सत्ता का खेल ...
सारी कवायद मात्र सत्ता पर आसीन होने के लिए है। जब एकमात्र उद्देश्य सत्ता पर काबिज होना हो तो सब चलता है, कोई भी अस्पृश्य नहीं रह जाता। कुछ ऐसा ही नजारा उस समय देखने को मिला जब 23 दिसंबर को झारखंड विधानसभा चुनाव नतीजे आए।
जनता ने किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया। बस फिर क्या था, सत्ता पाने के लिए जोड़-तोड़ का पुराना खेल फिर शुरू हो गया।
देखा जाए तो नवंबर 2000 में झारखंड का गठन होने के बाद से राज्य में छह मुख्यमंत्री हो चुके हैं और कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन भी लागू रह चुका है। इस सबके पीछे कारण जनता द्वारा खंडित जनादेश ही रहा है।
झारखंड विधानसभा चुनाव नतीजों ने एक बार फिर दिखा दिया है भारतीय राजनीति में किस तरह से पदलोलुपता सर्वोपरि है। सीटों के मामले में कुछ सौभाग्यशाली रहे झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन एकदम से आगे आए और उन्होंने यह शर्त रखकर सबको हैरत में डाल दिया कि उनकी पार्टी उसी को समर्थन देगी जो मुख्यमंत्री पद के उनके दावे का समर्थन करेंगी। यानि एकमात्र उद्देश्य सत्ता पर काबिज होना। सोरेन ने सत्ता पर काबिज होने के लिए अपनी धुर विरोधी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का हाथ थाम लिया। इस गठबंधन से दोनों ही पार्टियों की हकीकत सामने आ जाती है क्योंकि जब शिबू सोरेन को यूपीए सरकार ने केंद्रीय मंत्री बनाया था, उस समय इस फैसले का सबसे ज्यादा विरोध करने वाली पार्टी भाजपा ही थी। अब सोरेन का मुख्यमंत्री बनना तय है और वह भी भाजपा के समर्थन से।
क्या अवसरवाद की यह राजनीति आपको मंजूर है?
क्या उम्मीद करते हैं कि लोकतांत्रिक आजादी के नाम पर नेता सत्ता के खेल में जनता के साथ न्याय कर पाएंगे?
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