नैतिक तानेबाने में सेंधमारी का खामियाजा

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक को दो रुझान परिभाषित करते हैं। एक, अच्छा रुझान और दूसरा, खराब रुझान। अच्छा रुझान यह है कि उच्च आर्थिक विकास दर के फलस्वरूप समृद्धि का फैलाव होने लगा है। दूसरा रुझान भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी का है। कुछ लोग तुरंत दोनों रुझानों का संबंध जोड़ देंगे, लेकिन दरअसल दोनों अलग-अलग हैं। उच्च विकास दर आर्थिक सुधारों की परिणति है और भ्रष्टाचार की वजह यह है कि सरकारी संस्थानों में अब भी सुधार पूरी तरह क्रियान्वित नहीं हो पाए हैं।

भारतीय इतिहास में भारतीय पहली बार दरिद्रता के दौर से उबर रहे हैं और ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जब बहुसंख्य आबादी के लिए जीवन आसान हो सकेगा। ऐसा भी नहीं है कि गरीबी पूरी तरह खत्म हो जाएगी, लेकिन गरीबों की संख्या काफी हद तक कम हो जाएगी और देश की राजनीति भी पूरी तरह से बदल जाएगी। यह एक अच्छी खबर है। बुरी खबर यह है कि समृद्धि फैल तो रही है, लेकिन शासन-प्रशासन की विफलता के साथ।

शासन की विफलता से हमें लगातार चोट लग रही है। ताजा मामला हरियाणा के पूर्व पुलिस प्रमुख एसपीएस राठोर का है जिसे रुचिका गिरहोत्रा छेड़खानी मामले में दोषी ठहराया गया है। इस मामले में न केवल पुलिस, बल्कि अदालत, नौकरशाही और राजनेता सभी 19 साल से लगातार फेल होते आए। निजी अर्थव्यवस्था के फैलाव के दौर में भी हम भारतीय मूलभूत सार्वजनिक सेवाओं के कमजोर क्रियान्वयन से निराश हैं। समाजवाद के दौर में हम आर्थिक विकास दर को लेकर निराश होते थे, लेकिन हमें हमारे संस्थानों पर नाज था। सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल उपलब्ध करवाने में लगातार विफल रही हैं, जबकि जनता को सबसे ज्यादा जरूरत इन्हीं की है। जिनकी हमें जरूरत नहीं है, वह हैं लाल फीते।

ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल भारत को भ्रष्टतम देशों की श्रेणी में रखे हुए हैं। 2005 में इसने जिन 11 सार्वजनिक सेवाओं का सर्वे किया था, उनमें भारत की पुलिस को सबसे भ्रष्ट पाया गया था। 80 फीसदी नागरिकों ने स्वीकार किया था कि उन्हें पुलिस से काम निकलवाने के लिए रिश्वत देनी पड़ी। 40 फीसदी लोगों ने देश की विधि प्रणाली को प्रभावित करने के लिए रिश्वत दी। तीन में से एक व्यक्ति ने बताया कि उसे स्कूलों और अस्पतालों में रिश्वत देनी पड़ी। हालांकि ये वे स्कूल हैं जहां प्रत्येक चार में से एक शिक्षक और पांच में से दो डॉक्टर डयूटी से नदारद रहते हैं। सबसे बड़ा आंकड़ा तो यह है कि 2004 की भारतीय संसद में हर पांच सांसदों में से एक सांसद के खिलाफ आपराधिक आरोप था।

हमारे नैतिक तानेबाने को बड़े घोटाले, जेहादी आतंकवाद, गुजरात जैसी घटनाएं या नक्सलवाद खत्म नहीं करते हैं। नैतिक तानेबाने में सेंध रोज की विफलताओं से लगती है। जब एक स्कूल शिक्षक गायब रहता है तो वह हमारे समाज के धर्म को चोट पहुंचाता है जो उसे हमेशा गुरु का दर्जा देता आया है। लेकिन इस मोर्चे पर प्रशासनिक विफलता न केवल संस्थागत है, बल्कि नैतिक भी है। यदि आप अनुपस्थित रहने पर एक शिक्षक को दंडित कर सके, तो बाकी शिक्षक अपने आप रास्ते पर आ जाएंगे। इसलिए भारतीय राज्य व्यवस्था का सुधार आर्थिक सुधारों से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। लेकिन इसमें कई कठिनाइयां हैं, क्योंकि इसमें शासकों को ही सबसे ज्यादा खोना पड़ेगा। हमें पुलिस, न्यायिक, प्रशासनिक और राजनीतिक सुधारों की भी जरूरत है। सत्ता में आना एक चीज है और उसका प्रबंधन करना दूसरी बात। कांग्रेस ने चुनाव जीतना तो सीख लिया है, लेकिन वह एक यह बात भूल गई कि यदि उसने शासन पर ध्यान नहीं दिया तो अंतत: उसे भी बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा।

- साभार: दैनिक भास्कर

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