कैसी पंचायत?...
अगर पुरानी मान्यताओं पर नजर डालें तो पाएंगे कि पंचों को परमेश्वर माना जाता है और ऐसे में पंचायतों का फैसला यानी भगवान का फैसला। अगर यह पंच रुपी भगवान ही खुद को मिले अधिकारों का सदुपयोग न करें, तो इस जमीनी व्यवस्था के पीड़ितों के लिए क्या मायने रह जाते हैं? इस संबंध में उत्तर प्रदेश के दो ताजातरीन मामले बखूबी अपनी जुबानी काफी कुछ कह जाते हैं।
एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के धौलाना थाना क्षेत्र के शौलाना गांव में एक डॉक्टर ने एक लड़की को घर में अकेली पा उसके साथ बलात्कार किया। लोक-लाज से बचकर परिजनों ने पुलिस में सिर्फ छेडछाड़ का ही मामला दर्ज कराया। लेकिन पंचायत ने दुष्कर्म करने वाले शख्स को सिर्फ पांच जूते लगाकर ही गुनाह से मुक्ति दे दी। लेकिन परिजनों की इस फैसले के बाद पांव तले की जमीन खिसक गई तो उन्होंने पंचायत के फैसले से क्षुब्ध होकर थाने में दुष्कर्म का मामला दर्ज करवा दिया। पुलिस ने पंचायत प्रमुख के खिलाफ अमानवीय व्यवहार का केस रजिस्टर किया। हालांकि दोषी अब भी आजाद घूम रहा है।
अब ग्रेटर नोएडा की खबर देखें, एक फरार प्रेमी जोड़े को लेकर पंचायत ने आदेश दिया है कि इन्हें सामने लाया जाए और उनकी हरकत के लिए पंचायत भरी सभा में उनकी आंखें निकालवा देगी। यही नहीं, अगर लड़के का मामा अपने भांजे को गांव लाने में सफल नहीं रहता है तो पंचायत ने उसे भी गोली मार देने की चेतावनी दी है। जब पुलिस ने पंचायत के खिलाफ मामला दर्ज किया और दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया तो ग्रामीणों ने पुलिसकर्मियों पर हमला कर उन्हें छुड़ा लिया। यानी पुलिस-प्रशासन की धज्जियां उड़ा दीं।
यानी अभी जमीनी स्तर पर न्याय दिलाने के प्रयासों की दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है क्योंकि दोनों ही मामलों में पंचायत ने मामले की गंभीरता को नजरअंदाज किया। साथ ही तालिबानी अंदाज में बहुत ही मूर्खाना फैसले दिए। आए दिन पंचायतों की ओर से आने वाले इस तरह के फैसले भारतीय समाज में व्याप्त लोक-लाज की रूढि़यों को व्यक्त करते हैं। देश में पंचायतों को और अधिक सशक्त बनाने की बात कही जाती है, लेकिन इस तरह के फैसले उनके स्वरूप और चरित्र पर वाकई प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। यहां तो पंचायतें ही शुरूआती स्तर पर जुर्म के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने और तालिबानी परंपरा को अधिक रूढ़ करने के काम को अंजाम दे रही हैं।
- ऐसे में क्या आपको लगता है कि पंचायत के स्वरूप में अभी बदलाव की जरूरत है?
- क्या उत्तर प्रदेश की इन दो पंचायतों के अलग-अलग फैसले सही हैं?
- क्या पंचायत का काम जमीनी स्तर पर लोगों के घावों पर मरहम लगाना नहीं है?
