हेलीकॉप्टर की मदद से गरीबी उन्मूलन

गरीबी कम करने के लिए ग्रामीण रोजगार योजनाओं का मैं पुरजोर समर्थक रहा हूं। मैंने उनका मूल्य सूखे के दिनों में और ऐसे इलाके के लोगों की पर्चेजिंग पॉवर (क्रय शक्ति) में इजाफे में भी देखा जिनकी रोजी-रोटी को कोई नुकसान हुआ हो। लेकिन फिर अनुभव ने मुझे सिखाया कि ऐसी योजनाओं की गरीबी उन्मूलन के लिए लंबे समय में कुछ खास कीमत नहीं होती। वे सूखे में एक अच्छा तात्कालिक उपाय तो हो सकते हैं लेकिन गरीबी को स्थायी तौर पर हटाने में कारगर नहीं हो सकतीं। ऐसा तो केवल उत्पादकता बढ़ाकर ही किया जा सकता है ताकि वास्तविक मजदूरी और आय बढ़े। इसलिए मैं रोजगार गारंटी कानून (ईजीए) को लेकर उत्साहित हूं। यह हर ग्रामीण घर में एक व्यक्ति को साल भर में 100 दिन के काम का वायदा करती है।

राष्ट्रीय सलाहकार परिष्द (एनएसी) के अनुमान के मुताबिक इस पर प्रति वर्ष 40 हजार करोड़ रुपए (जीडीपी का 1.3 फीसदी) का खर्च आएगा। सुनील जैन और शंकर आचार्य जैसे स्तंभकार इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर हर ग्रामीण घर से रोजगार के लिए आवेदन आया तो यह खर्च बढ़कर 150,000 करोड़ (जीडीपी का 4 फीसदी से कुछ ज्यादा) तक पहुंच सकता है।

मेरा डर बिलकुल अलग है। महाराष्ट्र की रोजगार गारंटी योजना (ईजीएस) के तेंडुलकर और अन्य द्वारा किए गए शोध से पता चलता है कि भागीदारी की दर काफी कम है। गरीबों को करने के लिए कई काम हैं और वो अधिकांश वक्त तो काम के लिए उपलब्ध ही नहीं होते।

एनएसी मानती है कि 5.5 फीसदी ग्रामीण योजना में भाग लेंगे, जबकि महाराष्ट्र में ऐसी योजना में केवल 3.3 फीसदी लोगों ने ही भाग लिया। पूरे भारत में इस स्तर की भागीदारी पर प्रतिवर्ष 22 हजार करोड़ रुपए का खर्च आएगा। यह ताजा सालों में ऐसी ही योजनाओं पर किए गए 10 हजार करोड़ रुपए या उससे कुछ ज्यादा की तुलना में बहुत ज्यादा है।

कई राज्य सरकारें तो इतनी अक्षम हैं कि वे हर साल योजनाओं के लिए मिला फंड बिना खर्च किए ही लौटा देती हैं। ऐसे अक्षम लोगों से ग्रामीण रोजगार के लक्ष्य को हासिल करने की उम्मीद नहीं लगाई जा सकती। अगर राज्य उन लोगों को मुआवजे की गारंटी देती है, जिन्हें वह काम नहीं दे सकती तो इसकी लागत और अधिक बढ़ जाएगी।

यही वजह है कि मुझे लगता नहीं कि राज्य इस कानून के साथ जुड़े गारंटी शब्द से सहमत हो जाएंगी। लेकिन मेरी आशंका तो किसी और बात को लेकर है। अगर मुझे लगता कि यह पैसा वाकई गरीबों तक पहुंचेगा तो मैं दोगुना खर्च करने से भी नहीं हिचकिचाता। बदकिस्मती से ग्रामीण रोजगार योजनाओं का बहुत कम पैसा ही गरीबों तक पहुंच पाता है।

राजीव गांधी का अनुमान था कि एक रुपए की सहायता राशि में से केवल 15 पैसे ही जरूरतमंदों तक पहुंच पाते हैं। अर्थशास्त्री महेंद्र देव और अजित रानडे इस आंकड़े को रुपए में 21 पैसा मानते हैं। यह तो गरीबी उन्मूलन के नाम पर बर्बादी ही है।

