आधुनिक बनाम पाश्चात्य

'आधुनिक' और 'पाश्चात्य' के बीच भेद जानने की असमर्थता ही हमारे दुख का कारण है। सभी बुद्धिजीवी तथा सभ्य मनुष्यों की आलोचनात्मक सोच केवल पश्चिम की पूंजी नहीं है बल्कि सर्वव्यापक है तब हमें उस पर इतना दुखी नहीं होना पड़ेगा। हमें अपनी शक्ति को अच्छे कामों के लिए बचाकर रखना चाहिए न कि उसे स्वदेशी, हिंदुत्व, भारतीय भाषा पर विवाद, अमेरिका पर टिप्पणी, विदेशी पूंजी निवेशकों पर कटाक्ष आदि बेकार के मुद्दों पर बरबाद करना चाहिए। उन्नीसवीं शताब्दी में राजा राममोहन राय द्वारा शुरू आधुनिकीकरण तथा पश्चिमी सभ्यता के बीच विवाद आज भारतीय जनता पार्टी के उत्थान से और प्रचंड हो गया है। भावों की उलझनें हमें विदेशी व्यापार तथा पूंजी निवेश के बीच परस्पर विरोधी धारणाओं में बांध देती हैं। ये हमें वैश्वीकृत दुनिया में सुरक्षा की गुहार करने के लिए प्रेरित करती हैं। इससे हमारी आर्थिक सुधारों के प्रति अनुक्रिया धीमी पड़ जाती है तथा एक प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था बनाने की सक्षमता कम हो जाती है। इस मुद्दे के मूल में भारतीय परंपरा, संस्कृति तथा रहन-सहन के खो जाने का एक डर-सा है। मगर यह हर अक्सर पश्चिम के समक्ष हीनता का लक्षण है, खासतौर से पुरानी पीढ़ी के साथ शासन कर रही है।

आश्चर्यजनक रूप से उन्नीसवीं शताब्दी के हमारे कई बुद्धिजीवियों ने इस भेद को अच्छी तरह समझा और हमारी परंपराओं का आलोचनात्मक अध्ययन कर, इसे इस्तेमाल कर, उन सभी संगठनों तथा रीतियों को खत्म कर दिया जिन्होंने इतनी शताब्दियों से अस्थिरता और अंधविश्वास के सहारे इसकी आत्मा को विकृत कर दिया था। इसी प्रकार की आज की नई पीढ़ी आत्मविश्वासी व व्यावहारिक होती नजर आ रही है जो उपनिवेशवाद से प्रभावित भी नहीं है। उदाहरण के तौर पर मेरे पड़ोसी की बेटी निर्यातक है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में रोजाना भाग लेती है। जब वह अपने विंडोज सॉफ्टवेयर पर काम करती है तो अपने ग्राहकों की नागरिकता या वह कहां रहते हैं, जाने बिना उनके अंग्रेजी में पूछे गए सवालों का जवाब देती है तथा अपने मूल्यों का उल्लेख डॉलरों में करती है। वह अपने-आप को छोटा महसूस नहीं करती क्योंकि अंग्रेजी इंग्लैंड की भी राष्ट्रीय भाषा है, डॉलर अमेरिका की राष्ट्रीय मुद्रा है और विंडोज की उत्पत्ति सिएटल में हुई। उसकी कामकाजी दुनिया में, अंग्रेजी व्यापार की एक विश्व व्यापक भाषा, डॉलर विश्व व्यापार की मुद्रा तथा विंडोज संचार का माध्यम है।

जब मैं बारह वर्ष का था तब मेरी मध्यवर्गीय बुआएं दिल्ली में हमारी आकर्षक पड़ोसन के बारे में लगातार बातें करती थीं। ''तुम यह कहना चाहती हो कि तुम उसे नहीं जानतीं? वह एक आधुनिक महिला है। वह सिगरेट पीती है, वह शराब पीती है और यहां तक कि पुरुषों के साथ नाचती भी है।'' एक साल बाद हम वहां से आगे गए और उनकी पड़ोसन को पीछे छोड़ आए। मगर मैं 'आधुनिक' शब्द के गलत अर्थ के साथ बड़ा हुआ। मेरी बुआओं के लिए 'आधुनिक' शब्द का अर्थ है, किसी के द्वारा पश्चिमी सभ्यता को उसके गलत और बनावटी उसूलों को यानी हमारे भगवान से डरने वाली परंपराओं के विपरीत अपनाना, मगर मेरी बुआओं की यह सोच असामान्य नहीं थी। मैंने 1965 में न्यूयॉर्क रिव्यू ऑफ बुक्स में एक विज्ञापन में  एक उत्तेजक उपन्यास के बारे में पढ़ा जो केवल डाक द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता था, इस विज्ञापन में किताब की व्याख्या 'आधुनिक अमेरिकी विवाह की कहानी' के रूप में की हुई थी। इस विज्ञापन में जो 'आधुनिक' का मतलब दिया था वह सही नहीं था जैसे कि नारी की महत्वाकांक्षाएं उसका आक्रामक रूप तथा उसके अविश्वास।

