तालीबानी मानसिकता से मुकाबला - डॉ. खलील अहमद
अपनी स्थापना के समय से ही पाकिस्तान एक संवैधानिक संकट से गुजर रहा है और गहरी जड़ों में समाई अन्य समस्याओं की तरह ही इससे निजात पाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। फिर भी, पाकिस्तान को आज़ादी और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ने के लिए इस संकट से हर हाल में उबरना होगा।
भारत की आज़ादी के कुछ समय बाद ही, मुस्लिम लीग ने धार्मिक पहचान के आधार पर पृथकतावादी स्थिति की दिशा में कदम बढ़ाने शुरु कर दिए, उनका तर्क था कि वे मुस्लिमों के लिए संवैधानिक संरक्षण सुरक्षित कराना चाहते है। लेकिन जब कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर टस से मस नहीं हुई तो मुस्लिम लीग ने अपनी मांग को आगे बढ़ाते हुए एक मुस्लिम स्टेट के रूप में पाकिस्तान के निर्माण की मांग कर डाली।
इस प्रकार, एक संवैधानिक मुद्दे को एक धार्मिक मुद्दे में मिला दिया गया। जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया, क़ायद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना ने एक दुविधा का सामना कियाः मुस्लिम लीग अपनी पृथक धार्मिक पहचान की मांग के नारे का इस्तेमाल कर रही थी और अब वह एक धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना करना चाहते थे, जैसा कि 11 अगस्त, 1947 के उनके भाषण से स्पष्ट होता है। यह विवाद आज की तारीख तक बरकरार है।
इसके बाद, चूंकि 1973 तक संविधान का निर्माण नहीं हो सका (हालांकि इस अवधि में कुछ संविधान बनाने और उन्हें लागू करने के प्रयास जरूर हुए, जो भी उनकी खूबियां रही हों, वे टिक नहीं पाए) यह बात जाहिर हुई कि किस तरह एक संवैधानिक मुद्दे को, खासतौर पर धार्मिक आज़ादी के मसले को, धार्मिक मुद्दे में तब्दील करना पाकिस्तान के लिए कितना घातक साबित हुआ। सेना और धार्मिक उच्च वर्ग ने संविधान के अभाव में अपनी सत्ता और विशेषाधिकारों को मजबूती देना शुरू कर दिया और यह सुनिश्चित करने के लिए वे पुरजोर कोशिश करते रहे कि पाकिस्तान में कोई संविधान अस्तित्व में ही न आ सके।
नागरिकों के मूल अधिकार, जिनकी चर्चा नेहरू रिपोर्ट में बहुत पहले 1928 में की गई थी, पाकिस्तान में तब तक महज काल्पनिक रूप में ही रही जब इस मसले को 2007 में वकीलों का आंदोलन सड़कों पर ले आया। इससे पहले समाजवाद, लोकलुभावनवाद, धर्म, प्रबुद्ध संयम1, परजीवीवाद और लोक कल्याणकारी राज्यवाद के मिश्रण ने मूल अधिकारों के मुद्दे को दरकिनार कर दिया। इसलिए, छह दशक की पाकिस्तान की राजनीति को नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों को गुप्त रूप से क्षति पहुंचाने के रूप में संक्षेपित किया जा सकता है। इसके तहत राष्ट्र ने दृढ़ता के साथ वही कहा जो राजनीतिज्ञों ने अपनी ताकत के दम पर नागरिकों के हित में सही समझा और इसमें धार्मिक मसले भी शामिल थे।
सैद्धांतिक रूप से, संविधान का काम है लोगों के जीवन, संपत्ति और नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करना। आम लोगों पर राष्ट्र का नियंत्रण राजशाही अतीत की निशानी है, जहां कानून के शासन की बजाए शासक ही कानून होता था और वह कानून के पालनहार के रूप में अपने विषयों की देख-रेख करता था। जब कानून की सत्ता सर्वोच्च होती है, तब राष्ट्र के कानून और राष्ट्र नागरिक जीवन, संपत्ति और मूल अधिकारों को समान रूप से संरक्षण प्रदान करते हैं। इसी वजह से संविधान पर किसी भी आक्रमण से पहले इन मूल अधिकारों के स्थगन की आवश्यकता होती है।
