स्कूल चयन पर राष्ट्रीय सम्मेलन
सबके लिए गुणवत्ता शिक्षा: बेहतर स्कूली शिक्षा के लिए नीतिगत समाधान
16 दिसंबर 2009, सुबह 9 बजे से रात 8 बजे तक
अमलतास हॉल, इंडिया हैबिटाट सेंटर, नई दिल्ली
प्रेस विज्ञप्ति
“सबके लिए गुणवत्तापरक शिक्षा: बेहतर स्कूली शिक्षा के लिए नीतिगत समाधान” विषय पर पहली स्कूल चॉइस नेशनल कॉन्फ्रेंस (एससीएनसी) का आयोजन स्कूल चॉइस कैम्पेन ने 16 दिसंबर 2009 के दिन इंडिया हैबिटाट सेंटर, नई दिल्ली में किया गया.
इस सम्मेलन में शीर्ष स्तर के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शिक्षाविदों, शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, विचारकों आदि के साथ ही स्वयंसेवी संगठनों कंपनी क्षेत्र और शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया. इस सम्मेलन में गणमान्य अतिथि बड़ी संख्या में मौजूद थे और उन्होंने इस कार्यक्रम की सराहना की.
सम्मेलन के उद्घाटन के दौरान संबोधित करते हुए विश्व बैंक के अग्रणी शिक्षा विशेषज्ञ सैम कार्लसन ने भारत में शिक्षा के अधिकार के क्रियान्वयन में सरकार और नागरिक सामाजिक संगठनों के समक्ष चुनौतियों का खुलासा किया. सरकार और निजी क्षेत्र के बीच भागीदारी में वृद्धि का आह्वान करते हुए उन्होंने स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता पर ज्यादा जोर देने की मांग की. इस मौके पर सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के अध्यक्ष पार्थ जे. शाह और श्री कंवल रेखी भी उपस्थित थे. उन्होंने स्कूल चयन संबंधी समाधानों और भारत में स्कूली शिक्षा में सुधारों तथा उदारीकरण पर अपने विचार व्यक्त किए.
सम्मेलन के विभिन्न सत्र ‘शिक्षा के अधिकार’ के प्रमुख प्रावधानों के क्रियान्वयन और भविष्य में इन प्रावधानों के भारतीय प्राथमिक शिक्षा पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर केंद्रित थे.
पहले सत्र का विषय था “निजी स्कूल और निर्धनः आरटीई की धारा 12 के तहत 25 फीसदी का क्रियान्वयन”. इस विषय पर एक सशक्त पैनल ने चर्चा की जिसमें राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन विश्वविद्यालय (एनयुपीईए) के प्रो. आर. गोविंदा, श्री एड्युकेयर लि. के सीईओ और एमएचआरडी के पूर्व निदेशक अमित कौशिक, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कार्तिक मुरलीधरन और जीइएमएस एज्युकेशन, ब्रिटेन के सीईओ एंडर्स हल्टिन शामिल थे. इस सत्र में धारा 12 के क्रियान्वयन की चुनौतियों के बारे में चर्चा की गई और साथ ही उन अभिनव योजनाओं पर भी विचार-विमर्श किया गया जो इस प्रावधान का सफल क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए आदर्श बन सकें. इसके अलावा, इस दिशा में सरकार की प्रयास और काम की प्रगति को भी सामने रखा गया.
सत्र का सार पेश करते हुए प्रो. गोविंदा ने कार्यक्रम के श्रोताओं को सूचित किया कि धारा 12 के तहत इस्तेमाल किए जाने वाले स्कूल वाउचर्स को लेकर सरकार ने कोई कदम नहीं उठाए हैं और साथ ही उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि शिक्षा का अधिकार विधेयक संबंधी नियम-कायदे आगामी महीनों में लागू हो जाएंगे.
ऐसी आशंका जताई जा रही है कि आरटीई अधिनियम के लागू होने पर लाखों गैर मान्यता प्राप्त स्कूनल बंद हो जाएंगे. “ग्रेडेड पहचान प्रणालीः शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 19 के अंतर्गत एक सकारात्मक कदम” विषय पर केंद्रित दूसरे सत्र में वक्ताओं ने अपने विचार रखे. इस नए प्रावधान से देश के 2,00,000 स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकेगा. साथ ही नई व्यवस्था के अंतर्गत सरकारी पहचान प्रणाली में नए गुणवत्ता मापदंडों का समावेश भी होगा.
