क्या विकास के लिए मदद जरूरी है? - बी.आर. शिनॉय

विदेशी मदद से प्रगति को पंख लगने की वर्तमान सोच के विपरीत लेखक ने 21 जनवरी, 1970 के इस अध्ययन में संभावना व्यक्त की है कि भारी-भरकम सहायता का भारी भरकम दुरूपयोग होगा। उन्होंने इस बात पर भी हैरानी जताई है कि आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के अर्थशास्त्री और सांख्यिकीविद भी इस बात को समझ नहीं सके हैं….

इस बात को लेकर लगभग सर्वसम्मति सी है कि आर्थिक विकास की गति तेज करने के लिए विदेशी सहायता जरूरी सी है। इस संबंध में जो तर्क आमतौर पर दिया जाता है वह यह कि विकासशील देशों में तेजी से प्रगति के लिए जरूरी संसाधनों का अभाव होता है। संसाधनों की यह कमी कम आय और उसके चलते कम बचत की कम दर के कारण है। अविकसित देशों में बचत की दर आमतौर पर 5 से 7 फीसदी तक होती है। दूसरी ओर यह विकसित देशों में 15 से 30 फीसदी तक होती है। जापान में तो यह 39 फीसदी है। कुछ विकसित देशों में बचत की मात्रा तो भारत की राष्ट्रीय आय से भी ज्यादा है।

घरेलू संसाधनों के अल्प संचय को मदद की दरकार होती है। इस वजह से मदद लेने के तर्क को विदेशी बचत की आमद से समर्थन मिलता रहता है। ऐतिहासिक तौर पर अमेरिका और पश्चिम यूरोप के अन्य देशों तक में आर्थिक विकास विदेशी पूंजी के आगमन से ही तेज हुआ। विदेशी पूंजी के अभाव में शायद इन देशों में भी विकास की दर धीमी ही होती। इस वक्त भारत को विदेशी मदद उसकी बचत का 65 फीसदी है। साथ ही मदद देने वाले देशों और वर्ल्ड बैंक, संयुक्त राष्ट्र से आने वाले अधिकारियों ने भी हमारी नीतियों को नैतिक समर्थन दे दिया है।

लेकिन आर्थिक विकास का मतलब सिर्फ बचत की मात्रा और निवेश ही नहीं है। लोगों के दृष्टिकोण के साथ ही संस्थागत और अन्य परिस्थितिजन्य कारकों और निवेश की दिशा का भी अपना महत्व है। कौशल और अन्य गैर-आर्थिक कारकों में सुधार काफी धीमा होता है। निरक्षरता की समाप्ति और सामान्य और प्रौद्योगिकी शिक्षा का प्रसार विकास पर उल्लेखनीय प्रभाव डाल सकते हैं। खासतौर पर तब जब तुलना निवेश के एक सामान्य से प्रवाह से की जा रही हो। लेकिन आर्थिक कारकों में निवेश की दिशा विकास की गति के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है।

आंकड़ों के लिहाज से पूंजी संचय संभव है, जैसा कि भारत में पिछले 15 सालों में हुआ है। इस काल में निवेश की गति में तीन गुना इजाफा देखा गया। वर्तमान में यह फिर से दोगुनी हो गई है। फिर भी अर्थव्यवस्था अराजकता की सी स्थिति में है। आंकड़ों और जीवनोपयोगी वस्तुओं की खपत के लिहाज से प्रति व्यक्ति आय भले ही और खराब न हो, लेकिन लगभग स्थिर सी हो गई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बढ़ता निवेश गलत दिशा में चला गया।

पिछले 15 सालों में भारत और हाल के कुछ वर्षों में कुछ अन्य विकासशील देशों ने दो ऐसे नीतिगत फैसले लिए हैं जो उनके आर्थिक विकास के लिहाज से घातक साबित हुए हैं। पहला, मूल उद्योगों की गलत पहचान की गई है। घरेलू बचत और विदेशी मदद से उपलब्ध निवेश के संसाधनों में से बड़ा हिस्सा इसी 'मूल' उद्योग में लगाया गया है। दूसरा, निजी क्षेत्र ने आयात की विवेकहीन स्थिति को देखते हुए पूंजी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया है।

एक ही किस्म के उद्योगों को सभी देशों के लिए मूल उद्योग नहीं माना जा सकता। दूसरे महायुद्ध से पहले अमेरिका में कृषि मूल उद्योग था। धीरे-धीरे परिवर्तन के साथ उत्पादन उद्योग और फिर भारी उद्योगों ने मूल उद्योग का रुप ले लिया। हो सकता है कि कल अमेरिका का मूल उद्योग स्वचालन (automation) हो। इजरायल में संभव है कि आज मूल उद्योग खट्टे फल और हीरों की पॉलिशिंग हो - यही दोनों देश की विदेशी मुद्रा विनिमय में आधे से ज्यादा का योगदान देते हैं।

