चुनौती शहर बचाने की...
कुछ लोग कभी-कभी ऐसा मानते हैं कि बढ़ती जनसंख्या का दबाव भारत जैसे विकासशील देश के लिए अभिशाप है। दिल्ली पुलिस के सबसे बड़े अफसर पुलिस कमिश्नर युद्धवीर सिंह ढढवाल ने भी पिछले हफ्ते दिल्ली की बढ़ती जनसंख्या को बढ़ते अपराध का कारण माना है। बढ़ते अपराध रोक पाने में अपनी असफलता को पुलिस महकमा दिल्ली की बढ़ती जनसंख्या के मत्थे मढ़ना चाहता है।
दरअसल, सब जानते हैं कि दिल्ली विविधताएं समेटे एक ऐसा शहर है, जो देश के दूसरे सबसे बड़े बाजार के रूप में जाना जाता है। इसकी अर्थव्यवस्था तेजी से फैल रही है। हर ओर समृद्धि की ब्यार नजर आती है। वाकई सब कुछ कितना अच्छा है।।। जाहिर है अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए अवसरों की तलाश में लोग सब तरफ से दिल्ली की ओर रुख करेंगे।
दिल्ली पुलिस, जिसकी जिम्मेदारी सफेदपोश नेताओं की सुरक्षा की चिंता के साथ ही आम लोगों के जान-माल की देखभाल की भी है, खुद कह रही है कि दिल्ली में पिछले साल की अपेक्षा 2009 में अपराधों में एक फीसदी से कुछ ज्यादा का इजाफा हुआ है। सीनियर सिटीजन और अधिक असुरक्षित हुए हैं।
दिल्ली के पुलिस आयुक्त की सुनें तो उनका कहना है कि दिल्ली में जनसंख्या संबंधी भिन्नता, असंगठित शहरीकरण और बढ़ता सामाजिक-आर्थिक असंतुलन इस तरह के अपराधों को पनपने के लिए उर्वर भूमि उपलब्ध कराते हैं।
कहा जा रहा है कि अपराध हो रहे हैं, उन्हें अंजाम देने वाले एकदम नए चेहरे हैं। यानी चेन खींचने, अपहरण और हत्याओं को अंजाम देने वाले इन अपराधियों ने पहली बार इस दिशा में कदम बढ़ाया है। इन नए तरह के अपराधियों की पीढ़ी जो सामने आई है, उससे इस बात का खुलासा होता है कि अपराधों को अंजाम दे रहे लोग या तो वह हैं जो आधुनिक जीवन की जरुरतों के साथ ताल से ताल मिलाने की होड़ के बुरी तरह शिकार हैं या फिर ऐसे लोग हैं जो मौजूदा अंसतुलित विकास और संसाधनों के कुछ लोगों तक ही सीमित रहने का दंश झेल रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि जिस विकास का बखान किया जा रहा है वह काफी हद तक संतुलित नहीं है। लोगों को ऐसे अवसर ही नहीं मिल रहे कि वे अपनी आजीविका का इंतजाम कर लें। हकीकत में समाज के विभिन्न तबकों तब इसका लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। जिस स्तर पर रोजगार मुहैया कराया जाना चाहिए या फिर जिस तरह एक सभ्य समाज को विकास की दिशा में बढ़ना चाहिए, हम उस तरह कदम नहीं बढ़ा पा रहे हैं।
आने वाले समय में दिल्ली को कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करनी है, हमें ऐसे समय में सभी तबकों के लोगों की जरूरत होगी जो इस काम को सफलतापूर्वक अंजाम देने में मदद कर सकें। यह मौका है कई लोगों को आजीविका के साधन मुहैया करवाने का। अपराध रोकने के बहाने अपराध की ओर बढ़ते लोगों को ऐसे आर्थिक-सामाजिक अवसर देने का जिससे वे अपनी जिंदगी चैन से गुजार सकें।
- आपकी नजर में दिल्ली में अपराध कम करने का तरीका क्या हो सकता है?
- क्या आप मानते हैं कि महानगरों में संतुलित विकास की जरुरत है?
- कौन सी नीतिगत पहल इसके लिए कारगर होगी?
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