फ्रैडरिक बास्तियात

 

उदारवादी चिंतन और विचारधारा

[जन्म 30 जून 1801 (बेयोन, फ्रांस) – निधन 24 दिसंबर 1850 (रोम)]

कौन हैं फ्रेडरिक बास्तियात?

फ्रेडरिक बास्तियात का जन्म 1801 में बेयोन में हुआ था और 1850 में रोम में उनका निधन हुआ था। उनका परिवार एक छोटे से कस्बे मुग्रोन से ताल्लुक रखता था, जहां उन्होंने अपनी जिंदगी का अधिकांश हिस्सा गुजारा और जहां पर उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित है। मुग्रोन, बेयोन के उत्तर-पूर्व में एक फ्रांसीसी हिस्से 'लेस लेंडेस' (Les Landes) में स्थित है। उन्होंने अपनी जिंदगी का बाद का हिस्सा पेरिस में 'लेस जर्नल डेस इकानॉमिस्तेस' (Le Journal des Economistes) के संपादक और 1848 में संसद सदस्य के तौर पर गुजारा।

एक अर्थशास्त्री के तौर पर उन्हें सुस्पष्ट दिमाग और विरोधियों को उखाड़ देने वाली व्यंग्यात्मक शैली हासिल थी। उन्होंने अपने वक्त में आर्थिक विज्ञान को उपभोक्ताओं, यानी लोगों की सोच के आधार पर विकसित करके एक नई दिशा दी थी। वह लेन-देन और निजी पसंद की आजादी के मुखर और कभी न थकने वाले जांबाज थे, जो कारोबार में किसी भी तरह की बाधा या अनुदान के सख्त खिलाफ थे। आज 150 साल बाद भी उनके द्वारा किए गए काम की ताजगी और औचित्य बरकरार है। संस्थाओं और समाजों के गठन को लेकर उनकी कई भविष्यवाणियां खरी साबित हुई हैं।

एक दार्शनिक के तौर पर, वे आधुनिक काल के कई उदारवादियों के पूर्वजों की तरह थे, उन्होंने व्यक्तिगत आजादी और जवाबदेही पर कई आधारभूत नीतियां तैयार कर दी थीं।

एक स्थानीय जज, के तौर पर वे कुशलता और समानता के अग्रदूत थे।

एक राजनीतिज्ञ के तौर पर, वे सरकार के छोटे आकार के पक्षधर थे और जनता की जेब से बढ़ते अनवरत खर्चों के खिलाफ लड़ते रहते थे। उन्होंने उपनिवेशवाद के विस्तार और गुलामी प्रथा की भी मुखर आलोचना की थी। वे सत्ता के विकेंद्रीकरण, सांसद रहते मंत्री बनने और संसद में सरकारी अधिकारियों की संख्या को सीमित करने के पक्षधर थे। वह राजनीति में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी के भी पक्षधर थे।

फ्रेडरिक बास्तियात का जीवन

जहां तक राजनीतिक अर्थशास्त्र की बात है तो फ्रेडरिक बास्तियात को काफी सम्मानजनक स्थान हासिल है। फ्रांस के अर्थशास्त्रियों की उदारवादी या लेसी-फेयर (laissez-faire एक ऐसा मत जिसके तहत सरकार को व्यावसायिक गतिविधियों में दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए), जिसमें महान जे.बी. से (J. B. Say) भी शामिल थे, से ताल्लुक रखने वाले बास्तियात समाज, समृद्धि और आजादी को समझने की कोशिश में अपने तर्कपूर्ण, सधे और व्यंग भरे लहजे के कारण जाने जाते थे। निबंधों और पैम्फ्लेट्स की छोटी सी सीरीज और राजनीतिक अर्थशास्त्र पर प्रबंधन में बास्तियात ने रोस्यू (Rousseau) की सोच के ठीक विपरीत हमें समझाया कि सामाजिक जगत की एक कुदरती सामंजस्य भरी व्यवस्था है, एक ऐसी व्यवस्था जो सीमित संसाधनों से असीमित मांगों को पूरा करने के इंसानी प्रयास की देन होती है। परिणाम सभी के लिए भौतिक सुख-शांति की दिशा में संतुलित प्रगति होती है। उन्होंने लिखा कि इस आजादी और उससे जुड़ी बातों जैसे जायदाद, प्रतिस्पर्धा की राह में हस्तक्षेप लोगों को न केवल गरीब बल्कि दमन का शिकार भी बनाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि हस्तक्षेप से लोगों का सृजन का वह काम प्रभावित होता है, जिसमें वे जुटने वाले थे। इस तरह सृजन के फल भुला दिए जाते हैं और हस्तक्षेप के दौरान वे ही 'न देखी जाने वाली' बात बन जाते हैं।

