खुलेपन की नीतियों की दरकार

21 दिसंबर 1961 के इस लेख में चुनाव से ठीक पहले जारी राजनैतिक दलों के घोषणापत्रों की आलोचना की गई है। लेखक के मुताबिक केवल जनसंघ का घोषणा-पत्र ही अर्थव्यवस्था के सरकारीकरण के खिलाफ है। हालांकि इसमें भी आधारभूत मामलों को लेकर स्पष्टता का अभाव ही है। पीएसपी और कांग्रेस जिस प्रगति की बात कर रहे हैं, वह केवल कुछ अतिप्रिय हठों को दूर करके ही हासिल की जा सकती है।

प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) के घोषणापत्र के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था ने आर्थिक अंतर को और अधिक बढ़ा दिया है। उसने पहले से मौजूद शक्तिशाली परिवारों में नवधनाढ्यों का एक और नया वर्ग जोड़ दिया है। योजनाओं से ये 'भारी लाभ कमाने वाले' 'संपत्ति की मलाई' को बांट रहे हैं और उत्पादन का तरीका भी उनकी जरूरतों को पूरा करने में जुटा हुआ है। लोगों पर भारी बोझ के बाद भी, हमारे पास जनकल्याण और रोजगार के नाम पर 'दिखाने के लिए मामूली सी उपलब्धियां' हैं। राष्ट्रीय शक्ति में ज्यादा वृद्धि नहीं होने के साथ ही लोगों के जीवनस्तर में 'बड़े पैमाने पर गिरावट' देखी गई है। ये ही आरोप, इस पर जोर देने को लेकर हल्के से अंतर को छोड़कर, कम्युनिस्टों, जनसंघ और स्वतंत्र पार्टियों के घोषणापत्र के बारे में भी लगाए जा सकते हैं।

कांग्रेस के घोषणापत्र में आरोपों से बचाव के जो उपाय किए गए हैं, वे संतुलन और ताकत दिखाते हैं। वह यह मानता है कि गरीबी अभी काफी बाकी है, बेरोजगारी भी बड़े पैमाने पर है और बड़े लक्ष्यों और मंशा के बाद भी विसंगतियां कायम हैं और कई बार तो यह बहुत ज्यादा दिखाई देती हैं। लेकिन, गलतियों और भूलों, राष्ट्रीय आपदाओं और शीतयुद्ध के बावजूद 'भारतीय लोगों का तीर्थयात्रा के अगले पड़ाव की ओर आगे बढ़ना' जारी है, जो कि भारी, बड़े, छोटे उद्योगों के विकास में देखा जा सकता है। किसानी के तौरतरीकों में 'उल्लेखनीय' सुधार हुआ है और कृषि उत्पादन में भी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अलावा इंसानी गतिविधियों की विभिन्न विधाओं में तरक्की साफ देखी जा सकती है।

हालांकि औद्योगिक उत्पादन चौंकाने वाला है- पिछले नौ सालों में औद्योगिक उत्पादन सालाना 7.6 फीसदी तक पहुंच गया है। यह कनाडा, नॉर्वे, स्वीडन, यूके और अमेरिका से डेढ़ से दो गुना ज्यादा है। यह जंग में हासिल जीत की तरह है, जिसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। जहां तक गुणवत्ता और मूल्य की बात है तो भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धी देशों के आगे नहीं टिक पाता। हमारे उत्पाद बिना बड़े घाटे के विदेश में नहीं बेचे जा सकते। यह बात और है कि इस घाटे की भरपाई हम घरेलू बाजार में मूल्यों पर नियंत्रण और निर्यात को बढ़ावा देकर और आयात लाइसेंस से करने की कोशिश करते हैं, जिसका परिणाम घरेलू उपभोक्ता को झेलना पड़ता है।

उद्योगों का विकास कृषि की ही कीमत पर किया गया है। 1955-56 में योजनाओं में तेजी के साथ ही कृषि उत्पादन लगभग स्थिर सा हो गया है। यह आबादी में इजाफे के साथ सालाना 1.5 फीसदी या कई बार इससे कम विकास दर दिखाता रहा है। संपूर्ण उत्पादन और खाद्य सामग्री व कपड़े की खपत की तुलना में कृषि तकनीकों, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की उपलब्धि नगण्य है।

कांग्रेस का घोषणापत्र इन तीन उपलब्धियों की बात करता है। जो कांग्रेस की राय में इस बहुआयामी पृष्ठभूमि में भी 'साफ देखी' जा सकती हैं। पहली स्कूलों और कॉलेजों की संख्या में 1950-51 के 24 मिलियन की तुलना में वर्तमान का 46 मिलियन तक का इजाफा। दूसरी उपलब्धि 40 के दशक की 32 की तुलना में औसत आयु में 47.5 तक का इजाफा। तीसरा सामुदायिक कार्यक्रमों के जरिये पंचायती राज्य की स्थापना़, जिसके तहत 72 फीसदी गांव और 50 फीसदी आबादी आ जाती है।

स्कूलों और कॉलेजों की संख्या में इजाफे का पूरा श्रेय प्रशासन ही नहीं ले सकता। कुछ इजाफा तो निजी क्षेत्र के प्रयासों का नतीजा है, कुछ नगर निगमों और अन्य अर्ध-सरकारी एजेंसियों के प्रयासों का। किसी भी सरकार को अपने राजस्व का एक हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना चाहिए। इस विशेष काम के नाम पर धन मुहैया कराने के लिए प्रयास भी अभूतपूर्व होना चाहिए। हम इंसान से ज्यादा तो इस्पात में निवेश कर रहे हैं। दूसरी योजना में केंद्र और राज्यों ने शिक्षा पर 208 करोड़ रुपए खर्च किए थे जबकि इस्पात के तीन सार्वजनिक क्षेत्रों के प्लांटों पर खर्च की योजना 562 करोड़ रुपए की थी। कुल खर्च में फीसदी के लिहाज से देखा जाए तो शिक्षा के मामले में पहली योजना के 1.9 फीसदी से गिरकर यह दूसरी योजना में 1.5 फीसदी हो गया।

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