भरोसा नहीं पुलिस पर...

हमेशा यह प्रश्न उठता आया है कि राजधानी महिलाओं के लिए कितनी सुरक्षित है? इस तरह का प्रश्न पैदा होना भी स्वाभाविक है क्योंकि आए दिन महिलाओं के साथ छेड़छाड़ या फिर बलात्कार की घटनाएं आम जो होती जा रही हैं।

हमारी कानून व्यवस्था की बदहाली का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राजधानी की लगभग 97 फीसदी महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं. फिर इस संबंध में पुलिस-प्रशासन के लिए शर्म की बात यह कि सिर्फ 20 फीसदी महिलाएं ही मानती हैं कि मुश्किल में पड़ने पर पुलिस उनकी कोई मदद करेगी।

सीक्यून नाम के एनजीओ की रिपोर्ट में कनॉट प्लेस, करोल बाग और चांदनी चौक सरीखे भीड़-भाड़ वाले इलाकों को सर्वाधिक असुरक्षित बताया है। अगर बसों की बात करें तो 82 फीसदी महिलाएं खुद को बसों में असुरक्षित मानती हैं। इसके बाद दोपहर बाद के समय को महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित बताया गया। 88 फीसदी महिलाओं को यह कहना पड़ा कि जब उनके साथ किसी तरह की बदतमीजी की गई तो उनकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया।

इस सर्वे के आंकड़ों के अलावा अगर रोजाना अपने आस-पास होने वाली घटनाओं पर नजर डालें तो पता चल जाता है कि हालात वाकई बहुत अच्छे नहीं हैं। अब जब कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए कुछ समय शेष है और उम्मीद की जा रही है कि बड़ी संख्या में विदेशी मेहमान भी आएंगे, ऐसे में बाहर से आने वाली महिला मेहमानों के बारे में सोचा ही जा सकता है। इसलिए पुलिस-प्रशासन का मुंह तकने से पहले जरुरत पहले अपने अंदर झांकने और इस तरह की परिस्थितियों से महिलाओं को उबारने और अपने स्तर पर पहल करने की भी है, क्योंकि एक सभ्य समाज तभी तरक्की करता है, जब उसमे रहने वाले सभी लोग भय मुक्त जीवन जिएं।

  • क्या भी आप मानते हैं कि वाकई राजधानी में महिलाएं असुरक्षित हैं?
  • राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा के लिए और अधिक किया जाना चाहिए?
  • महिलाएं अपनी सुरक्षा खुद किस तरह कर सकती हैं?
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