ऐसे कानून वाला शासन, जो प्रत्येक नागरिक को अपनी मर्जी से जिंदगी जीने देने के लिए बुनियादी हक देता है, वह पाकिस्तान में नदारद था। ऐसे रूल ऑफ लॉ की गैरमौजूदगी से उपजे खाली स्थान को भरने के लिए धार्मिक, विभिन्न पंथों के अनुयायी, विशिष्ट धर्म, भाषा या संस्कृति का अनुसरण करने वाले, बुद्धिजीवी वर्ग, राजनीतिज्ञ, व्यवसायी और सेना जैसे विभिन्न प्रकार के संभ्रात दौड़ पड़े। इस खाली जगह को इसी तरह रहने देना और लंबे समय तक यही स्थिति बरकरार रखना स्वाभाविक ही था।
हमारे आस-पास पाकिस्तान में ऐसा एक बार फिर हो रहा है और यह दर्शाता है कि इस संकट का स्वरूप संवैधानिक है। ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देने वालों का साथ पाकर एक हिंसक विद्रोह के रूप में तालिबान के घातक हमले इस बात को स्पष्ट करते हैं, जिसके साथ संवैधानिक तरीके से कभी नहीं निपटा गया। एक संविधान की गैरमौजूदगी और जब वह हमारे पास था तब उसके सरेआम उल्लंघन ने ऐसी मानसिकता को मजबूत ही किया है।
इसलिए जब उपरोक्त संभ्रांत वर्ग एक व्यवस्था को लागू करता है तब आम लोगों को गंभीर असुरक्षा का सामना करना पड़ता है- एक ऐसी असुरक्षा जो उनके अस्तित्व पर खतरा बन कर मंडराती है और ऐसे खतरे से निजात मिलने के कोई संकेत नजर नहीं आते। यह त्रासदी गहरी और हमारी कल्पना से परे है। हो सकता है पाकिस्तान में पूरी तरह समर्पित तालिबान कम संख्या में हों, लेकिन उन संभावित तालिबानों की संख्या को कौन गिन सकता है जो हमारे बीच रह रहे हैं?
हमारे साथ रह रहे संभावितों को हम सक्रिय और निष्क्रिय समूहों में बांट सकते हैं। सक्रिय लोगों में धार्मिक समूह और राजनैतिक दल हो सकते हैं जबकि निष्क्रिय वे आम नागरिक हैं जो खुद अपनी तालीबानी मानसिकता के बारे में अनजान हैं। वे सरेआम दूसरों को उनकी आज़ादी से वंचित करने में विश्वास रखते हैं और अपनी खुद की तानाशाही विचारधारा के मुताबिक दूसरों की जिंदगी को नियंत्रित करते हैं। शायद इसी वजह से हमने पाकिस्तान में तालिबान की अंधाधुंध हत्याओं के बावजूद उनके खिलाफ जनता के कोई खास बड़े विरोध प्रदर्शन नहीं देखे हैं।
इस जंग को जीतने के लिए हमें सबसे पहले इस बात को समझना होगा कि हम एक बौद्धिक युद्ध और साथ ही एक वास्तविक युद्ध के बीच में हैं। 1973 का संविधान आज़ादी और मूल अधिकारों में विश्वास रखने वाले सभी लोगों को एक जगह एकत्रित करने वाला एक केंद्र बिंदु होना चाहिए। इस दस्तावेज में इन आज़ादी और मूल अधिकारों जैसे पवित्र मूल्यों को सहेज कर रखा गया है। इससे हमें पूरी तरह समर्पित और संभावित तालीबान से लड़ने में मदद मिलेगी, और सभी पाकिस्तानियों के बीच शांति, सद्भाव, स्थिरता और खुशी कायम करने में मदद मिलेगी।
1प्रबुद्ध संयम (enlightened moderation) - सही सोच के साथ भावनाओं के स्थान पर तर्कशक्ति के आधार पर निर्णय लेना। वीकीपीडिया के मुताबिक यह प्रस्ताव 2004 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने रखते हुए कहा था कि इस्लाम को फंडामेंटलिस्ट यानी मूलतत्ववादी रूप में व्यवहार में लाने की बजाए मॉडरेट यानी संयमित रूप में व्यवहार में लाना चाहिए। फंडामेंटलिस्ट इस्लामी संगठनों ने मुशर्रफ के इस दृष्टिकोण की आलोचना की थी।
- लेखक ऑल्टरनेट सॉल्युशंस इंस्टीट्यूट (Alternate Solutions Institute) के संस्थापक और प्रमुख हैं। यह आलेख पाकिस्तान में अलग-अलग तारीखों को ‘पाकिस्तान ऑब्जर्वर’, ‘दि पोस्ट’ और ‘दि फ्रंटियर पोस्ट’ में प्रकाशित हो चुका है।
