जगाओ गण-देवता को

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि असली स्वराज कुछ लोगों के एकाधिकार से नहीं वरन् सत्ता के दुरूपयोग के उन्मूलन हेतु सभी की अर्जित क्षमता से संभव है। सुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित किए बिना वास्तविक गणतंत्र की परिकल्पना साकार करना असंभव है। काफी लंबे संघर्ष के बाद शासनतंत्र में पारदर्शिता लाने की गरज से सूचना के आधिकर को कानूनी जामा पहनाया गया। 1923 का ब्रिटिश उपनिवेश कालीन कानून सरकारी गोपनीयता कानून भ्रष्टाचार को छिपाने का सबसे बड़ा साधन बन गया। सूचना का अधिकार सरकारी गोपनीयता को रद्द कर पारदर्शिता की ओर बढ़ने का एक सफर है। इस कानून ने शासन-प्रशासन से सवाल पूछने की नई लोकतांत्रिक भूमिका में जहां आम आदमी को लाकर खड़ा कर दिया है, वहीं इसके प्रयोग से एक वर्ग में बौखलाहट भी बढ़ी है। पूरे मुल्क में लोकोन्मुख गणतंत्र के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। बावजूद इनके इसमें जनभागीदारी व्यापक रूप में नहीं हो पायी है। एक सर्वे के मुताविक 20 से 22 फीसदी लोग ही इसका उपयोग कर पा रहे है। यदि इन आंकड़ों पर गौर करें तो इस कानून के लागू करने के साल भर बाद भी मुल्क की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसके प्रयोग से महरूम है।

झारखंड में पारदर्शिता के लिए मुहिम

इस अधिकार को जब 2005 में कानूनी जामा पहनामा गया तो इसकी धारा-26 में यह प्रावधान किया गया कि आम आदमी तक इस कानून की पहुंच बनाने के लिए कार्यक्रम तय किए जाएं, ताकि आम जनता की, विशेष रूप से उपेक्षित समुदायों की समझ में वृद्धि हो सके। कानूनी प्रावधानों के बावजूद इस दिशा में ठोस पहल सरकारी स्तर पर नहीं की गई। झारखंड में देखें तो इस दिशा में सरकारी स्तर पर पहल श्रीकृष्ण लोक प्रशासन संस्थान द्वारा की गई। 1952 में स्थापित यह संस्थान प्रशासनिक पदाधिकारियों को प्रशिक्षण देने का काम करता है। आम लोगों के लिए इसने अपने दरवाजे खोले और नागरिकों के सशक्तिकरण के अधिकारों के संबंध में आम आदमी को अपनी भागीदारी का एहसास कराने की दिशा में पहल की। इसके लिए अक्टूबर-2009 में ही विज्ञापन प्रकाशित कराए गए और इस तरह नगाड़े बजाकर गण देवता को जगाने की पहल शुरू की गई। इस संस्थान के महानिदेशक ए.के. सिंह का मानना है, “सूचना का अधिकार कानून सुशासन के लिए मजबूत औजार है। स्वस्थ मजबूत लोकतंत्र का दायित्व केवल सरकारी अधिकारियों तथा कर्मचारियों का नहीं, बल्कि इसमें आम आदमी की भागीदारी जरूरी है।” समृद्ध लोकतंत्र के लिए आम लोगों को सूचना संपन्न करना जरूरी है। इसके लिए एक ठोस कार्यक्रम इस संस्थान ने तय किए हैं, संस्थान के संयुक्त निदेशक रणेन्द्र के मुताबिक, “सूबे के दो हजार लोगों को समूहों में प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है।”