मनमोहन सिंह ने 1991-96 के दौरान बतौर वित्तमंत्री इसी उद्देश्य के साथ रोजगार बीमा योजना (एम्प्लॉयमेंट एश्योरेंस स्कीम) लागू की थी। प्रति ग्रामीण परिवार 100 दिन का काम, योजना में पहली प्राथमिकता पिछड़े हुए जिलों को और बाद में पूरे देश में लागू।  क्या इससे आर्थिक कंगाली का सामना करना पड़ा? नहीं। क्या इसने ज्यादा रोजगार दिए? हां, काम के मानवदिवस (मेनडेज ऑफ वर्क) 1990-91 के 87.50 करोड़ मानवदिवस से बढ़कर अपने सबसे अच्छे दिनों में 1995-96 में 1.23 अरब तक पहुंच गए थे।

इसके बावजूद कांग्रेस को 1996 में मुंह की खानी पड़ी थी। साफ तौर पर मतदाताओं ने इसे आम आदमी के काम का सुधार नहीं माना और न ही गरीबी के इलाज की तरह। एनएसएसओ सर्वे हमें 1987-88, 1993-94 और 1999-2000 के ग्रामीण गरीबी अनुपात (रुरल पॉवर्टी रेशो) देता है। बजट के कागजातों से हमें उन वर्षें के मानवदिवसों का पता चलता है।

1987-88 से 1993-94 के दौरान मानवदिवस 67.50 करोड़ से बढ़कर 1.07 अरब तक पहुंच गए, लेकिन ग्रामीण गरीबी अनुपात में 39.1 फीसदी से 37.3 फीसदी तक की गिरावट ही दर्ज की गई। जाहिर तौर पर ग्रामीण रोजगार योजनाओं और गरीबी के बीच का संबंध बहुत ही कमजोर है।

यह फर्जी दावे किए जाते हैं कि ग्रामीण रोजगार योजनाओं से ऐसे स्थायी संसाधन विकसित होते हैं जिनसे ग्रामीण इलाका समृद्ध होता है। अगर ऐसा होता तो दशकों की ग्रामीण रोजगार योजनाओं के कारण हमें पक्की सड़कें, स्कूल भवन और स्वास्थ्य क्लीनिक हर एक गांव में देखने को मिलते।

बदकिस्मती से ऐसा नहीं है। मुझे लगता है कि देश के हर गांव में सभी मौसम के लिए अनुकूल सड़क, बिजली (बिना अनुदान) और टेलीकॉम सुविधाएं देना गरीबी को कम करने का स्थायी तरीका है। नए आर्थिक मौकों के कारण इसके बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पंख लग जाएंगे।

भ्रष्टाचार को कम करके, उपस्थिति को सुनिश्चित करके और प्रशासन और अदालतों को बेहतर बनाकर हम गरीबी को कम कर सकते हैं। लेकिन मेरा यह तरीका राजनीतिज्ञों और एनजीओं दोनों को ही नागवार गुजरेगा। क्योंकि दोनों ही गरीबी का स्थायी हल निकालने की बजाय गरीबी के तुरत फुरत इलाज की तरह दिखना चाहते हैं। इसलिए मैं एक अलग तरीके का प्रस्ताव करता हूं। ग्रामीण इलाकों में किसी हेलीकॉप्टर या गैस के गुब्बारे (या दिवाली के रॉकैट तक से) से ग्रामीण इलाके पर पैसा बरसा दिया जाए। गरीब हर नोट को बटोरने के लिए घाटियों, पहाड़ों की खाईयों के सिरों पर भीड़ लगा देंगे। लेकिन यह काम अमीरों, नौकरशाहों या कांट्रेक्टरों से न कराया जाए। वरना कुछ ही भाग गरीबों तक पहुंच सकेगा।

कई नोट तालाबों, खेतों में गुम हो जाएंगे कई फट जाएंगे। लेकिन यह कुल हानि की तरह नहीं होगा इससे पैसे की आपूर्ति और मुद्रास्फीति पर लगाम लगेगी। अगर हेलीकॉप्टर से गिराने के लिए खासतौर पर पांच रुपए के एल्यूमिनियम के सिक्के बनाए जाएं तो यह बेहतर सोच होगी। इन्हें न तो जंग लगेगी और न ही यह कटेंगे-फटेंगे।

मनमोहन सिंह, कृपया ऐसा एक जिले में ऐसा करके बगल के जिलों में चल रही रोजगार योजनाओं के साथ गरीबी के लिहाज से इसकी तुलना कीजिए। शायद यह अनुभव आंख खोल देने वाला हो।

- टाइम्स ऑफ इंडिया में 19 दिसंबर 2004 को प्रकाशित

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