स्कूल चॉइस प्रोग्राम के राष्ट्रीय निदेशक बालादेवन आर. ने कहा, “इस नए विचार के सामने आने से सरकार उन गैर मान्यताप्राप्त छोटे स्कूलों को कानून के दायरे में ला सकेगी जो समाज के कमजोर सामाजिक-आर्थिक तबके के लोगों के बीच संचालित हो रहे हैं. कानून के दायरे में आने के बाद इन स्कूलों में न्यूनतम सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा की गुणवत्ता के पैमाने तय हो सकेंगे.” सत्र को ज्यादा रोचक बनाने के लिए एक समूह चर्चा के जरिए इस नए विचार की खूबियों, कमियों, इससे उत्पन्न होने वाले नए अवसरों और इस विचार के समक्ष चुनौतियों की व्याख्या की गई.
ग्रे मैटर्स कैपिटल के प्रोग्राम ऑफिसर मॉली मँकमोहन ने अपने स्कूल रेटिंग प्रोजेक्ट के बारे में बताया. इस प्रयास के तहत स्कूल मैनेजरों, पालकों, नियामकों और निवेशकों को शिक्षा की गुणवत्ता के मूल्यांकन और सस्ते निजी स्कूलों की पेशकश के बारे में भी जानकारी दी जाती है.
तीसरा सत्र “स्वायत्तताः शिक्षा के आधिकार की धारा 21 और 22 के तहत सरकारी स्कूलों को सुदृढ़ बनाना” विषय पर केंद्रित रहा. सत्र के दौरान इस बात पर बातचीत केंद्रित रही कि किस तरह पालकों और शिक्षकों की मौजूदगी वाली स्कूल प्रबंधन कमेटियों को मजूबत बनाया जाए, स्थानीय शिक्षा व्यवस्था को नियंत्रित किया जाए और सरकारी स्कूलों को जवाबदेह बनाया जाए. सत्र के दौरान थर्मेक्स फाउंडेशन की पूर्व अध्यक्ष अनु आगा, भारती फाउंडेशन के सीईओ विजय चड्ढा, और सेवा मंदिर की सीईओ नीलिमा खेतान ने विचार व्यक्त किए. इन सभी वक्ताओं ने सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए स्थानीय सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर किए गए काम संबंधी अनुभवों को साझा किया. सत्र के विचार-विमर्श में यह बात साफ हुई कि सरकारी शिक्षा का विकेंद्रीकरण किया जाना चाहिए और शिक्षा में सामुदायिक समहों की सहभागिता बढ़ाई जानी चाहिए.
सम्मेलन की विषय वस्तु को आगे बढ़ाते हुए सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के चेयरमेन और लेखक गुरचरण दास ने गैर-अनुदान प्राप्त निजी स्कूलों के लिए मान्यता संबंधी अव्यावहारिक अपेक्षाओं का ब्यौरा दिया. न्यू कासल यूनिवर्सिटी में शिक्षा नीति विषय के प्रोफेसर जेम्स टूली ने प्राइवेट बजट स्कूलों को तत्काल बचाने की मांग की. उनका कहना था कि गरीबों की सेवा करने वाले ये स्कूल खतरे में हैं.
“2010 में भारतीय शिक्षा के समक्ष चुनौतियां” विषय पर आयोजित समापन सत्र में एनआईआईटी लि. के सीईओ विजय के. थडानी, एससीइआरटी की निदेशक रश्मि कृष्णन और सांसद तथा मानव संसाधन विकास पर गठित स्थायी समिति के सदस्य ऑस्कर फर्नांडिस ने अपने विचार व्यक्त किए.
इस सम्मेलन ने शिक्षाविदों, नीतिगत मसलों के विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकारी अधिकारियों मिल बैठ कर वार्ता के लिए माकूल मंच प्रदान किया. वे इस सम्मेलन के दौरान शिक्षा के क्षेत्र में गंभीर मुद्दों की पहचान, मौजूदा कार्यक्रमों की समीक्षा और भविष्य की चुनौतियों को लेकर रणनीतियों की छानबीन करने के साथ ही भारत में सभी बच्चों के लिए गुणवत्ता शिक्षा हेतु समाधान तलाश सके.
इस सम्मेलन के बाद अगले कदम के तहत शिक्षा का अधिकार विधेयक के क्रियान्वयन के लिए सरकार के समक्ष सिफारिशें पेश की जाएंगी. कॉन्फ्रेंस के चित्र तथा विस्तृत जानकारी के लिये यहाँ क्लिक करें. कॉन्फ्रेंस के बारे में अधिक जानकारी के लिए संपर्क करेः
बैशाली बॉमजान
मैनेजर – पीआर ऐंड कम्युनिकेशन
फोन नंबरः 98713 66407
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