जगाने के लिए कार्यक्रम

जहां तक सूचना के अधिकार का सवाल है तो भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के सहयोग से सर्वप्रथम सूचना देनेवाले पदाधिकारियों को संस्थान ने प्रशिक्षित करने का काम किया, ताकि इस कानून को बेहतर ढंग से समझ सकें। आम लोगों के लिए पाठयक्रम रोचक ढंग से तय किए गए हैं ताकि आम आदमी की समझ में वृद्धि हो सके व इसके आयामों को समझ सकें। प्रशासनिक अधिकारी के साथ-साथ इस विषय के विशेषज्ञों से मदद लेने का काम शुरू हुआ। तीन दिनों का आवासीय प्रशिक्षण हर समूह के लिए मुफ्त तय किया गया तथा विविध प्रकार के विषय- सूचना के अधिकार, अपीलीय प्राधिकरण की भूमिका, केन्द्रीय सूचना आयोग व राज्य सूचना आयोग के महत्वपूर्ण निर्णय, आरटीआई अधिनियम और मीडिया की भूमिका आरटीआई के संदर्भ में भ्रष्टाचार अधिनियम के साथ जनहित याचिका दायर करने की प्रक्रिया, अश्लीलता, अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम, लिंगीय भेदभाव, भ्रष्टाचार निराकरण अधिनियम व इसमें शामिल एजेंसियों के सुझाव सरकारी सेवा संहिता, उपभोक्ता अधिकार और खाद्य अपमिश्रण अधिनियम, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत महिलाओं के सम्पत्ति का अधिकार, महिला अपराधों के संदर्भ में भारतीय दंड विधान के विभिन्न प्रावधान, घरेलू हिंसा और दहेज अधिनियम के प्रावधान, बाल विवाह, डायन निरोधक कानून, प्रसव पूर्ण अधिनियम ग्लोबल वार्मिंग के खतरे, वनाधिकार- निर्धारित किए गए हैं। अक्टूबर से आरंभ इस अभियान के क्रम में 51 समूहों के 1200 लोगों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। इस पहल का व्यापक प्रभाव पड़ा। आम लोग तो इसमें शामिल हो ही रहे हैं। अब विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के छात्रों का जत्था भी इसमें शरीक हो रहा है। राज्य निगरानी व्यूरो के आरक्षी महानिरीक्षक एम.बी. राव का कहना है कि आम आदमी को सशक्त बनाने की दिया में एक ठोस पहल है।

जागरूकता अभियान है बड़ी जरूरत

यदि पूरे अभियान पर रोशनी डालें तो नागरिकों की क्षमता अभिवृद्धि की लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। सबसे महत्वपूर्ण भागीदारी छात्रों और युवाओं की है। राज्य गठन के बाद खनिज संपदा से सम्पन्न प्रदेश झारखंड का शुमार पिछड़े राज्यों में है। यहां की शिक्षा दर केवल 54.13 फीसदी है। महिला साक्षरता दर 39.38 फीसदी है। स्वास्थ्य संकेतों की स्थिति निराशजनक है। 52 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बीताने को मजबूर है। खाद्य असुरक्षा राज्य का प्रमुख संकट है। विस्थापन और पलायन का दंश भी इसे झेलना पड़ रहा है। रोजगार की तलाश में गांव उजड़ कर महानगरों की झुग्गियों में पहुंच रहा है। अंधविश्वास की वजह से डायन करार देकर महिलाओं की हत्या की जा रही है। एक ओर यह स्थिति है तो दूसरी ओर सरकारी अमलों द्वारा कल्याणकारी योजनाओं की दुहाई देकर अंतिम व्यक्ति को विकास में भागीदार बनाने की बात की जा रही है। इस लिहाज से नागरिक अधिकारों सशक्तिकरण के लिए क्षमता में वृद्धि महत्वपूर्ण है। शासन में पारदर्शिता के कारण एक से एक घोटाले हुए। गरीब प्रदेश के राजनेताओं की आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंसना, नौकरशाहों के यहां छापे यह खुलासा करते हैं कि जबाबदेह प्रशासन और पारदर्शिता को निजी स्वार्थों की बलिवेदी पर भेंट चढ़ा दिया गया।

आरटीआइ की बदौलत

हकीकत तो यह है कि सूबे अधिकांश घोटालों का पर्दाफाश सूचना के अधिकार से संभव हो सका। चाहे विधानसभा गेस्ट हाऊस के गवन का मामला हो, या नियुक्ति में अनियमितता का या फिर हेलीकॉप्टर घोटाला हो या अन्य मामला। इस कानून ने एक शक्तिशाली स्त्रोत को जन्म दिया है। सार्वजनिक हित से गोपनीयता का जामा कारगर सिद्ध हो रहा है।

इन परिस्थितियों में सूचना अधिकार के साथ-साथ अन्य अधिकारों के प्रभावकारी कार्यान्वयन में पहल नगाड़े बजाकर गण देवता को जगाने की दिशा में सार्थक पहल है। यही गण देवता को पूजने का सही रास्ता है, इस पहल से निश्चय ही लोकतंत्र की नींव और पुख्ता होगी तथा आम लोग प्रत्यक्ष लोकतंत्र पर आधारित शासन प्रणाली के भागीदार हो सकेंगे।

- कुमार कृष्णन, स्वतंत्र पत्रकार, झारखण्ड