बीटी बैंगन की दिल तोड़ने वाली कहानी
बीटी बैंगन की दिल तोड़ने वाली कहानी एक उद्यमी के जीवन की अनिश्चितताओं के साथ-साथ हर मोड़ पर पेश आने वाली त्रासदियों को प्रतिबिंबित करती है। यह सभी लोकतंत्रों के लिए ऐसा संस्थागत तंत्र विकसित करने की जरूरत भी रेखांकित करती है जो वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर दीर्घकालीन फैसले लेने का साहस कर सके, न कि भावनात्मक और लोकलुभावन मुद्दों से प्रेरित होकर। यदि बीटी बैंगन पर लिए गए फैसले को बदला नहीं गया तो इससे निवेशकों का भरोसा तो डिगेगा ही, भारत के किसानों को उस विज्ञान के लाभ से वंचित कर दिया जाएगा जो देश को दूसरी हरित क्रांति के दौर में प्रवेश करवा सकता है।
इस बैंगन को विकसित करने वाला उद्यम है महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड्स कंपनी (मायको)। मायको ने देश के दो कृषि विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर प्रयोगशालाओं और खेतों में पिछले एक दशक के दौरान कई श्रमसाध्य परीक्षण किए हैं। अक्टूबर 2009 में सरकार की जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी ने इस आविष्कार को यह कहते हुए मंजूरी दे दी थी कि ‘यह लक्षित कीटों के नियंत्रण में प्रभावी, पर्यावरण के लिए सुरक्षित, प्राणियों के खाने के लिए स्वादिष्ट, एलर्जीरहित और किसानों के लिए फायदेमंद है।’ देश-विदेश के कई शीर्ष वैज्ञानिकों ने इस आविष्कार की सराहना की और उम्मीद जताई कि इससे चावल और गेहूं जैसी लोकप्रिय फसलों पर भी अनुसंधान हो सकेंगे। लेकिन 9 फरवरी को पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस पर रोक लगा दी।
रमेश का यह फैसला उन उद्यमियों व वैज्ञानिकों के लिए गहरा आघात है, जो कम से कम 41 खाद्यान्नों के अनुसंधान में वर्षो से लगे हुए हैं। भारत के किसानों की 40 फीसदी फसल उस एक कीट की वजह से नष्ट हो जाती है जिसके प्रतिरोध की क्षमता बीटी बैंगन में है। यदि बीटी बैंगन को अनुमति मिल जाती तो इससे पैदावार में बढ़ोतरी होती, कीटनाशकों का इस्तेमाल कम होता, किसानों की आमदनी बढ़ती और कई खाद्य पदार्थो के अनुसंधान के लिए प्रोत्साहन मिलता। हाल के वर्षो में किसानों को बीटी कॉटन से भरपूर फायदा मिला है।
यह इसी का नतीजा है कि पिछले पांच साल में भारत का कपास उत्पादन दुगुना हो गया है और उम्मीद है कि भारत जल्दी ही कपास उत्पादन में चीन को पछाड़कर नंबर वन बन जाएगा। रमेश का तर्क है कि खाद्य फसल की तुलना कपास से नहीं की जा सकती और इसके लिए सुरक्षा के कई ऊच्च स्तरों से गुजरने की जरूरत होगी। उन्हें याद दिलाया गया है कि पर्यावरणवादियों ने इसी तरह की आशंका बीटी कॉटन को लेकर भी जताई थी और इसी वजह से उसमें चार साल की देरी हो गई थी।
भारत की बीटी बैंगन की यह कहानी हमें जॉन मैनार्ड कीन्स के सिद्धांत की याद दिलाती है जिनका मानना था कि पूंजीवाद में अपरिहार्य अनिश्चितता तब पैदा होती है, जब निवेश का इनाम काफी देर से मिलता है। बाजार में अनिश्चितता आमतौर पर उपभोक्ताओं, सप्लायर्स और प्रतिस्पर्धियों की तरफ से पैदा होती है, लेकिन भारत में यह अनिश्चितता सरकार और उसकी नियामक प्रक्रिया की देन होती है। बीटी बैंगन की कहानी तो यही दर्शाती है।
- साभार: दैनिक भास्कर
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