अध्ययन और लेखन

क्लॉड फ्रेडरिक बास्तियात का जन्म फ्रांस के दक्षिण पश्चिमी बंदरगाह बेयोन में हुआ था। नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ होने वाले बास्तियात को नेपोलियन की लड़ाईयों के दौरान आर्थिक मामलों में सरकार के हस्तक्षेप के कारण ही परिपक्व होने का मौका मिला। एक युवा के तौर पर उसने कारोबार या खेती की बजाय अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने का फैसला किया। कई भाषाओं के जानकार बास्तियात ने समूचे यूरोप के राजनीतिक अर्थशास्त्रियों का गहराई से अध्ययन किया और उन पर से, एडम स्मिथ, डेस्तुत डी ट्रेसी और चार्ल्स कोमते का सबसे गहरा प्रभाव रहा। 1844 में उन्होंने अपने संक्षिप्त लेखन कैरियर की शुरुआत की। रिचर्ड कोबडेन (जो बाद में उनका नजदीकी दोस्त बना) के मुक्त व्यापार के लिए किए गए काम और इंग्लैंड में मकई कानून के विरोधी संगठन (anti-corn law league) से उन्हें प्रेरणा मिली। जर्नल देस इकानॉमिस्तेस में प्रकाशित 'द इंफ्ल्यूएंस ऑफ फ्रेंच एंड इंग्लिश टेरिफ्स ऑन द फ्यूचर ऑफ द टू पीपुल' से बास्तियात ने पहली बार लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके साथ ही शुरु हुआ छोटे-छोटे निबंधों और पैम्फ्लेट्स की झड़ी से उस दौर के आर्थिक छलावों की धज्जियां उड़ाने का सिलसिला। उन निबंधों की दो सीरीज का प्रकाशन इकोनॉमिक सोफिज्म्स (1845) बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसके कई संस्करण प्रकाशित करने पड़े और जिसका कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ, के नाम से हुआ। 1850 में अपनी जिंदगी के अंतिम दिनों में बास्तियात की एक ओर पुस्तक द लॉ प्रकाशित हुई, इसमें राजनीतिक और कानूनी दर्शन पर उनके विचार देखने को मिलते हैं। उनकी तीसरी किताब इकोनॉमिक हार्मोनिज में उन्होंने राजनीतिक अर्थशास्त्र पर लिखा है। उनके अन्य कामों में कोबडेन एंड द लीग (1845) और केपिटल एंड रेंट (1849 में प्रकाशित) शामिल हैं, जिनका अनुवाद नहीं किया गया है।

सामाजिक-राजनैतिक कार्य

बास्तियात एक लेखक के साथ-साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह भी थे। 1864 में उन्होंने पेरिस में राष्ट्रीय स्तर पर मुक्त व्यापार के लिए प्रदर्शन से पहले बोर्डेक्स में फ्रेंच फ्री ट्रेड एसोसिएशन का गठन भी किया था। इसके अलावा उन्होंने साप्ताहिक अखबार ली लिबरे एचेंज (फ्री ट्रेड) में महासचिव और संपादक के तौर पर भी काम किया।

1848 के क्रांतिकारी वर्ष के दौरान, निजी स्वार्थों के लिए साम्राज्यवादी भ्रष्टाचार से नाराज फ्रांसीसी लोगों ने राजा को गद्दी से हटा दिया था। इसके बाद हुई उथल-पुथल के दौरान समाजवादी और अन्य सपने दिखाने वाली योजनाओं का समर्थन करने वालों की संख्या में इजाफा हुआ। इन्हीं विचारों से जूझने के लिए टीबी से पीड़ित होने के बाद भी बास्तियात ने लैंडेस से नेशनल असेंबली का चुनाव भी जीता। कवि लामार्टिन के साथ उनके पहले के दोस्ताना ताल्लुकात ने सेकंड रिपब्लिक के नेता लामार्टिन को मुक्त व्यापारी बना दिया था। लेकिन जब लामार्टिन ने भी हस्तक्षेप वाले ही कार्यक्रमों का समर्थन करना शुरु कर दिया तो बास्तियात ने उसका सार्वजिनक तौर पर विरोध किया।

