कानून

"दि कैंडलमेकर्स पेटीशन” और "दि पेरेबल ऑफ दी ब्रोकन विंडो" के साथ ही 1850 में लिखा गया निबंध "दि लॉ" फ्रेडरिक बास्तियात की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचनाओं में शामिल है। "दि लॉ" चरणबद्ध तरीके से कानूनों की न्यायोचित व्यवस्था की व्याख्या करते हुए दिखाता है कि किस तरह ये कानून मुक्त समाज का सृजन करते हैं। उनका यह निबंध जॉन लॉक के "सेकंड ट्रीटीज़ ऑन गवर्नमेंट" से प्रभावित है और फिर बाद में हेनरी हेज़लिट की कृति "इकोनॉमिक्स इन वन लेसन" इससे प्रेरित है।

इस पुस्तक में बास्तियात बताते हैं "हम में से हर किसी को खुद को, अपनी आजादी और संपत्ति की रक्षा करने का भगवान से मिला प्राकृतिक अधिकार हासिल है।" इस अधिकार की रक्षा के लिए जरूरी वैयक्तिक बल के लिए राज्य आम ताकत का विकल्प मात्र है। कानून का स्वरूप उस समय विकृत हो जाता है जब यह किसी के गड़बड़ी करने के इरादे से हथियाए गए अधिकार की रक्षा के लिए किसी व्यक्ति के आत्मरक्षा के अधिकार पर प्रहार करता है।

कानून दूषित (परवर्टेड) हो गया! और इसके साथ ही देश की तमाम सामूहिक शक्ति भी! कानून मेरी राय में न केवल अपने उचित निष्कर्ष से परे हट गया, बल्कि इसे तो एक बिलकुल ही विपरीत परिणाम हासिल करने का जरिया बना दिया गया है! हर किस्म की लालसा की पूर्ति पर अंकुश की बजाय कानून उसकी पूर्ति का साधन बन गया है। कानून खुद ही उस असमानता को बढ़ावा दे रहा है जिसे दंडित करने के लिए उसे बनाया गया था। वाकई अगर ऐसा है तो यह एक गंभीर मामला है। जिसके लिए मैं अपने तमाम नागरिक साथियों का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा।

हमारे पास भगवान का दिया एक ऐसा तोहफा जो हर एक तोहफे को अपने भीतर समेटे हुए हैः जिंदगी। शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक।

लेकिन जिंदगी आत्मनिर्भर नहीं है। जिसने भी हमें जिंदगी दी उसने उसे सहेजने, उसे विकसित करने और उसे परिपूर्ण बनाने की जिम्मेदारी भी हमें सौंपी है।

उस लिहाज से उसने हमें मूलभूत काबिलियत (फैकल्टी) और विभिन्न किस्म के संसाधन भी दिए हैं। इन संसाधनों को हम अपनी काबिलियत (फैकल्टी) से आत्मसात (एसिमिलेशन) करते हैं और फिर उनका समायोजन (एप्रोप्रिएशन) करते हैं जिससे हमारी जिंदगी एक तय मार्ग पर चलती है।

अस्तित्व, काबिलियत (फैकल्टी) और समायोजन, दूसरे शब्दों में कहें तो व्यक्तित्व, आज़ादी और जायदाद, आखिर एक इंसान यही तो है।

इन तीनों ही की बात की जाए तो बिना किसी लोकप्रिय छलावे भरे बयान (डेमागोगिक विबिलिंग) के कहा जा सकता है कि वह किसी भी इंसानी कानून से पुरातन और श्रेष्ठ है।

व्यक्तित्व, आज़ादी और जायदाद का अस्तित्व इंसान के बनाए कानून के कारण नहीं है। इसके विपरीत व्यक्तित्व, आज़ादी और जायदाद के पहले से ही अस्तित्व में होने के कारण ही इंसान कानून बनाता है।

फिर आखिर कानून क्या है? जैसा कि मैं पहले भी कहीं और कह चुका हूं, यह एक व्यक्ति को वैध तरीके से आत्मरक्षा का अधिकार देने वाला एक सामूहिक संगठन है।

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- "राजनीतिक अर्थशास्त्र: चुनिंदा निबंध" से