कॉलेज में मैंने पाया कि जरूरी नहीं है कि 'आधुनिक' का मतलब नकारात्मक या पाश्चात्य है। जिस शब्द का हम आज इस्तेमाल करते हैं, वह उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप में उस वक्त उत्पन्न हुआ जब पश्चिमी समाज में चकित कर देने वाले परिवर्तन हो रहे थे। अर्थव्यवस्थाओं का औद्योगीकरण हुआ, स्वतंत्र राज्यों का गठन हुआ, सामाजिक प्रजातंत्र उभरा, राष्ट्रीय दफ्तरशाही उत्पन्न हुई और इस प्रकार विश्व ने विशाल समाज के उत्पन्न होने की शुरुआत देखी। इन सभी तेज रफ्तार से होते हुए बदलावों को एक अर्थ देते हुए इतिहासकारों ने निष्कर्ष निकाला कि वे सब एक-दूसरे से संबंधित थे। सही शब्द न मिलने के कारण उन्होंने उसे आधुनिकता का नाम दे दिया। इसके अलावा उन्होंने इन बदलावों को गुणों और संस्थाओं के एक समूह के रूप में उदार स्वीकृति से जोड़ दिया जिसका नाम उन्होंने 'आधुनिक' रखा। अठारहवीं शताब्दी में नैतिकता के फूल खिले और फ्रांसीसियों ने समता, स्वाधीनता और बंधुता की क्रांति छेड़ी। नैतिक गुणों में व्यक्तिवाद, तर्क-शक्ति, धर्मनिरपेक्ष प्रवृत्ति (धर्म से परे), कानूनी नियम (अलग-अलग राजाओं के प्रति वफादारी के बजाए), प्रतिनिधित्व सरकार और बाजारू अर्थव्यवस्था में विश्वास था। इस विश्वास के पीछे मनुष्य के हालात सुधरने की एक आशावादी भावना थी।

जब हमारा देश आजाद हुआ, तब गांधीजी की इच्छा के विपरीत शिक्षित भारतीयों के बीच यह मत था कि अगर हमें सफल होना है तो हमें आधुनिक समाज का गठन करना पड़ेगा। हमें एक मजबूत स्वतंत्र राज्य तथा उसके प्रशासन के लिए एक प्रभावशाली नौकरशाही बनानी है तथा हमें सांप्रदायिक शांति बहाल करने के लिए धर्मनिरपेक्ष होना पड़ेगा, हमें सामाजिक प्रजातंत्र को बढ़ाने के लिए निचली जाति के लोगों को ऊपर उठाना होगा, हमें समता लाने के लिए प्रजातंत्र में व्यापक मताधिकार का प्रयोग करना होगा। इन सभी को साकार करने के लिए आधुनिकता के गुणों को 1950 में भारत के संविधान में संचित किया गया।

1950 के साल हमारे इतिहास में बहुत महत्व रखते हैं क्योंकि शिक्षित मध्यवर्गीय लोग इन आधुनिक गुणों को बहुत मानते थे। मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि मध्यवर्ग के लोगों में बहुत से लोग यह सोचते थे कि हम एक बेहतर समाज की रचना कर सकते हैं इसलिए वर्ष 1950 में वस्तुत: हमारे हजार साल पुराने समाज, जबकि पढ़े-लिखे पहुंच वाले सिर्फ अपने निर्वाण और उत्थान के बारे में ही सोचते थे, के बीच एक विभाजन रेखा खिंच गई। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में राजा राममोहन राय से शुरू करते हुए महात्मा गांधी की राष्ट्रीय लड़ाई तथा आजादी को मिलाते हुए हमें यह अहसास हुआ कि आधुनिक होने के लिए समाज में सुधार होना बहुत जरूरी था। आजादी के बाद हमारे शासकों ने कम-से-कम कुछ पहल के लिए इन सिद्धांतों पर ईमानदारी से अमल किया।

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