असेंबली में बास्तियात ने एक ओर समाजवादियों और साम्यवादियों का विरोध किया तो दूसरी ओर उन्होंने साम्राज्यवादियों, संरक्षणवादियों और सैन्यशासन के समर्थकों का भी मुखर विरोध किया। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने आर्थिक और सामाजिक आजादी पर हो रहे हमलों का पुरजोर तरीके से पूरी ताकत से विरोध का प्रयास किया। 1848 की गर्मियों में जब फ्रांस एक और क्रांति (यह नाकाम रही थी) की ओर बढ़ रहा था, बास्तियात ने एक भाषण और निबंध में, आजादी के समर्थन और अर्थव्यवस्था के सरकारीकरण (statism) के विरोध में लड़ाई को जारी रखा। गणतंत्र की समाप्ति और नेपोलियन तृतीय के सत्तारोहण होने को देखने के लिए बास्तियात जिंदा नहीं रहे। 1850 को क्रिसमस की पूर्वसंध्या पर उनका रोम में निधन हो गया। लेकिन इससे पहले वे अपनी सुप्रसिद्ध रचना इकोनॉमिक हार्मोनिज का पहला खंड और दूसरे खंड का पहला अध्याय लिख चुके थे। अपने अंतिम दिनों में उन्होंने एक और निबंध लिखा जो शायद उनका सबसे प्रसिद्ध निबंध है, 'क्या देखा जाता है और क्या नहीं देखा जाता है (what is seen and what is not seen)' (सिलेक्टेड एसेज ऑन पॉलिटिकल इकानॉमी)। यह कभी प्रकाशित ही नहीं हो सकी। बास्तियात से मूल पांडुलिपी गुम हो गई थी और उसने इसे दोबारा लिखा तो था, लेकिन असंतुष्ट होकर उन्होंने दूसरी पांडुलिपी को भी जला डाला। सौभाग्य से उन्होंने इस दिशा में एक और प्रयास किया।

बास्तियात के लेखन का महत्व

बास्तियात की पहली किताब, इकोनॉमिक सोफिज्म, सरकारी हस्तक्षेप से उपजने वाले ढेर सारे छलावों का कच्चा-चिट्ठा है। इसकी मूल भावना यह है कि जब सरकार शांतिपूर्ण और उत्पादक गतिविधियों में हस्तक्षेप करती है तो यह उस प्रक्रिया की राह में बाधा खड़ी कर देती है जो सभी की भलाई के लिए काम करती है। इसमें उनका सबसे प्रसिद्ध निबंध 'ए पेटीशन' है, जिसमें फ्रांस के मोमबत्तियों के निर्माता सरकार से, "एक विदेशी प्रतिद्वंद्वी के साथ तबाह कर देने वाली प्रतिस्पर्धा में राहत देने की गुहार लगाते हैं। उनका कहना होता है कि यह विदेशी प्रतिस्पर्धी, कम दाम में रोशनी उपलब्ध कराकर उनके घरेलू बाजार में वर्चस्व को खत्म कर रहा है।" और यहां प्रतिस्पर्धी कौन है? सूरज। और क्या उपाय सुझाया गया है? सभी जगहों पर खिड़कियां बंद रखना अनिवार्य किया जाए। क्या संभावित परिणाम होगा? इससे न केवल मोमबत्ती उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि इसकी आपूर्ति में सहायक सभी उद्योगों को फलने-फूलने का मौका मिलेगा। केन्स के पैदा होने से काफी पहले ही बास्तियात ने यहां पर गुणक प्रभाव (multiplier effect) की झलक दिखा दी थी।

