मन के हारे हार...
बीते दो दशक की बात करें तो भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद लोगों ने उम्मीदों की नई रोशनी देखी. कई लोगों की जिंदगी बदल गई और कई लोग अपनी जिंदगी बदल रहे हैं. वैश्विकरण के माहौल ने कई लोगों के लिए दुनिया के द्वार खोल दिए. सफलता की कई कहानियों के कई पात्रों की मेहनत और लगन ने भारत की तस्वीर और तकदीर दोनों को बदल कर रख दिया. अवसर मिले तो लोगों ने इनका भरपूर फायदा उठाया और अपनी जिंदगी को बदला. लेकिन हमारे ही अपने समाज में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो बलदाव के सकारात्मक पहलू के बजाए अवसाद के नकारात्मक खोल में मर-मर के जिए. उन्होंने नई आज़ादी की बयार को महसूस करने में कहीं न कहीं ग़लती कर दी. वे तरक्की की कहानियों के नीचे दब गए, अवसरों को आत्मविश्वास के साथ भुना नहीं पाए और सफलता के सूत्र समझ नहीं पाए. जिंदगी से लड़े कम, रोये ज्यादा और आखिरकार उन्होंने संघर्ष के आगे घुटने टेक दिए.
अवसाद, तनाव या दबाव के कारण कई लोगों ने अपनी ही जान अपने हाथों से ले ली. नाउम्मीदगी इतनी बढ़ गई कि कोई रास्ता ही नहीं बचा.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ताजा आंकड़े भारत में आए दिन आत्महत्याओं के मामले में तेजी से हो रही बढ़ोतरी की ओर इशारा करते हैं. ब्यूरो के मुताबिक जीवन चक्र में उलझ कर रह जाने के कारण आत्महत्या की राह चुनने वालों में 30 से कम उम्र के लोगों की संख्या सर्वाधिक है। इस आयु वर्ग में रोजाना कम से कम 129 लोग आत्महत्या करते हैं, अगर बात 30 से 44 साल के आयु वर्ग की करें तो इसमें यह संख्या 119 है। थोड़ा आगे बढ़ें तो 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में यह संख्या 94 है। यानी उम्र बढ़ने के साथ ही बढ़ती परिपक्वता के कारण आत्महत्या की ओर कदम बढ़ाने में कमी आती है।
आत्महत्या अपराध है. अपनी ही जीवनलीला समाप्त कर देने वाली यह प्रवृत्ति आधुनिक जीवन की एक बड़ी त्रासदी के रूप में उभरकर सामने आई है। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि हमें तनाव, दबाव या अवसाद के कारणों में जाकर कही न कहीं हो रही बुनियादी गलतियों की ठीक करने की जरूरत है.
- क्या खत्म होती जिंदगियों को हम किसी तरह रोक नहीं सकते?
- क्या आपको लगता है कि इस दिशा में सोच-विचार की जरूरत है?
- ऐसे में आप तनावभरी जीवन शैली को आत्महत्याओं के लिए एक बड़ा कारक मानते हैं?
- क्या आपको लगता है कि बढ़ती स्पर्धा और अति-महत्वाकांक्षी होना ही इस रुझान के लिए जिम्मेदार है?
