रविन्द्रनाथ टैगोर

व्यक्तित्व एवं कृतित्व

[जन्म 7 मई 1861 – निधन 7 अगस्त 1941]

ये कवि-दार्शनिक दिल से पूरी तरह मानवतावादी था। वैश्विक शांति, भाईचारे और आध्यात्मवाद के लिए लगाव उनके रचनात्मक कार्यो में बखूबी झलकता है। उन्होंने धर्म में संप्रदायवाद का विरोध किया और वे विज्ञान के विध्वंसात्मक प्रयोग से भी काफी आहत थे। उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता से प्रेरित भौतिकतावाद का विरोध किया जिसे आक्रामक वैयक्तिकतावाद से चित्रित किया जाता था। वे पहले एशियाई नागरिक थे जिन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।

उनकी रुचि विभिन्न विधाओं में थी। उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में यादगार लेखन कार्य किया। चाहे वे नाटक, कविताएं, उपन्यास, कहानियां या निबंध हों। इनकी रचनाओं का लगातार अनुवाद होता रहा है और इन पर जमकर टीका भी लिखी गई हैं। शिक्षा में रुचि के परिणामस्वरूप उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की, जिसका स्वरूप अपने आप में अद्वितीय है। यहां यूरोप और चीन की प्रसिद्ध फेकल्टी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं। साथ ही भारतीय प्रोफेसरों को भी भुलाया नहीं जा सकता। उनके गीत आज भी उसी तरह प्रसिद्व हैं जैसे उनके समय में हुआ करते थे।

साभार: इंडियन लिबरल ग्रुप

एस एन मजूमदार की पुस्तक "रविंद्रनाथ की स्वदेश भावना" से साभार आलेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.