'निगेटिव रेलरोड' में उन्होंने इस सुझाव की खिल्ली उड़ाई है कि बोर्डेक्स में कारोबार को बढ़ावा देने के लिए पेरिस से स्पेन के बीच रेलसेवा को वहां विराम दिया जाए। लेकिन जो बात बोर्डेक्स के लिए सही मानी जा रही है वह तो इस रेलमार्ग पर पड़ने वाले हर गांव, कस्बे और शहर के लिए कही जा सकती है तो फिर क्यों न रेलमार्ग को जगह-जगह पर रोककर छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया जाए, यानी कि 'द निगेटिव रेलरोड' एक नकारात्मक रेलमार्ग। बास्तियात की राय में ऐसी बेवकूफाना सोच तब सामने आती है जब हम आर्थिक विश्लेषण के दौरान उपभोक्ता की बजाय उत्पादक को प्राथमिकता देने लगते हैं।

हैरत नहीं होना चाहिए कि हैनरी हेजलिट ने बास्तियात को 'किसी नकारात्मक बात से शुरू करके ठीक विपरीत परिणाम हासिल करने का उस्ताद (Master of the reductio ad absudum)' और एफ. ए. हायेक ने 'प्रतिभा का प्रचारक (publicist of genius)' करार दिया था।

बास्तियात की अगली किताब द लॉ, उनका स्पष्ट राजनीतिक दर्शन में तांका-झांकी का साहसिक प्रयास है। जहां तक साफगोई और हौसले की बात है तो यह किसी उपलब्धि से कम नहीं है। दार्शनिकों की राय में कानून दरअसल पैतृक सत्ता (paternalistic sovereign) के साथ सामाजिक अनुबंध (थॉमस हॉब्स) की देन है, कुछ इस तरह से बनाया गया कानून जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को खुशियां (जेरेमी बेनथेम और उपयोगवादी) मिल सकें या एक पंचाट की तरह जो सही और गलत का फैसला कर सके (कानूनी प्रत्यक्षवादी)। इसके ठीक विपरीत बास्तियात प्राकृतिक न्याय (जॉन लोके की तरह) के खेमे में हैं-"जीवन, आजादी और जायदाद का अस्तित्व इसलिए नहीं है क्योंकि इंसान ने कानून बनाया है। इसके विपरीत यही सच्चाई है कि जीवन, आजादी और जायदाद तो इंसान को कानून की जरुरत महसूस होने के पहले से ही मौजूद थे।" वह इंसान के स्वभाव में कानून का मूल मानते हैं-जीने के लिए इंसान को आजादी और जायदाद चाहिए ताकि वह कुदरत का उपयोगी वस्तुओं में इस्तेमाल कर सके। इसलिए जो कानून आजादी और जायदाद के खिलाफ है वह सही कानून ही नहीं है, बल्कि यह तो विधिसम्मत लूट है, एक स्थायी लालच क्योंकि इंसान कम से कम प्रयासों से अपने स्वार्थ की सिद्धि करना चाहता है। परिणाम नैतिक अराजकता, दमन और वस्तुओं का अकाल। बास्तियात आजादी और लोगों पर अप्राकृतिक सामाजिक बंधन लादने वाले सभी प्रस्तावों के बहिष्कार और विरोध के आह्वान के साथ अपनी बात खत्म करते हैं।

बास्तियात ने बाजार की प्रणाली के संपूर्ण अध्ययन का काम अपनी तीसरी किताब, इकोनॉमिक हार्मोनिज, में किया है। इसमें बास्तियात ने अपने सैद्धांतिक ढांचे का व्यवस्थित तरीके से विकास किया है। उन्होंने शुरुआत उन आर्थिक गतिविधियों से की है जिनसे हर रोज पूरे पेरिस का पेट भरता है। खास बात यह है कि यह व्यवहार किसी भी बड़े आदमी द्वारा विकसित या संचालित नहीं है। यह तो अनगिनत लोगों का अपने हितों के लिए किए गए कामों का परिणाम है। बास्तियात की राय में अर्थशास्त्र का काम उस 'अद्भुत तौर पर कुशल तंत्र (prodigiously ingenious mechanism)' से उपजी व्यवस्था का खुलासा करना है -मुक्त बाजार की व्यवस्था- जिसने अनगिनत लोगों के हितों में सामंजस्य बैठाया और जिसके चलते हर एक व्यक्ति उन अनगिनत उत्पादों का आनंद ले रहा है जिनका अन्य स्थिति में शायद दस सदी तक उत्पादन नहीं हो पाता। बास्तियात पाठक के पास बाजार की जटिलता और सुधार की अपार संभावनाओं को स्वीकारने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं छोड़ते। उनके लिए तो समाज सेवाओं के लेन-देन की एक प्रणाली है, जिसका आधार निजी हित, निजी जायदा और मुक्त प्रतिस्पर्धा है और मुख्य उद्देश्य उपभोक्ता का फायदा है।

