व्यवस्था बदलने के लिए दोहराना होगा कुरुक्षेत्र

रुचिका गिरहोत्रा की मौत व्यर्थ नहीं गई है। उसने नए और निश्चयी भारत की नैतिक कल्पनाओं को ऊर्जावान किया है और उस विश्वास का खंडन किया है कि हमारा मध्यम वर्ग पूरी तरह से आत्मकेंद्रित, उपभोक्तावादी और कठोर है। उन्नीस साल पहले हुई एक घटना आज बेचैन आक्रोश का स्रोत बन गई है। कहा जा सकता है कि हमारे देश में धर्म गिरने के बजाय ऊपर की ओर बढ़ रहा है।

इसकी शुरुआत 22 दिसंबर को हुई, जब एक पुलिस अधिकारी के बारे में संक्षिप्त रिपोर्ट पढ़ने को मिली, जिसे एक 14 साल की लड़की के साथ छेड़छाड़ करने का दोषी पाए जाने के बाद छह माह की सजा सुनाई गई थी। उसी शाम मैंने अपने एक मित्र से कहा कि यह कहानी भी जल्दी ही खत्म हो जाएगी। उसने दुख के साथ अपना सिर हिलाते हुए कहा, ‘प्रशासन में सुधार के लिए क्या करना होगा? क्या कुरुक्षेत्र जैसा युद्ध?’ लेकिन यह कहानी खत्म नहीं हुई। जल्दी ही यह बात उजागर हुई कि कैसे हरियाणा का एक उच्चधिकारी पुलिस महानिदेशक शंभूप्रताप सिंह राठौर ने रुचिका गिरहोत्रा के साथ छेड़छाड़ की, झूठे आरोपों में उसके भाई को गिरफ्तार किया और उसे जेल में प्रताड़नाएं दी गईं, उसके परिवार को छिपने के लिए और अंतत: रुचिका को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दिया।

जब हम यह विश्वास करने लगते कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र और तेजी से उभरती हुई आर्थिक शक्ति है, तभी हमें याद दिला दिया जाता कि देश के कुछ हिस्सों में हम अब भी अफ्रीका या लातिन अमेरिकी देशों की तानाशाही के निकट हैं। आखिर कैसे शासन के सभी संस्थान 19 सालों से विफल साबित हुए और एक शक्तिशाली नौकरशाह चंडीगढ़ के बैठकखानों में राज्य द्वारा सम्मानित होता रहा?

जब मेरा मित्र कहता है कि व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए हमें क्या कुरुक्षेत्र जैसा युद्ध लड़ना पड़ेगा तो वह हमें उसी बात की याद दिला रहा था कि महाभारत भी स्व-विनाशकारी क्षत्रीय संस्थानों की समस्या से ग्रस्त था। उसे दूर करने के लिए उसे युद्ध लड़ना पड़ा। जब द्रौपदी का चीरहरण करने की कोशिश की जाती है, तब वह हस्तिनापुर के शासकों को चुनौती देते हुए सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही की मांग करती है। वह शासकों के धर्म की बात करती है। द्रौपदी और रुचिका मामले में उसकी दोस्त आराधना प्रकाश (जिसने न्याय के लिए १९ साल तक लड़ाई लड़ी) हमारी प्रेरणा होनी चाहिए।

रुचिका मामले ने देश की नैतिक चेतना को आकृष्ट किया और मीडिया के दबाव ने सरकार को कार्रवाई करने के लिए विवश किया। उस शक्तिसम्पन्न पुलिस अधिकारी के खिलाफ हत्या का प्रयास करने सहित कई मामले दर्ज किए गए। मीडिया पर अतिशयोक्ति का आरोप लगाया जा सकता है, लेकिनयह कुरुक्षेत्र जैसे युद्ध का लोकतांत्रिक तरीका ही तो है।

तो इसका क्या यह मतलब है कि हम नैतिक रूप से प्रगति कर रहे हैं? धर्म का विचार अजीब और पुरातन लग सकता है। हालांकि मध्यम वर्ग स्व-केंद्रित और उपभोक्तावादी है, लेकिन उसमें अब भी धर्म के प्रति बोध और मर्यादापूर्ण जीवन की ललक बाकी है। लोग चाहते हैं कि सार्वजनिक जीवन ताकतवर लोगों द्वारा नहीं, बल्कि सही बातों से निर्धारित हो।

लोग इस बात में फर्क कर सकते हैं कि ‘क्या है’ और ‘क्या होना चाहिए’। महिलाओं व दलितों के खिलाफ अत्याचार कभी बहुत सामान्य था, लेकिन अब यह स्वीकार्य नहीं है। कभी दलित होना कलंकित माना जाता था, लेकिन आज एक दलित महिला हमारे सबसे बड़े राज्य पर शासन कर रही हैं। हालांकि इसके बावजूद ‘है’ और ‘होना चाहिए’ के बीच खाई कभी खत्म नहीं होगी। रुचिका की कहानी दर्शाती है कि हम धर्म की ओर बढ़ रहे हैं।

- साभार: दैनिक भास्कर

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