सॉफ्टवेयर क्रांति के कारण क्या रहे?
भारत में सबसे बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन दुनिया को मात देने वाले कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर का विकास है। भारत की अर्थव्यवस्था चमत्कारिक नहीं है, लेकिन सॉफ्टवेयर एक चमत्कारिक सेक्टर है। एक दशक तक 40 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से फल-फूल रहे इस सेक्टर ने पिछले साल निर्यात से आठ अरब डॉलर की कमाई की।
मैकिंसी का अनुमान है कि वर्ष 2008 तक इसकी कमाई 58 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। यह आज की तारीख में भारत के सभी सामानों के निर्यात को मिलाने पर भी उससे ज्यादा होगा। पिछले सप्ताह कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में भारतीय अर्थव्यवस्था पर एक सेमीनार में इन्फोसिस के चेयरमैन नारायण मूर्ति ने एक नाजुक सवाल उठायाः क्या 1990 के आर्थिक सुधारों के बगैर सॉफ्टवेयर में ऐसी तरक्की संभव थी? बिलकुल नहीं, उनका निजी निष्कर्ष यही था।
इन्फोसिस की शुरूआत 1981 में हुई थी, लेकिन इसके लिए पहला दशक बहुत मुश्किलों भरा रहा। एक टेलीफोन हासिल करना तक एक बड़ी चुनौती बन गया था। लाइसेंस-परमिट राज के उस युग में एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी के लिए तो किसी भी सॉफ्टवेयर फर्म को हासिल करने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था टेलीफोन हासिल करना। 15 हजार डॉलर के एक कम्प्यूटर का आयात करने के लिए नारायण मूर्ति को नौकरशाही से मंजूरी हासिल करने के लिए डेढ़ साल में नई दिल्ली के 25 चक्कर काटने पड़े। उनके आने-जाने और होटल का खर्च लगभग उनके कम्प्यूटर की कीमत जितना ही हो गया था। यह मूढ़ता 1991 में जाकर खत्म हो सकी, जब औद्योगिक लाइसेंसिंग के खात्मे से नारायण मूर्ति और अन्य को ऐसे नाकाम फेरों से निजात मिल गई।
पुराने बुरे दिनों में, एक आरबीआई क्लर्क इस बात के फैसले में पांच दिन ले लिया करता था कि नारायण मूर्ति एक दिन के लिए विदेश जा सकते हैं या नहीं। सॉफ्टवेयर कंपनी के एक सीईओ ने आरबीआई से पेरिस में दो दिन गुजारने और फ्रैंकफर्ट में अपने क्लाइंट्स से मिलने के लिए एक दिन की इजाजत हासिल की थी। लेकिन, कलाइंट्स की योजना बदल गई और उस सीईओ को पेरिस में एक और फ्रैंकफर्ट में दो दिन गुजारने पड़ गए। उसे तुरंत ही कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया, जिसमें मुकदमे में घसीटने तक की धमकी थी। इस तरह समाजवाद के पवित्र नाम की आड़ में सभी तरह के कारोबारों के प्रोत्साहन का गला घोंटने का काम किया जाता था। नौकरशाहों की सोच और कार्यप्रणाली समूचे लाइसेंस-परमिट राज के खात्मे के बाद ही बदली। थोड़ी बहुत ठोका-पिटी से यह असंभव था। 1990 के सुधारों ने उत्पादन, आयात और विदेशी मुद्रा पर लादे गए नियंत्रणों के समूचे जंगल का ही सफाया कर दिया। करंट अकाउंट की परिवर्तनशीलता (करंट अकाउंट कन्वर्टिबिलिटी) ने सॉफ्टवेयर कंपनियों के लिए सलाहकारों की नियुक्ति और विश्व स्तर पर ब्रांडिंग जैसे कामों को आसान कर दिया। अब हर एक के लिए एक-एक कर अलग से नहीं जूझना पड़ता था।
पिछले सिस्टम में एक कंट्रोलर ऑफ केपिटल इश्यूज हुआ करता था, जो यह तय करता था कि अगर किसी कंपनी ने शेयर जारी ही करना है तो उसका क्या मूल्य होगा। कंट्रोलर हर बार बाजार की कीमत से कम ही दाम तय करता था। वह कंपनी की भविष्य की संभावनाओं की बजाय उसके पिछले रिकार्ड को देखता था। लेकिन शेयरों की कीमत तो भविष्य की संभावनाओं का आईना होते हैं, इतिहास का नहीं। कंट्रोलर ऑफिस के इन अड़ियल नियमों के चलते सॉफ्टवेयर कंपनियों का इक्विटी बाजार तक पहुंच पाना नामुमकिन ही था। खुशकिस्मती से सुधारों ने कंट्रोलर का पद ही खत्म कर दिया। आजाद उद्यमी अब न केवल बाजार में शेयर जारी कर सकते थे, बल्कि अपने कर्मचारियों को इसमें भागीदारी के विकल्प भी मुहैया करा सकते थे। वे विदेशों के स्टॉक मार्केट में भी मौजूदगी दर्ज करा सकते थे और इस तरह से न्यूयॉर्क में इक्विटी से अरबों डॉलर की पूंजी जुटा सकते थे। अगर ऐसा नहीं होता, तो आज इन्फोसिस उन ऊंचाईयों पर नहीं होता, जहां वह आज है। दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों को 100 फीसदी इक्विटी के साथ भारत में निवेश का मौका दिया जाना, नारायण मूर्ति की राय में, एक और महत्वूपर्ण परिवर्तन था। इसका कुछ निहित स्वार्थों और विचारकों ने विरोध किया। वास्तविकता में माइक्रोसॉफ्ट और ओरेकल जैसे दिग्गजों के आगमन से तो प्रतिस्पर्धा के माहौल को प्रोत्साहन ही मिला है। इसी ने इन्फोसिस और विप्रो जैसी भारतीय कंपनियों को यह सबक भी सिखाया कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा के माहौल से कैसे निपटा जाता है।