यह ब्रिटेन के अर्थशास्त्रियों-खासतौर पर एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो-के विचारों के ठीक विपरीत है, जिन्होंने भौतिक संपत्ति के उत्पादन पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखा। बास्तियात का कहना है कि उन्होंने जो प्रणाली बताई उसमें किसी दिशा विशेष की दरकार नहीं होती, बल्कि इसे दिशा देने के प्रयास ही गरीबी और असंतोष का कारण बनते हैं। बास्तियात ने इस तरह से समाजवाद और सरकार के तमाम किस्म के हस्तक्षेपों, खासतौर पर संरक्षणवाद के खिलाफ एक अविस्मरणीय वाकपटुता भरी टिप्पणी छोड़ दी है। उनकी इस विलक्षण रचना में विनिमय, मूल्य, संपत्ति, पूंजी, जमीन, प्रतिस्पर्धा, किराया, पारिश्रमिक, बचत, आबादी और यहां तक कि विकास विरोधी युद्ध तक का जिक्र किया गया है। इसमें विषयवादी ऑस्ट्रियाई अर्थशास्त्रियों द्वारा हासिल कुछ गहरी बातों का अभाव है, बास्तियात की बाजार की प्रक्रिया की सोच, विवेकपूर्ण और मूल्यवान है। निबंधों और पैम्फ्लेट्स का मरणोपरांत जारी कलेक्शन सिलेक्टेड एसेज ऑन पॉलिटिकल इकानॉमी में बास्तियात के कुछ सर्वश्रेष्ठ लेख शामिल हैं। इसमें उसने व्यापार संतुलन जैसी कई बातों की कलई खोलकर रख दी है। उन्होंने कहा कि अगर निर्यात आयात से बेहतर है तो सबसे अच्छा तो यही होगा कि निर्यात के लिए जा रहे जहाजों को ही डुबो दिया जाए ताकि वह वापसी में आयात की वस्तु न ला सकें। इसी खंड के निबंध, 'द स्टेट' में सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली सच्चाई है, 'सरकार सबसे फर्जी संस्था है, जिसकी मदद से हर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की कीमत पर जीना चाहता है।'

'क्या देखा जाता है और क्या नहीं देखा जाता (what is seen and what is not seen)' में बास्तियात की सूक्ष्मदर्शिता (perspicacity) और साफगोई (perspicuity) देखने को मिलती है। वह शुरुआत एक बच्चे द्वारा एक खिड़की तोड़े जाने के साथ करते हैं। एक दर्शक बच्चे की इस करतूत को कांच के धंधे से जुड़े व्यक्ति और उसके उद्योग को मिलने वाले छह फ्रैंक के कारण अच्छी बात करार देता है। बास्तियात इसका विरोध करते हुए कहते हैं, 'ऐसा कभी नहीं होगा! आपका सिद्धांत क्या देखा जाता है पर आकर रुक गया, यह क्या नहीं देखा जाता पर कोई विचार ही नहीं करता।' जो नहीं देखा गया वो यह था कि अगर खिड़की का कांच नहीं टूटता तो खिड़की का मालिक छह फ्रैंक से वह काम कर सकता था, जिसके लिए अब उसके पास कोई धन नहीं है। इसलिए वह गरीब हुआ है! यह कोई अच्छी बात नहीं है। अनदेखी बातों का घटनाक्रम का मूल बास्तियात के दो विचारों में देखा जा सकता है-इंसान की मांगें असीमित हैं और संसाधन दुर्लभ हैं। जब तक कुदरत इन परिस्थितियों का साथ देती है, आमतौर पर अधिक उत्पादन का कोई खतरा नहीं है। किए जाने वाले काम की कोई सीमा नहीं है। नौकरियां बचाने या बढ़ाने के लिए लादे जाने वाले कर (tariffs) दरअसल में प्रगति की राह की बाधा ही हैं क्योंकि यह कृत्रिम तौर पर ज्यादा कीमतों के कारण उपभोक्ता की जेबों को खाली कर देते हैं और वह अपनी जरुरतों को पूरा ही नहीं कर पाता। अगर सस्ते आयातित वस्त्रों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है तो लोग प्रतिबंध नहीं होने पर इस सामान की खरीद से होने वाली बचत को अब दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे। परिणाम यह होगा कि समाज संभावित से कम बेहतर स्थिति में होगा।

