जगहों पर जहां पसंद के रोजगार को तलाशना ज्यादा आसान (कम अप्रवासी प्रतिबंध, कम लाइसेंस प्रणाली या यूनियन मेंबरशिप की कम जरुरतें) हैं, क्या वहां पर कम बेरोजगार हैं? अगर ऐसा है, तो हम इस निष्कर्ष (किसी तर्कशास्त्री की तरह नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक की तरह जो अनुभवजन्य बातों से सावधानीपूर्वक संबंधों को ताड़ लेता है) पर पहुंच सकते हैं कि उस लिहाज से तो नकारात्मक आज़ादी सकारात्मक तौर पर आज़ादी मुहैया करा रही है। हम नकारात्मक आज़ादी के कुछ तय स्वरुपों के परिणामों को लेकर अच्छी तरह से परिभाषित सवाल उठा सकते हैं। जैसे व्यापार प्रतिबंधों से आज़ादी या फिर सरकारी तौर पर लादा गया धर्म। अगर हम रुझानों के दस्तावेज तैयार कर सकें तो रुझान के वास्तविक होने या फिर दुनिया के इससे दूर जाने जैसी बहसों में उलझने की बजाय हमने समझ की राह में आ रही बाधाओं को कम ही कर लिया होगा-जो कि दर्शनशास्त्र में वास्तविक लक्ष्य होता है।
सरकार की भूमिका
सकारात्मक आज़ादी को आज़ादी के वंश की एक मूल्यवान प्रजाति मान लेने भर से हमारी इस सोच की प्रतिबद्धता का खुलासा नहीं होता कि आखिर किस किस्म की सरकार इसे बेहतर बढ़ावा दे सकती है। हम बर्लिन की इस चिंता को साझा करते हैं कि सरकार को सकारात्मक आज़ादी को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ भी करने का लाइसेंस दे दिया जाना चाहिए। (वास्तविक दुनिया में, सरकारी अधिकारी को किसी काम 'अ' को करने का अधिकार देने का मतलब होता है कि उम्मीद है कि वह काम 'अ' कर देगा, यह जानते हुए कि ऐसा अधिकारी भले ही कोई भी हो, वह काम 'अ' करने का भरपूर दिखावा करते हुए इस अधिकार का प्रयोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए करेगा)। अब तक आज़ादी की जितनी भी संकल्पनाओं या धारणाओं की चर्चा की गई है, यह नहीं कहते कि इस किस्म की आज़ादी का संरक्षण सरकार का कर्तव्य है। शब्दों को परिभाषा का जामा पहना देने से किसी विशेष किस्म की आज़ादी के लिए सरकार की संरक्षक या प्रोत्साहक के तौर पर भूमिका तय नहीं हो जाती। कांस्टेंट और बर्लिन ने आज़ादी की विभिन्न संकल्पनाओं को विभिन्न राजनीतिक विचारधारा बताकर जो चेतावनी दी है, उसका आशय यह कतई नहीं है कि आज़ादी को लेकर अलग संकल्पना का मतलब अलग सरकारी आदेश है। बल्कि आशय यह है कि संभावित बातों की साधारण संकल्पना या दांव पर क्या लगा है जैसी बातों से हम लोगों में यह अतिआत्मविश्वास भर देते हैं कि किसी परिणाम को राजनीतिक सत्ता के निर्माण के बाद ताकत से हासिल किया जा सकता है।
कई लोगों का मानना है कि सरकार का काम हमें एक संतोषजनक स्तर की आज़ादी की गारंटी देना है। हालांकि किसी तय मान लिए गई बात की गारंटी (जैसे जब कोई अर्थशास्त्री कहता है कि न्यूनतम पारिश्रमिक को दोगुना करने से बेरोजगारी बढ़ेगी) और सरकार द्वारा कोई पक्का इरादा जाहिर करते हुए दी गई गारंटी में फर्क है। साफ तौर पर दूसरे मामले में दी गई गारंटी वास्तविकता में कोई गारंटी ही नहीं है। एक ऐसी दुनिया की कल्पना कीजिए जहां जब कभी भी सरकार किसी बात की गारंटी देती है कि लोगों का एक तय स्तर तक भला हो जाएगा, एक दुष्ट राक्षस (दूसरे शब्दों में गारंटी) यह बात तय कर देगा कि ऐसा नहीं हो। उस दुनिया में अगर आप लोगों की भलाई चाहते हों तो आप