जीवन स्तर में होता सुधार...
जब 1991 में भारत में उदारवादी नीतियों को आत्मसात किया गया तो कई तरह के कयास और आशंकाएं जताई गई थीं, लेकिन आज लगभग दो दशक की इस अवधि में भारत में आए बदलाव पूरी दुनिया से छिपे नहीं हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लंबी छलांग ने देश को एक बड़ी ताकत के रूप में उभारा है और रोजगार का सृजन भी व्यापक स्तर पर हुआ है। ऐसे में देश की प्रतिव्यक्ति आय में इजाफा भी हुआ है और इससे लोगों के जीवन स्तर में सुधार होना स्वाभाविक है।
ऐसा ही कुछ खुलासा करता है, ट्रेवल पत्रिका इंटरनेशनल लीविंग का जीवन गुणवत्ता सूचकांक (Quality of Life Index) 2010। जिसके मुताबिक भारत जीवन सूचकांक के मामले में रूस और चीन जैसे देशों को पछाड़ते हुए 88वें पायदान पर आ गया है। पिछले वर्ष के मुकाबले भारत ने 35 पायदान का सुधार किया है। इस रैंकिंग के चलते भूटान के बाद भारत इस उपमहाद्वीप में रहने के लिए दूसरा सबसे उपयुक्त स्थान है। वर्ष 2009 में भारत दक्षिण एशियाई देशों में भूटान, मालदीव और श्रीलंका के बाद चौथे स्थान पर था।
जीवन सूचकांक में दुनिया के 194 देशों को विभिन्न नौ श्रेणियों में रखा जाता है। इसमें रहन-सहन पर खर्च, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा, सुरक्षा और खतरा और जलवायु शामिल हैं। देखा जाए तो दुनिया में सबसे बेहतर जीवन सूचकांक के मामले में लगातार पांचवें साल फ्रांस पहले स्थान पर कायम रहा है। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया, स्विटजरलैंड और जर्मनी का स्थान है। अमेरिका चौथे पायदान से गिरकर सातवें पायदान पर आ गया है।
इसे भारत के लिए एक सही दिशा में संकेत माना जा सकता है। लेकिन भारत में जहां गरीबों की संख्या बढ़ने की बात कही जा रही है, वहां अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। समावेशी विकास की दिशा में अहम कदमों का अब भी इंतजार है। लेकिन एक शुरुआत तो हो ही चुकी है।
- ऐसे में आपको क्या लगता है कि हम विकास की सही दिशा में अग्रसर हैं?
- ऐसे कौन-से क्षेत्र हैं, जिनमें विकास संबंधी कार्यों को अभी अंजाम दिया जाना बाकी है?
- ऐसे कौन से अन्य उपाय हैं जिनसे आम आदमी की जीवन को और अधिक बेहतर किया जा सकता है?
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