जानलेवा समाजवाद - स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

दुनिया जबकि साम्यवाद के पतन की 20वीं वर्षगांठ मना रही है, कई विश्लेषकों को याद होगा कि कैसे सोवियत नीतियों की नाकामी ने सरकार को उत्पादन पर ज्यादा अधिकार दे दिया था और साम्राज्यवादी जाल की संज्ञा देकर कैसे विदेश व्यापार और निवेश को हतोत्साहित किया जाता था। भारत जैसे विकासशील देशों ने भी ऐसी ही नीतियों को अपनाया था, जो साम्यवादी नहीं समाजवादी थे। 1930 के दशक में सोवियत संघ द्वारा हासिल आर्थिक मजबूती का भारत कायल था। दरअसल वह दौर पश्चिमी देशों में महामंदी का था।

भारत को 1947 में जाकर आजादी मिली। 1950 में भारत ने पहले तीन दशक के लिए समाजवाद के लिहाज से योजनाएं तैयार कीं। इन नीतियों ने सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) विकास दर को 3.5 फीसदी और प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर को 1.49 फीसदी तक पहुंचा दिया। 60 और 70 के दशक में पूर्वी एशियन टाइगर्स(कोरिया, ताइवान, सिंगापुर, हांगकांग) ने 7-8 फीसदी सकल राष्ट्रीय उत्पाद दर हासिल की। बाद में 'मिनी टाइगर्स' के उपनाम से मशहूर दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों (थाइलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया) ने भी 7-8 फीसदी की सकल राष्ट्रीय उत्पाद दर हासिल कर ली। इस तरह से भारत का समाजवाद सुस्त साबित हुआ। भारत की विश्व निर्यात में 1947 में आजादी के समय की 2.2 फीसदी की साझेदारी 1985 तक गिरकर 0.45 फीसदी हो गई, लेकिन समाजवादियों ने इसे आत्मनिर्भरता में कामयाबी के तौर पर देखा, जबकि वास्तविकता में यह कारोबार में भारी नुकसान था।

भारत ने 1980 के दशक में सुधारों को काफी मंथर गति से लागू किया था, लेकिन 1991 के भुगतान संतुलन के संकट के बाद यह मुख्यधारा की नीति बन गई। इसी साल सोवियत संघ के पतन ने भारतीय राजनीतिज्ञों को इस बात का अहसास करा दिया कि समाजवाद पर और जोर भारत को संकट से नहीं उबार पाएगा और चीन में देंग शियाओपिंग के कामयाब बाजारोन्मुख सुधारों ने बता दिया था कि आर्थिक उदारीकरण के बेशुमार फायदे हैं। भारत की सुधार प्रक्रिया उत्तरोत्तर और अनियमित थी, लेकिन इसके संचित (cumulative) प्रभाव ने 2003-08 में भारत को चमत्कारी अर्थव्यवस्था बना दिया जहां सकल राष्ट्रीय उत्पाद की विकास दर 9 फीसदी और प्रति व्यक्ति वार्षिक सकल राष्ट्रीय उत्पाद विकास दर 7 फीसदी से ज्यादा हो गई। इसने आय और सामाजिक संकेतकों में भी सुधार दिखाया। अगर भारत ने आर्थिक सुधारों को एक दशक पहले लागू किया होता तो जीवन स्तर और सामाजिक संकेतक किस तरह से भिन्न होते? यह अध्ययन इस बात का अनुमान लगाता है कि बाल शिशु मृत्यु दर में कमी के कारण कितने बच्चों को बचाया जा सकता था, कितने और अधिक भारतीयों को साक्षर बनाया जा सकता था और कितने अधिक लोग गरीबी की रेखा से ऊपर उठ चुके होते। स्वाभाविक तौर पर, तथ्यों के विपरीत अनुमान सटीक नहीं हो सकते। लेकिन यह इस बात की कल्पना तो दे ही सकते हैं कि भ्रामक और दिशाहीन नीतियों के कारण कमजोर और गरीबों को किस त्रासदी का सामना करना पड़ा।