गारंटी नहीं देना चाहेंगे। आप लोगों को बेहाल होने की अनुमति देंगे, दुष्ट राक्षसों से भरी दुनिया में बेहतरी के लिए यही एक विकल्प होगा। निश्चित तौर पर हम दुष्ट राक्षसों की उस दुनिया में नहीं रहते, इसलिए उस बारे में बात बेमानी होगी। फिर भी कई वास्तविक कारक सर्वश्रेष्ठ योजनाओं या वादे को बाधित, भ्रष्ट या फिर विकृत कर सकते हैं। इसलिए ऐसी दुनिया की कल्पना जहां पर भ्रष्टाचार या अनसोचे परिणाम न हों- जैसा कि कुछ विचारक करना चाहते हैं- दुष्ट राक्षसों की दुनिया की कल्पना करना जितना ही रोचक होगा। हमें इस बात को भी जांचना होगा कि हमारी दुनिया में कानून से मिलने वाली गारंटियां कितनी कारगर हैं। हम सरकार से उसी स्तर तक गारंटी चाहते हैं जितने तक कि वह कारगर हो।
केवल इतना ही व्यावहारिक परिणाम हमारे शब्दों को परिभाषित करने पर निर्भर होता है। इसके विपरीत अधिक कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपनी जिंदगी अपने समाज से क्या चाहते हैं-क्या हम अपनी ही योग्यता के आधार पर स्वतंत्र रुप से खड़े होना या गिरना चाहते हैं या हम निजी जिम्मेदारियों से उपजने वाले जोखिम और लागत से बचना चाहते हैं। काफी-कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम आखिर अपनी सरकार को कितना अधिकार देना चाहते हैं यानी हम इस बात को लेकर कितने आश्वस्त हैं कि इसका इस्तेमाल हमारे या हमारे बच्चों के खिलाफ नहीं किया जाएगा।
हम सोचते हैं कि नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही किस्म की आज़ादी के मायने हैं। कुछ हद तक नकारात्मक आज़ादी की जरुरत है क्योंकि यह भले ही सकारात्मक आज़ादी को प्रोत्साहित करने के लिहाज से दोषपूर्ण हो, लेकिन प्रभावी तो है ही। परिणाम विचारों की आज़ादी, लोगों से जुड़ने की आज़ादी, फर्मों में काम का बंटवारा और फर्मों के बीच काम विशेष की निपुणता का ऐसा बंटवारा जिससे समाज सहयोग, निजी आत्मनिर्भरता से परे जाने वाला अकल्पनीय जटिल जाल बन जाए। यह सुनने में भ्रमजाल की तरह लगता हो, लेकिन वास्तविकता में यह सकारात्मक आज़ादी में ही योगदान है क्योंकि समाज में जब कुछ तय भूमिकाएं निरर्थक (redundant) हो जाती हैं तो व्यक्ति विशेष का विकास किसी सेवा को मुहैया कराने वाले किसी एक व्यक्ति विशेष पर निर्भर नहीं रह जाता। आज़ादी एक-दूसरे पर निर्भरता के इस जटिल जाल के विकास के साथ ही ज्यादा विकसित हो सकती है। ए ब्रीफ हिस्टरी ऑफ लिबर्टी (1) इन वास्तविक विकल्पों की पूर्व शर्त के धीरे-धीरे साथ आने की कहानी है।
- डेविड स्मिट्ज और जेसन ब्रेनन
नोट्स
- थॉमस हॉब्स, लेवियाथान. इंडियानापोलिसः हैकेट (1994)-79। यहां हॉब्स प्रकृति के अधिकार की रुकावटों की तुलना लोगों की स्वरक्षण के लिए सबसे बेहतर करने की आज़ादी से कर रहे हैं।
- हम इस बात को स्वीकारते हैं कि केवल वैचारिक विश्लेषण से ही किसी खास किस्म की आज़ादी का वास्तविक मूल्य पता चलता है।
- बर्लिन यह बात नकारात्मक आज़ादी पर एक परिचर्चा में कहते हैं, लेकिन यह सुझाव नहीं देते कि वे ऐसी असमर्थता को किसी किस्म की आज़ादी का अभाव मानेंगे।
- पेटिट, फिलिप (1997) रिपल्बिकनिज्मः ए थ्योरी ऑफ फ्रीडम एंड गवर्नमेंट. न्यूयॉर्कः ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।
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