अनैतिक आचरण से बाजार को खतरा

महाभारत के अनुसार मनुष्य बुनियादी रूप से दोषयुक्त है और उसकी गलतियां संसार को विषम बनाती हैं। दुर्योधन उस विषमता का सबसे बड़ा प्रतीक है, लेकिन अन्य लोग भी उसमें अपना खासा योगदान करते हैं। युधिष्ठिर जुए का प्रतिकार नहीं कर सकते, कर्ण समाज में अपनी प्रतिष्ठा की चिंता से ग्रस्त है, अश्वत्थामा की प्रकृति में प्रतिशोध की भावना है, धृतराष्ट्र के मन में अपने बड़े बेटे के लिए अतिरिक्त स्नेह है। ये मानवीय कमजोरियां उस महाकाव्य को विध्वंस की दिशा में लेकर जाती हैं। महाभारत के चरित्रों की ही तरह वॉल स्ट्रीट के निवेश बैंकर भी उन्हीं कमजोरियों के शिकार हैं और इन्हीं दुर्बलताओं के कारण वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था 2008 में अपने घुटनों के बल झुक गई।

एक साल पहले यह दुनिया असफल थी। लोगों ने यह भविष्यवाणी कर दी कि यह वैश्विक पूंजीवाद की पराजय है। उन्होंने कई उभरते हुए बाजारों में राजनीतिक ध्वंस की भविष्यवाणी की और अब सिर्फ एक साल बाद वे लोग गलत साबित हुए। वैश्विक अर्थव्यवस्था पुनर्जीवित हो रही है और भारत, चीन और अन्य उभरते हुए बाजार इसके पुनर्जीवन की अगुआई कर रहे हैं। 1930 की महामंदी से पाठ ग्रहण करने और अपनी अर्थव्यवस्थाओं के लिए राज्य के सहयोग को बढ़ाने का श्रेय सरकारों को जाता है। इससे मंदी का प्रतिरोध हो सका। भारत में यह प्रतिरोध किसी योजना के तहत नहीं, बल्कि कांग्रेस की नीतियों, छठे वेतन आयोग और नरेगा के कारण संयोग से हुआ। यह सारी योजना चुनाव जीतने के मकसद से तैयार की गई थी।

महान अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स के इस विषमतापूर्ण संसार के बारे में ठीक वही विचार थे, जो महाभारत में हैं। जॉन उस महामंदी के समय थे, जब बहुतों ने उस दौर को पूंजीवाद का अंत कहा था। उन्होंने कहा कि संसार में विषमता मनुष्य की पशु प्रवृत्ति के कारण होती है। नोबेल पुरस्कार विजेता जॉन नैश, जिनके जीवन पर एक खूबसूरत फिल्म बनी है, द ब्यूटीफुल माइंड, ने इसे ‘ज्ञान का असंतुलन’ कहा है। इसकी वजह से बाजार में एकाएक तेज उछाल आता है और बहुत से लोग अपना भविष्य संवारने के लिए नौकरियां छोड़ देते हैं। 2000 में ऐसा हुआ था। लेकिन उसके कुछ ही वर्षो बाद ऐसा सबप्राइम संकट आया कि जिसने पूरी दुनिया को 2007 की मंदी की ओर धकेल दिया।

महाभारत धर्म के द्वारा संसार में समता की खोज करता है। धर्म का अर्थ है - गुण, मूल्य, कर्तव्य और विधान। मुख्यत: धर्म का अर्थ है सही काम करना। महाभारत यह स्वीकार करता है कि अधिक की कामना करना मनुष्य के स्वभाव में निहित है। कोई भी नियंत्रण संसार के समस्त दुर्योधनों और रामलिंगम राजुओं पर लगाम नहीं लगा सकता। समाज में विश्वास पैदा करने के लिए बाजार के मोर्चे पर सक्रिय हर व्यक्ति को आत्मनियंत्रण का पालन करने की आवश्यकता है। बाजार बेचने और खरीदने वाले के बीच विश्वास पर टिका होता है। पूरी दुनिया में लोग अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए मशक्कत कर रहे हैं, वाम और दक्षिण के बीच बहसों में ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं, जबकि मूल बात आचरण में धर्म और अधर्म के अंतर की है।

- साभार: दैनिक भास्कर

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