ज्यादा उम्र का मतलब कम गरीबी

हर कोई इस बात को मानता है कि जिंदगी के मायने पैसे से ज्यादा कुछ और भी है। फिर भी हम जीवन स्तर को पैसों के तराजू से ही तौलते हैं। क्यों? क्योंकि गैर-मौद्रिक (नॉन-मॉनिटेरी) चीजों को मापना जरूरी भले ही हो, लेकिन आसान कतई नहीं है। आप सांप्रदायिक शांति की कीमत को कैसे मापेंगे? या फिर लोकतंत्र की? हम स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे सामाजिक संकेतकों को माप सकते हैं, लेकिन उनका मूल्य तय करने में परेशानी का सामना कर सकते हैं। यही वजह है कि भारत में गरीबी या आर्थिक विकास की चर्चा हमारी उपभोग की क्षमता और आय पर ही केंद्रित होती है। इंसान जिंदगी को सबसे कीमती मानता है। अमेरिकी अपनी पूरी जिंदगी के खर्च का 90 फीसदी बुढ़ापे में अपने स्वास्थ्य की देखभाल पर खर्च करते हैं। जिंदगी को कुछ और साल खींच लेने के लिए जिंदगी की कमाई झोंक देना कोई बड़ा खर्च नहीं लगता।

फिर भी जिंदगी की यह ऊंची कीमत हमारी गरीबी या सकल घरेलू उत्पाद की चर्चा में कहीं दिखाई नहीं पड़ती। हमारा गणना का तरीका ही कुछ ऐसा है कि एक चिकन के जन्म पर हमारा सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) बढ़ जाता है, लेकिन यह एक बच्चे के जन्म लेते ही नीचे गिर जाता है। क्यों? क्योंकि हम किसी चीज की कीमत उसकी उपभोग की कीमत पर तय करते हैं, क्योंकि चिकन खाया जा सकता है, बच्चा नहीं (मानवभक्षी समाज के इतर)। दूसरी ओर एक परिवार बच्चे को तोहफे से कम नहीं समझता, ऐसा तोहफा जिसकी कीमत को आंका नहीं जा सकता। लेकिन हमारे आंकड़े बताते हैं कि इससे जीवन स्तर में गिरावट आती है क्योंकि परिवार की कमाई एक और व्यक्ति में बंटेगी। आखिर हम जीवन के बेशकीमती होने का पैमाना कैसे तय करेंगे? कोई आदर्श फॉर्मूला ज्ञात नहीं है, लेकिन (और निश्चित ही विवादित) येल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विलियम डी. नोरदॉस ने एक फॉर्मूला पेश किया है। उनकी 'स्वास्थ्य आय' की सोच इस बात पर आधारित है कि एक व्यक्ति ज्यादा दिन तक जिंदा रहने के लिए कितना खर्च करेगा। इसी आधार पर वह अमेरिका में स्वास्थ्य आय का हिसाब लगाते हैं।  नोरदॉस का दावा है कि 20वीं सदी के पहले तीन क्वार्टर्स में स्वास्थ्य आय में जीडीपी से ज्यादा तेज गति से इजाफा हुआ और सदी के अंतिम क्वार्टर में जीडीपी से कुछ कम हो गई। इसलिए परंपरागत आंकड़ों में ज्यादा उम्र के साथ जीवन स्तर में भी भारी सुधार देखा जा सकता है। पहले दो क्वार्टर में अमेरिका में जीवन की आशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) 49 से बढ़कर 68 हो गई। लेकिन 1995 में यही घटकर 75.8 हो गई।

भारत में लाइफ एक्सपेक्टेंसी 1940 के 27 से सुधरकर 90 के दशक तक 61.1 हो गई है। यह एक जोरदार प्रगति है। अगर कोई नोरदॉस के तरीके को भारत की स्वास्थ्य आय को जानने के लिए इस्तेमाल करे तो मुझे लगता है कि यह जीवनस्तर में भारी सुधार ही दिखाएगा। एक बार हम गरीबी का आंकलन उपभोग की बजाय लोगों द्वारा अन्य चीजों को दिए जाने वाले महत्व से करने लगेंगे तो हम तमाम बातों में सुधार पाएंगे जिनके लिए वे पूरी जिंदगी जूझते रहते हैं। लोग साक्षरता, अच्छे स्वास्थ्य, बच्चों की मृत्युदर में कमी जैसी बातों को भी काफी महत्व देते हैं। पिछले दशक में बड़े पैमाने पर मौत का कारण बनने वाले हैजा, मलेरिया और प्लेग पर आज बड़े पैमाने पर काबू पा लिया गया है। शिशु मृत्यु दर प्रति हजार जन्म 250 मौत से घटकर 70 मौत प्रति हजार जन्म तक आ गई है। 1940 में जहां साक्षरता की दर 18 फीसदी थी तो ताजातरीन जनगणना में यह 65 फीसदी पाई गई है। हमारे गरीबी के आंकड़े सामाजिक सुधार के इन पैमानों की अनदेखी करते हैं। गरीब राज्यों में उपभोग की तुलना में जीवन दर और साक्षरता में भारी इजाफा देखा गया है। गरीब और अमीर राज्यों के बीच आय में भारी अंतर देखा जा सकता है। लेकिन जहां तक बात जीवन दर और साक्षरता की है तो यह अंतर दिनों-दिन कम होता जा रहा है। जरा इन आंकड़ों को देखिए, 1999-2000 में सकल राष्ट्रीय आय प्रति व्यक्ति के मामले में बिहार (6382 रुपए) महाराष्ट्र (23398 रुपए) और राष्ट्रीय औसत (15562 रुपए) से काफी पीछे था। लेकिन बिहार में औसतन उम्र सीमा (59.6 वर्ष) राष्ट्रीय औसत (61.1 वर्ष) से कुछ ही कम थी। बिहार में शिशु मृत्यु दर (76 प्रति हजार) 70 प्रति हजार के राष्ट्रीय औसत से कुछ ही ज्यादा थी। सबसे ज्यादा साक्षर केरल (90.9 फीसदी) और सबसे कम साक्षर राज्य बिहार (47.5 फीसदी) के बीच आय के अंतर की तुलना में साक्षरता का अंतर कुछ भी नहीं।

गरीब माने जाने वाले मध्यप्रदेश (64.1 फीसदी) में साक्षरता की दर कुछ  ज्यादा उन्नत माने जाने वाले आंध्र प्रदेश (61.1 फीसदी) से कुछ ज्यादा है। इसलिए हमें गरीबी को लेकर बहस को नए परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ाना होगा। इसके लिए हमें न केवल उपभोग बल्कि उन बातों को भी आधार बनाना होगा जिन्हें हम जिंदगी में कुछ मूल्य देते हैं। सबसे ज्यादा तवज्जो तो हमें जिंदगी की कीमत को देनी  होगी, जो सभी बातों से ज्यादा कीमती है।