साधारण अनुमानों की बात

इतिहास हमें बताता है कि छोटे से परिवर्तनों का बड़ा और अनसोचा परिणाम हो सकता है। पास्कल की यह बात काफी ख्याति प्राप्त है कि अगर क्लियोपेट्रा की नाक थोड़ी छोटी होती तो दुनिया का इतिहास कुछ और होता। यानी तब वह उतनी खूबसूरत नहीं होती। मार्क एंथोनी उसके प्यार में पागल नहीं होता, मार्क एंथोनी और ऑक्टेवियस के बीच गृहयुद्ध नहीं हुआ होता और रोमन ही नहीं पूरी दुनिया का इतिहास शायद अलग होता। फिर भी, क्लियोपेट्रा की नाक का सिद्धांत, अर्थशास्त्रियों या इतिहासकारों को 'क्या होता अगर' जैसे सवालों को उठाने से नहीं रोक सका और न ही कल्पना को खुली छूट देकर ऐसे सवालों के जवाब देने की कोशिशों को ही रोका जा सका।

उदाहरण के लिए, अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार पाने वाले अमर्त्य सेन ने विकासशील देशों में लिंगभेद के आधार पर 10 करोड़ "कम या लापता महिलाओं" ("Missing Women") के अपने भाव को लोकप्रिय बना डाला। उन्होंने इस अनुमान को लोकप्रिय बनाने में भी काफी कोशिशें कीं कि 1958-61 के दौरान माओ की 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' की गलत नीतियां तीन करोड़ चीनियों की मौत का कारण बनी। यहां सेन की 'लापता महिलाओं' ("Missing Women") पर आधारित अनुमान लगाने की तकनीक का खुलासा जरूरी सा हो गया हैः

लापता महिला और पुरुष के विभिन्न अनुपातों के संख्यात्मक विचार के लिए हम किसी देश में महिलाओं की कमी का अनुमान लगा सकते हैं। जैसे चीन या भारत, हम चीन या भारत में और अतिरिक्त महिलाओं की संख्या का अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि यहां पर भी अगर दुनिया के अन्य इलाकों (महिला-पुरुष अनुपात भी वहां के बराबर होता) की तरह खयाल रखा जाता तो यहां महिलाओं की संख्या कितनी और ज्यादा होती। अगर हम पुरुषों और महिलाओं की समान आबादी की कल्पना करें तो दक्षिण एशिया, पश्चिमी एशिया और चीन में महिलाओं का पुरुषों के साथ 0.94 का अनुपात इस बात का इशारा करेगा कि महिलाओं की संख्या 6 फीसदी कम है। लेकिन पुरुष और महिलाओं का एक सा खयाल रखने वाले देशों में महिला-पुरुष अनुपात 1.05 का है तो वास्तविकता में महिलाओं की कमी 11 फीसदी हो जाती है। अगर 1.05 को अनुपात का आधार मान लिया जाए तो अकेले चीन में ही 5 करोड़ लापता या कम महिलाएं हैं। जब यह संख्या दक्षिणी एशिया, पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका की ऐसी ही संख्या में जोड़ दी जाती है तो 10 करोड़ महिलाओं की कमी उभरकर सामने आ जाती है। यह आंकड़े हमें बताते हैं कि महिलाओं को कितनी उपेक्षा का सामना करना पड़ा जोकि उनके लिए घातक साबित हुआ।

काम की ऐसी पद्धति जहां साधारण है वहीं आलोचनाओं के लिहाज से भी आसान है। यह महिला मृत्यु दर पर अन्य प्रभावों का जिक्र नहीं करती।

