कलाकार और राजनीति...

कहते हैं इनसान की पहचान उसके कर्मों से होती है। यह कथन कदम सही भी है, तभी तो अमिताभ आज एक महानायक हैं और नरेंद्र मोदी को धर्मनिरपेक्षतावादी और सभ्य समाज की दरकार रखने वाले लोग फूटी आंख पसंद नहीं करते। ऐसे में दोनों के साथ आने से चिंगारी तो फूटनी ही थी। ऐसा हुआ भी। अमिताभ गुजरात टूरिज़्म के लिए एम्बेसडर बने तो मीडिया समेत कांग्रेस ने तीव्र प्रतिक्रिया जताई ।

भारत में जहां चेहरों की पूजा होती है, वहां इस तरह की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक थी। हालांकि अमिताभ का कहना है कि वे बिना किसी स्वार्थ के मोदी के साथ जुड़े हैं, लेकिन इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर हित तो जुड़े ही होते हैं। बहरहाल, अमिताभ का गुजरात के लिए इस तरह काम करना कई लोगों को नापसंद हो सकता है लेकिन उनका इस तरह विरोध किया जाना किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात भी तो है। भारत में हर कोई अपनी मर्जी से अपनी राह चुनने के लिए आजाद है, अमिताभ ने भी वही किया जो उन्हें ठीक लगा। लेकिन कांग्रेस द्वारा उन्हें एकदम से अस्पृश्य करार दिए जाने को भी सही कदम नहीं माना जा सकता।

इस पूर प्रकरण को देखकर तो यही लगता है कि यह एक उच्चकोटि का राजनैतिक तमाशा ही है। बेशक, मीडिया अपने हित साध रही है, मोदी अपने राज्य के लिए महानायक का प्रयोग कर रहे हैं, महानायक अपने किन्हीं हितों के चलते इस ओर बढ़े हैं और कांग्रेस की प्रतिक्रिया राजनीति से प्रेरित है, लेकिन यह प्रश्न तो पैदा होता ही है कि अमिताभ का, बाल ठाकरे और नरेंद्र मोदी सरीखे लोग जोकि सभ्य समाज के खिलाफ बात करने वाले हैं, दामन थामना उचित है?

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