आज के संदर्भ में बास्तियात

अपने समूचे लेखन के दौरान बास्तियात ने केवल एक ही सवाल का हल खोजने की कोशिश की- आखिर किस तरह की अर्थव्यवस्था इंसान के विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ है? जैसा कि उपर उल्लेख किया जा चुका है, उनका जवाब हमारे आस-पास की दुनिय में मौजूद दो तथ्यों पर आधारित है-असीमित मांग और दुर्लभ संसाधन । दोनों को साथ रखकर देखने पर जो परिस्थितियां लाजमी हो जाती हैं वो हैं एक मुक्त समाज, ऐसा समाज जिसमें लोगों को अपनी संपत्ति-जायदाद का अपनी इच्छा के मुताबिक इस्तेमाल का अधिकार हो, ही सर्वश्रेष्ठ समाज है। केवल ऐसा समाज ही लोगों को अपने विविधता भरे लक्ष्यों और हितों को व्यापार के जरिये हासिल करने का मौका दे सकता है। बदले में यह व्यापार श्रम के विभाजन का समर्थन करता है, जो हर एक को निजी तौर पर हासिल की जा सकने वाली समृद्धि से भी ज्यादा मिल-जुलकर हासिल करने का मौका दे देता है। इस समृद्धि को बरकरार रखने के लिए बास्तियात की राय में सरकार का हस्तक्षेप, फिर भले ही वह कितने ही अच्छे इरादे से किया गया हो, नकारात्मक ही साबित होता है। इसे पूरी तरह से समझने के लिए हमें देखे जा सकने वाले प्राथमिक प्रभावों की बजाय 'न दिखाई देने वाले' परिणामों को देखना चाहिए। ऐसा करने पर ही हमारी समझ में आएगा कि सरकार की नीति 'विधिसम्मत लूट' से ज्यादा कुछ नहीं है, जो अन्य अधिसंख्य लोगों की कीमत पर चुनिंदा लोगों का भला करती है।

मुक्त समाज की सिफारिश करने वाले बास्तियात पहले राजनीतिक अर्थशास्त्री नहीं थे। उनसे पहले एडम स्मिथ से लेकर एफ.ए.हायक भी ऐसा ही कर चुके थे। न ही बास्तियात सबसे प्रभावशाली थे- उन्होंने जहां एमसा वाकर और विलियम स्टेनली जोंस सहित 19वीं सदी के अमेरिकी और ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों को प्रभावित किया, वहीं उसके बाद से अधिकांशतया उनको उपेक्षा का ही सामना करना पड़ा है। लेकिन जहां तक आजादी का पक्ष साफगोई और वाकपटुता के साथ पेश करने की बात है तो बास्तियात का कोई सानी नहीं है। कौन होगा जो 'निगेटिव रेलरोड' और 'मोमबत्ती निर्माताओं की याचिका' में छिपी कड़वी सच्चाई की भला कौन अनदेखी कर सकता है? और भला कौन 'देखे और अनदेखे' के फार्मूले को भुला सकता है? ये और कुछ अन्य साहित्यिक लेखन बास्तियात की प्रतिभा के जीवंत उदाहरण थे। यह एक ऐसा खजाना है जिसे आज भी जब कोई पढ़ता है तो उसे मार्गदर्शन के साथ-साथ खुशी भी मिल सकती है।

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फ्रैडरिक बास्तियात द्वारा लिखित साहित्य

  • 'फ्रेडरिक बास्तियात: ओवरेस इकानॉमिकेस, एड. फ्लोरिन एफ्तेलियन, पेरिस 2000
  • बास्तियात के सबसे महत्वपूर्ण लेखों का अंग्रेजी अनुवाद फाउंडेशन फॉर इकानॉमिक एजुकेशन www.fee.org ने प्रकाशित किया है।
  • जॉर्ज चार्ल्स रोशेः फ्री मार्केट, फ्री मेनः फ्रेडरिक बास्तियात, हिल्सडेल 1993
  • देतमार डोरिंगः डेंकर डर फ्रेहेतः फ्रेडरिक बास्तियात, सेंट ऑगस्टिन 1997