1990 के दशक के आरंभ में कुछ लोग कहते थे कि अगर भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग को फलने-फूलने का मौका देना है तो मल्टीनेशनल कंपनियों (एमएनसी) को हमारे यहां नहीं आने देना चाहिए। दूसरा, निराशाजनक सोच वालों की तो यही राय थी कि इन्फोसिस को भी पार्ले की तरह अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर कंपनी को विदेशियों को बेच देना चाहिए। तीसरा विकल्प, जिसे पुराने वामपंथी फंतासी मानते थे, मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा का था और यह साबित करना चाहिए था कि भारतीय उतने ही अच्छे हैं। इन्फोसिस और दर्जनों अन्य भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियां यही साबित करने में कामयाब रही थीं। विदेशी फर्मों को कर्मचारी गंवाने, जैसी कि पहले निराशावादियों द्वारा आशंकाएं जताई जा रही थीं, इन्फोसिस ने तो स्टाफ को बरकरार रखने में एमएनसी को भी मात दे दी।
नेता-बाबू राज की तो यही सोच थी कि भारतीय कंपनियां पुश्तैनी तौर पर ही विदेशी कंपनियों से कमजोर हैं और उनको अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से बचाए जाने की दरकार है। सॉफ्टवेयर ने इस सोच की धज्जियां उड़ा डालीं। खुली प्रतिस्पर्धा ने भारतीय कंपनियों की तबाही नहीं तरक्की का रास्ता खोल दिया। कामकाज का स्तर और कौशल इतना बढ़ा कि जो हमारे यहां मौजूद पहले के बंद माहौल में संभव नहीं था। कॉर्नेल में मैंने मूर्ति द्वारा गिनाई गई सुधारों के फायदे की सूची को कुछ और लंबा किया। भारतीय राजनीतिज्ञ और ट्रेड यूनियन, नौकरियां जाने की आशंका के चलते दशकों तक कम्प्यूटरीकरण के विरोधी रहे। वे इसे उपभोक्ता के फायदे या बेहतरी के लिए नहीं केवल रक्षा या परमाणु अनुसंधान के लिए ही उचित मानते थे। इसलिए उन्होंने सॉफ्टवेयर को कभी कोई प्राथमिकता दी ही नहीं। अगर हमारे पास ज्यादा बजट वाला कोई सॉफ्टवेयर मंत्रालय होता तो हमारे यहां उसमें भी दमनकारी नौकरशाही विकसित हो चुकी होती। हमारी खुशकिस्मती कि ऐसा कोई मंत्रालय या मंत्री था ही नहीं और इसलिए सॉफ्टवेयर ने कुछ समाजवादियों की मौजूदगी के बाद भी प्रगति कर ली। बंदरगाहों, रेलवे और सड़क परिवहन में मजदूर यूनियनों की अनियमितता और अकुशलता के कारण परंपरागत निर्यात भी प्रभावित हुआ था। सॉफ्टवेयर निर्यात चूंकि हवाई तरंगों और केबलों के जरिये हुआ इसलिए देश की मजदूर यूनियनों और राजनीतिज्ञों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यह विदेशों में मौजूद नौकरशाहों तक को दिखाई नहीं दिया। इस वजह से वहां भी यह स्थानीय विरोध नहीं हो पाने के कारण फल-फूल गया। सॉफ्टवेयर क्रांति से हर स्तर पर कामकाज सुधरा और भारतीय स्टॉक मार्केट की ताकत भी दुनिया को पता लगी। इसका आधार आमतौर पर अनदेखा कर दिया जाने वाला एक छोटा सा सुधार था। मनमोहन सिंह का शेयरों पर से वेल्थ टैक्स समाप्त कर देना। पुराने दिनों में कोई भी कारोबारी नहीं चाहता था कि उसके शेयर की कीमत बढ़े, क्योंकि कीमत बढ़ने का मतलब होता था उसे ज्यादा वेल्थ टैक्स चुकाना पड़ता। ऐसे माहौल में शेयरहोल्डरों को भी कुछ देना आत्महत्या की तरह था, सो उद्यमी फायदे को काले धन के तौर पर रखते थे और अपने हिसाब-किताबों की किताबों से भी दूर।
शेयरों पर वेल्थ टैक्स हटाने से ही यह संभव हो सका। पहली बार आत्महत्या की सोचे बगैर उद्यमी अपने शेयरों की कीमतों में इजाफे के लिए दस या हजार गुना तक का लक्ष्य रख सकते थे। जब मनमोहन सिंह ने यह सुधार लागू किया था तो उन्हें लगा भी नहीं था कि उनका यह एक छोटा सा कदम सॉफ्टवेयर क्रांति का कारण बनेगा। यही आर्थिक सुधारों का असली चेहरा है। लक्ष्य किसी एक क्षेत्र विशेष को प्रोत्साहित करना नहीं, बल्कि संभावनाओं की दुनिया का दरवाजा ही खोल देना है। लक्ष्य लोगों को ऐसे सपनों को साकार करने का हौसला देने का है, जिन्हें वे बिना किसी चिंता के पूरा करने में जुट जाएं। यही वह तरीका था जिससे सुधारों ने सॉफ्टवेयर क्रांति को संभव बनाया।
- टाइम्स ऑफ इंडिया में 28 अप्रैल 2002 को प्रकाशित
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