दर्ज होगा गुनाह का ब्यौरा...
देश के किसी भी हिस्से में अपराध नई बात नहीं है। असुरक्षा हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई है। देश के ऐसे कई शहर हैं जहां घर में ताला लगा कर आप किसी काम से गए नहीं कि ताला अब टूटा, तब टूटा, सोने की चेन या मंगल-सूत्र खींचने के लिए बाइक पर नौजवान बेधड़क घूम रहे हैं। यह तो हुई चोरों, उठाइगिरों की बात। लेकिन उनका क्या जो कानून के रखवाले कहे जाते हैं और वही उच्च पदस्थ अधिकारी और नेता कभी किसी की अस्मिता तो किसी की जमा-पूंजी लूटने से बिल्कुल नहीं घबराते क्योंकि उनके खिलाफ आप थाने में रपट तक नहीं लिखवा सकते।
भारत सरकार अब थाने में अपराध के खिलाफ सभी शिकायतों को प्राथमिकी बनाने की दिशा में काम कर रही है। गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को एक परिपत्र जारी करने का निर्णय लिया है, जिसमें उनसे यह सुनिश्चित करने को कहा जाएगा कि थानों को मिलने वाली सभी शिकायतों को एफआइआर के तौर पर समझा जाए। एफआइआर नहीं लिखने वाले वर्दीधारियों के खिलाफ कार्यवाही की बात भी कही गई है।
जी हां, सरकार ने यह कदम कोई अपने आप से लेने का फैसला नहीं लिया है, इस फैसले की जड़ें रुचिका गिरहोत्रा के दुर्भाग्यपूर्ण मामले से जुड़ी है। रुचिका गिरहोत्रा मामले में पीड़ित पक्ष की ओर से लड़ी गई लंबी लड़ाई ने मीडिया और सिविल सोसायटी के दबाव के चलते उम्मीद की किरण पैदा की है. एक किशोरी जिसे एक उच्च पदाधिकारी की बदसलूकियों का शिकार होकर असमय ही जान देनी पड़ी, उसके बाद उसके परिवार के साथ जो हुआ आज वह दुनिया से छिपा नहीं है। जब रुचिका के परिवार ने हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई तो पुलिस ने शुरुआत में एफआइआर दर्ज करने से ही इनकार कर दिया था। एफआइआर दर्ज होने में नौ साल का समय लग गया।
किसी भी शख्स के लिए पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज कराना आसमान से तारे तोड़ने से कम मुश्किल नहीं होता है। अगर मामला बलात्कार या किसी प्रभावी शख्स से जुड़ा हो तो ऐसे मामलों में पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने में बचते हुए साफ देखा जा सकता है। यही नहीं, बलात्कार या यौन उत्पीड़न के मामलों की बात करें तो उसमें शुरुआती 24 घंटे सबसे अहम होते हैं, क्योंकि उसके बाद जैविक साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं।
यह तो कुछेक ऐसे मामले हैं जो मीडिया के चलते सामने आ जाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत तो कुछ और ही है। जिस संख्या में अपराध होते हैं, और उनके दर्ज होने की संख्या देखें तो कई प्रश्न मुंह बाए खड़े हो जाते हैं। कानून तो हमेशा से मौजूद थे, और अब सख्ती बरते जाने की बात भी हो रही है, लेकिन सोचने की बात यह है कि लोग तो वही रहने वाले हैं। इसलिए सरकार को जरुरत ऐसा तंत्र विकसित करने की है, जो हर पीड़ित की समस्या के प्रति पूरी तरह संवेदनशील हो। जो मामला दर्ज करते समय सामने वाले के रुतबे पर नजर नहीं डाले बल्कि समानता के साथ सबके साथ पेश आए। साथ ही जरुरत ऐसे अधिकारियों को सख्त सजा देने की है जो अपने पद का दुरुपयोग करते हैं।
अगर सरकार इस कदम पर प्रभावी ढंग से अमल करती है तो तो जाहिर तौर पर यह एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध होगा लेकिन पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए एफआइआर दर्ज करने के साथ ही मामले की त्वरित जांच भी एक अहम पहलू है, जिस पर सरकार को नजर डालनी होगी।
क्या आपको लगता है कि सरकार के इस दिशा में कदम वाकई पीड़ितों की मदद करने में कारगर होंगे? क्या इन कदमों को लेकर आप के कुछ सुझाव हैं?
