सी. राजगोपालाचारी

राजाजीः निश्चित लक्ष्य संजोए एक व्यक्ति

-जी. नारायणस्वामी

- राजाजी के नाम से लोकप्रिय सी.राजगोपालाचारी की यह जीवनी प्रोफाइल्स इन करेज नाम की पुस्तक से ली गई है। राजाजी के इस जीवन परिचय में लेखक जी.नारायणस्वामी ने उनके संघर्ष, बेबाक व्यक्तित्व और फैसले लेने के निर्भीक अंदाज का बखूबी वर्णन किया है।

व्यक्तित्व एवं कृतित्व

[जन्म 10 दिसंबर, 1878  निधन 25 दिसंबर, 1972]

राजाजी पर प्रायः अंसगत और बार-बार अपना पक्ष बदलते रहने का आरोप लगता रहा है। हम कुछ ऐसी महत्वपूर्ण परिस्थितियों का अवलोकन कर सकते हैं, जब उनका विरोधाभास स्पष्ट रूप से दिखाई दियाः

  • वे एक रू‌ढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे और उन्होंने हिंदू धर्म पर अनेक पुस्तकें लिखी थीं तथा उन्हें कांची परमाचार्य द्वारा संतों में महासंत कहा जाता था। लेकिन उन्होंने ऐसे सामाजिक सुधारों को प्रोत्साहित किया जिन्हें आज भी बर्दाश्त नहीं किया जाता हैः अंतर्जातीय विवाह, विधवा विवाह और जातीय समानता।
  • जब वे वर्ष 1937 से 1939 तक मद्रास प्रेजीडेंसी के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने भारी विरोध के बीच हिन्दी को स्कूलों में एक अनिवार्य विषय के रूप में शुरू किया था तथा विरोध का दमन करने के लिए आपराधिक कानूनों का प्रयोग किया था। परंतु वर्ष 1950 मे उन्होंने ‌हिन्दी को राजभाषा बनाने के लिए एक उग्र अभियान शुरू किया और इसके स्थान पर अंग्रेजी की वकालत की।
  • वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेताओं के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे परंतु उन्होंने वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन तथा भारत के विभाजन के मुद्दों पर उनका विरोध किया। उन्हीं लोगों ने उन्हें बाद में अनेक उत्कृष्ट पदों पर नियुक्त किया, जैसे-कार्यकारिणी समिति का सदस्य, मंत्रिमंडल की सदस्यता तथा गवर्नर जनरल का पद।
  • उन्होंने वर्ष 1950 में कांग्रेस छोड़ दी तथा यह घोषणा करते हुए एक नई राजनैतिक पार्टी "स्वतंत्र पार्टी" की स्थापना की कि उनका उद्देश्य कांग्रेस तथा नेहरू को हराना है, बावजूद इस तथ्य के कि उनका नेहरू के साथ लंबा जुड़ाव रहा था और वे नहेरू के बड़े प्रशंसक थे।

हालांकि सावधानीपूर्वक सोच-विचार करने के पश्चात उन्होंने अपना विचार अथवा दृष्टिकोण बदल दिया। उन्होंने गांधी और नेहरू जैसे विशिष्ट नेताओं के साथ सहमत न होने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई, परंतु इसके साथ ही वे उन्हें समझाए जाने पर अपनी विचारधारा को बदलने के लिए भी तैयार थे।

राजाजी के जीवन और कॅरियर की संक्षिप्त चित्रणः

  1. उन्होंने एक क्रिमिनल लॉयर (आपराधिक मामलों के अधिवक्ता)  के रूप में 1900 में सलेम में 22 वर्ष की आयु में अपना कॅरियर आरंभ किया जोकि मद्रास से लगभग 200 मील दक्षिणपश्चिम में एक छोटा-सा कस्बा था। वे अपने इस पेशे में बहुत सफल रहे थे।
  2. वे वर्ष 1917 से 1919 तक सलेम नगरपालिका के अध्यक्ष रहे और इस दौरान उन्होंने अनेक सामाजिक सुधारों को अंजाम दिया।
  3. उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेने के लिए वर्ष 1919 में अधिवक्ता परिषद (बार) से इस्तीफा दे दिया और दोबारा इसमें शामिल नहीं हुए। उन्हें पहली बार दिसंबर 1921 में जेल जाना पड़ा।
  4. वे एक कुशाग्र लेखक थे और उन्होंने वर्ष 1922 में यंग इंडिया का संपादन किया और उन्होंने कल्कि और स्वराज्य सहित अनेक पत्रिकाओं में अनेक विषयों पर निय‌मित रूप से लेख लिखे। उन्होंने कुछ बहुमूल्य पुस्तकों की रचना भी की, जिसमें रामायण और महाभारत भी शामिल हैं, जिनका आज अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।
  5. उन्होंने स्वयं को पूर्ण रूप से सृजनात्मक कार्यक्रम में समर्पित करने के लिए वर्ष 1925 से 1930 तक खुद को सार्वजनिक जीवन से अलग कर लिया।
  6. वर्ष 1930 में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व करने के लिए उन्हें सार्वजनिक जीवन की मुख्यधारा में वापस बुला लिया गया।
  7. वर्ष 1937 से 1939 तक वे मद्रास प्रेजीडेंसी के मुख्यमंत्री रहे जोकि वर्तमान के तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल को मिलाकर एक संयुक्त राज्य था(जिसमें प्रांतीय राज्य शामिल नहीं थे)।
  8. कांग्रेस के आह्वान पर उन्होंने 1939 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
  9. उन्होंने "भारत छोड़ो" मुद्दे पर 1942 में त्यागपत्र दे दिया और पृथक पाकिस्तान की स्थापना की वकालत करना शुरू कर दिया।
  10. उन्हें 1946 में कांग्रेस में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया और उन्हें कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति में तथा कांग्रेस में 2 सितंबर, 1946 से 1947 तक पंडित नेहरू की अंतरिम सरकार में शामिल किया गया।
  11. उन्हें 15 अगस्त, 1947 को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया।
  12. वे 21 जून, 1947 को स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने और उन्होंने 26 जनवरी 1950 तक यह पद संभाला।
  13. वर्ष 1950 के अंत में उन्हें एक मंत्री के रूप में केंद्रीय सरकार में शामिल होने का एक बार फिर आमंत्रण दिया गया।
  14. 1952 में उनसे मद्रास राज्य का मुख्यमंत्री बनने का अनुरोध किया गया।
  15. उन्होंने 1954 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
  16. उन्होंने 81 वर्ष की आयु में 1959 में स्वतंत्र पार्टी के नाम से एक नई राजनैतिक पार्टी की स्थापना की।
  17. उन्होंने 1962 में (विदेश की उनकी पहली यात्रा) संयुक्त राज्य अमेरिका का दौरा किया। जिसके दौरान उन्होंने परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध लगाने की वकालत करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी से मुलाकात की।
  18. 25 दिसंबर, 1972 में उनका निधन हो गया।

सी.राजगोपालाचारी के चुनिंदा प्रकाशन
(सभी भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित)

 

  1. रामायण
  2. महाभारत
  3. थिरुक्कुरल
  4. भजगोविंदम
  5. डियर रीडर
  6. जेल डायरी

पुरा लेख पढने के लिये यहाँ क्लिक करें