फ्रीकोनॉनॉमिक्स के विख्यात लेखकों स्टीफन जे. डुबनर और स्टीवन डी. लेविट ने एक वैकल्पिक खुलासा पेश किया है, जिसका पहला जिक्र शिकागो यूनिवर्सिटी की अर्थशास्त्री एमिली फॉस्टर ने किया था। उसका कहना था कि एशियाई देशों में लड़कों की ऊंची जन्म दर का कारण कन्या भ्रूण हत्या (और भेदभाव के अन्य कारण) नहीं बल्कि गर्भवती महिलाओं को होने वाला हेपिटाइटिस बी है। मोनिका दास गुप्ता जैसे स्कॉलर्स का कहना है कि ओस्टर ने बात का बतंगड़ बना दिया है। चीन में अगर पहला शिशु लड़की है तो दूसरा लड़का ही होने की संभावना ज्यादा है, यह साफ तौर पर हेपिटाइटिस बी की बजाय लैंगिक भेदभाव की ओर ही इशारा करता है। जनसंख्या के आंकड़ों के एक अन्य विश्लेषक एंसली कोल ने सेन के विश्लेषण की सावधानीपूर्वक की गई समीक्षा के बाद महिलाओं की संख्या में कमी का अनुमान 100 मिलियन (10 करोड़) की बजाय 60 मिलियन (6 करोड़) होने का लगाया है। लैंगिक भेदभाव के अलावा किसी भी समाज में अन्य कारण भी लड़के और लड़कियों के जन्म की संख्या को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए "कम या लापता महिलाओं" को लेकर अनुमान में अनिश्चितता तो होना ही है। फिर भी ऐसे आंकलनों की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। सेन का विश्लेषण आसान शब्दों में लैंगिक भेदभाव के कारण संभावित सामाजिक भेदभावों की ओर इशारा करता है। यहां मुख्य बात आंकड़ों की सुस्पष्टता नहीं, बल्कि सामाजिक संकट का आकार है। सेन के आंकलन को पूरी दुनिया में इस विषय पर बहस के दौरान इस्तेमाल किया जाता रहा है। उनका "महिलाओं की कमी" या missing women ऐसी चर्चाओं के लिए ब्रह्मवाक्य की तरह हो गया है। जांच-पड़ताल के इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए-बिना सेन को इसमें लिप्त किए-मैं भारत में "बच्चों की आबादी," "साक्षरता" की कमी और "गरीबों" की अधिकता के आंकलन की कोशिश करुंगा। शिशु मृत्यु दर, साक्षरता और गरीबी के कई कारण होते हैं। हर कारण के प्रभाव को माप पाना मुश्किल होता है। सेन जब "महिलाओं की कमी" की बात करते हैं तो आंकलनों में अनिश्चितता का मुख्य कारण यही होता है। फिर भी मैं देरी से लागू किए गए आर्थिक सुधारों के कारण सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) के धीमे विकास के सामाजिक प्रभाव का आंकलन करने की कोशिश करुंगा।

कार्यपद्धति

भारत में 1980 तक जीएनपी की विकास दर कम थी, लेकिन 1981 में आर्थिक सुधारों के शुरू होने के साथ ही इसने गति पकड़ ली थी। 1991 में सुधार पूरी तरह से लागू होने के बाद तो यह मजबूत हो गई थी। 1950 से 1980 के तीन दशकों में जीएनपी की विकास दर केवल 1.49 फीसदी थी। इस कालखंड में सरकारी नीतियों का आधार समाजवाद था। आयकर की दर में 97.75 फीसदी तक का इजाफा देखा गया। कई उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। सरकार ने अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह से नियंत्रण के प्रयास और अधिक तेज कर दिए थे। 1980 के दशक में हल्के से आर्थिक उदारवाद ने प्रति व्यक्ति जीएनपी की विकास दर को बढ़ाकर प्रतिवर्ष 2.89 कर दिया। 1990 के दशक में अच्छे-खासे आर्थिक उदारवाद के बाद तो प्रति व्यक्ति जीएनपी बढ़कर 4.19 फीसदी तक पहुंच गई। 2001 में यह 6.78 फीसदी तक पहुंच गई। क्या होता अगर आर्थिक सुधार कुछ अरसे पहले से लागू कर दिए जाते? 1950 में जब भारत ने 3.5 फीसदी की विकास दर हासिल कर ली थी तो कई अर्थशास्त्रियों ने इसे ब्रिटिश राज के अंतिम 50 सालों की विकास दर से तिगुना हो जाने का जश्न मनाया था। समाजवादियों ने इसे भारत की आर्थिक नीतियों की जीत करार दिया था, वे नीतियां जो अंतर्मुखी थीं और सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों के वर्चस्व वाली थीं। हालांकि 1960 के दशक में ईस्ट इंडियन टाइगरों (दक्षिण कोरिया, ताईवान, सिंगापुर और हांगकांग) ने भारत से दोगुनी विकास दर हासिल कर ली थी। जो इस बात का प्रमाण था कि उनकी बाह्यमुखी और निजी क्षेत्र को प्राथमिकता देने वाली आर्थिक नीतियां बेहतर थीं। ऐसे में भारत के पास 80 के दशक की बजाय एक दशक पहले 1971 में ही आर्थिक सुधारों को अपनाने के लिए एक अच्छा उदाहरण मिल चुका था।

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