मूल उद्योग वो होते हैं जो निवेश संसाधनों की एक तय मात्रा के लिए सबसे ज्यादा उत्पाद देते हैं और वर्तमान पारिश्रमिक दरों पर सबसे ज्यादा रोजगार देते हैं, जरूरी नहीं कि इसमें लोहा और इस्पात, हैवी इंजीनियरिंग, हैवी केमिकल्स, बड़ी नदी घाटी परियोजनाएं और ऐसे ही उद्योग शामिल हों। इसीलिए मूल उद्योग देश-दर-देश और कई बार तो एक ही देश में काल-दर-काल बदलते रहते हैं।

यह किस्सा काफी विख्यात है कि अहमदाबाद के उपनगर के आकार के एक देश के प्रधानमंत्री को एक भारतीय अर्थशास्त्री ने यह सुझाव दिया था कि अपने देश को आर्थिक मंदी से उबारने के लिए वह वहां पर एक इस्पात संयंत्र की स्थापना कर ले। एक समाजवादी मित्र देश ने उसे इस सुझाव को अमल में लाने से वक्त रहते रोक दिया।

यह सही घरेलू नीतियों के महत्व को उजागर करता है। केवल सही घरेलू नीतियां ही न केवल सर्वाधिक आर्थिक विकास सुनिश्चित करेंगी बल्कि विदेशी मदद के प्रवाह को भी गलत दिशा में जाने से रोकेंगी। अगर घरेलू नीतियां सांमजस्यपूर्ण बहुपक्षीय और संतुलित विकास करने में नाकाम होने के दौरान ही संसाधनों को गलत जगह लगा देती हैं तो विदेशी मदद कितनी भी हो आर्थिक विकास में समुचित योगदान नहीं दे पाएगी। भारी सहायता का भारी दुरुपयोग होने की आशंका ज्यादा होती है।

चूंकि हमारी चर्चा आर्थिक विकास पर केंद्रित है, इसलिए मदद की परिभाषा का संबंध हमारी अर्थव्यवस्था में विदेशी बचत के प्रवाह से होना चाहिए, न कि कर्ज की 'कठोर' या 'नर्म' शर्तों से। हालांकि निर्यात में बाह्य ऋण प्रतिदेय (export credit repayable) को वास्तविकता में मदद नहीं माना जा सकता, क्योंकि ऋण, घरेलू पूंजी निर्माण को वित्तीय मदद नहीं करता। सोवियत संघ से मिलने वाली मदद के कुछ पत्रिकाओं में आंकड़े इसीलिए ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं क्योंकि उनमें बाह्य ऋण प्रतिदेय को भी मदद में शामिल दिखाया जाता है। साथ ही मदद में वस्तु के तौर पर मदद और मुद्रा में मदद के साथ-साथ 'पीएल 480 इम्पोर्ट्स' जैसी विदेशी बचत के अर्थव्यवस्था में शामिल किए जाने को भी स्थान दिया जाना चाहिए। ये आयात भी पूंजी निर्माण, रोजगार निर्माण और आर्थिक विकास में मदद करते हैं। यह भी कहा जाता रहा है कि भारत को मिलने वाली मदद, इजरायल, जॉर्डन, दक्षिण वियतनाम और पाकिस्तान को मिलने वाली मदद से कम है। यह तुलना प्रति व्यक्ति आय पर आधारित होती है, जिसे कि तुलना का सही आधार नहीं कहा जा सकता। इस आधार पर तो भारत को मिलने वाली मदद का आकार दुनिया में सबसे कम हो सकता है।

मदद के आकार का पता लगाने का सही मापदंड इसका घरेलू बचत से संबंध हो सकता है। इस आधार पर भारत को हाल में मिलने वाली मदद का आकार दुनिया में सबसे बड़ा हो सकता है। काफी वक्त से हालांकि अमेरिका का शुमार मदद देने वालों में सबसे अंत में होता रहा है, लेकिन भारत हाल तक सबसे ज्यादा मदद पाने वाला देश था।

मदद का सही मूल्य उस वक्त और कम दिखाई देने लगता है जब हम, जैसा कि हम करते रहे हैं, विदेशी मदद को आधिकारिक विनिमय दर पर भारतीय मुद्रा में परिवर्तित करते हैं। मदद का मूल्यांकन तो मदद कोष से खरीदे गए आयातित माल की भारतीय कीमतों से तुलना से  किया जा सकता है। इसके लिए विदेशी विनिमय के वास्तविक मूल्यांकन की जरुरत होगी, जो कि आधिकारिक विनिमय दर की तुलना में मुक्त बाजार की दर के ज्यादा करीब होगा। इन कारकों का समायोजन करके-जिसके लिए बारीकी से सांख्यिकी निरीक्षण जरूरी है-विदेशी मदद कुल निवेश की एक चौथाई नहीं तकरीबन आधी होगी। अगर विदेशी मदद, निवेश की एक चौथाई नहीं आधी है तो इसका मतलब यही है कि यह मदद घरेलू बचत के 100 फीसदी के करीब है, 50 फीसदी के करीब नहीं। एक-दो अपवादों को छोड़ दिया जाए तो किसी भी देश को उतनी मदद नहीं मिली जितनी की यूरोप को मार्शल प्लान से मिली।

पुरा लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

Tags: