स्वामीनॉमिक्स का जन्म
स्वामीनॉमिक्स के 10 साल पूरे हो गए हैं. जब मैंने एक दशक पहले इस कॉलम की शुरुआत की थी तब मेरे बारे में ज्यादातर यह कहा जाता था कि मैं विद्रोही हूं और बगैर सावधानी बरते परंपरागत समाजवादी विचारों पर निशाना साधते हुए उसकी आलोचना करता हूं. आज मैं यह देखकर चकित हूं कि अब मुझे मुख्यधारा का लेखक समझा जाने लगा है. 10 वर्ष पहले आर्थिक सुधारों को कितना ज्यादा असंभव माना जाता था. लंदन की पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने 1991 में अपनी आवरण कथा में भारत को “पिंजरे में बंद शेर” बताते हुए लिखा था कि इसके बाहर आने की कोई संभावना नहीं है.
अपनी विचारधारा को बदल कर आर्थिक सुधारों के हाल ही में बने कई समर्थकों को अवसरवादी कहा जा रहा है. साथ ही मुझे आर्थिक सुधारों का सतत पक्षधर होने की वजह से बधाई दी जाती है. दरअसल, अपनी युवावस्था में मैं भी समाजवादी था. कौन नहीं था? मैंने इंदिरा गांधी की गरीबी हटाओ नीतियों का समर्थन किया और साथ ही राष्ट्रीयकरण के सभी कदमों की भी सराहना की. मैं भी वास्तव में यही मानता था कि यदि देश का निर्यात राष्ट्रीय व्यापार निगम (एसटीसी) के माध्यम से हुआ तो यह जरूर बढ़ेगा. मेरे वक्त की पीढ़ी उस राजनीतिक वर्ग की तारीफ करते हुए बड़ी हुई जिसने हमें आज़ादी दिलवाई थी. हमारी आस्था एडम स्मिथ द्वारा माने जाने वाले बाजार के अप्रत्यक्ष हाथ के बजाए सरकार के प्रत्यक्ष हाथ में ज्यादा थी. हम गंभीरतापूर्वक इस बात को मानते थे कि यदि सरकार को अधिक शक्तियां और पैसा मिले तो वह हमारी धरती को स्वर्ग में तब्दील कर देगी. हमारा यह मानना था कि सरकार को अपने नगरिकों पर ज्यादा से ज्यादा कर लगाते रहना चाहिए ताकि वह ज्यादा से ज्यादा निवेश कर सके और ज्यादा समृद्धि ला सके. मैं भी नेता बाबू राज के समर्थन का उतना ही दोषी था जितने और लोग थे. मेरे बचाव में एकमात्र बात यह है कि मैंने बौद्धिक ईमानदारी के साथ यह स्वीकार किया कि मैं दूसरों की तुलना में काफी शुरुआती समय में (1970 के दशक के अंत में) गलत था.
इस स्वीकारोक्ति के लिए कुछ साहस की जरूरत थी. तब मुझे लोगों ने बड़ी तत्परता से पूंजीवाद का पिछलग्गू, साम्राज्यवाद की कठपुतली और इसके अलावा भी बहुत कुछ कहा. मेरे आलोचकों में से किसी को भी मेरे उस नए रुख पर यकीन नहीं था कि आर्थिक उदारीकरण व्यवसाइयों के बजाए उपभोक्ताओं के लिए मददगार होगा. इनमें किसी ने सपने में भी यह नहीं सोचा था कि मैं, जिसे पूंजीवाद का पिछलग्गू कहा जाता था, एक दिन उद्योगपतियों के बॉम्बे क्लब की निंदा का सामना करूंगा. यह निंदा इसलिए थी क्योंकि मैं उन नीतियों के खिलाफ अभियान चला रहा था जिन्होंने उन उद्योगपतियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बचा कर रखा था. स्वामीनॉमिक्स की दसवीं सालगिरह पर इस बात का जिक्र करना मुनासिब होगा कि मैंने खुद को क्यों बदल दिया. ऐसा सिर्फ एक घटना की वजह से नहीं हुआ बल्कि कई मोर्चों पर मेरा मोहभंग हुआ. धीरे-धीरे मैं यह समझ गया कि गरीबी हटाओ और राष्ट्रीयकरण ने गरीबी को कम नहीं किया था. पहले हमें ऐसा लगता था कि देश में ईमानदार और प्रभावशाली अर्थव्यवस्था को मोटे-तगड़े कारोबारियों ने राजनीतिज्ञों के साथ पनपने नहीं दिया. लेकिन फिर यह धारणा बदली और समझ में आया कि इसके जिम्मेदार चर्बीदार राजनीतिज्ञ थे. सर्वाधिक टैक्स लगाने और निवेश के बावजूद भारत की सालाना आर्थिक विकास दर मात्र 3.5 फीसदी रही जिसे (अपमानजनक रूप से) हिन्दू विकास दर कहा जाता है.
जहां पूर्व एशियाई देश एक पूरी तरह भिन्न और प्रभावशाली अर्थव्यवस्था अपना कर तेजी से कई यूरोपीय देशों की तुलना में अमीर हो रहे थे, वहीं भारत गरीब ही रहा. पहले हमें लगता था कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सहायता और निवेश के दम पर खड़े ये देश साम्राज्यवादी कठपुतलियां हैं, जिनका अंत बुरा होगा, पर यहीं कठपुतलियां अनपेक्षित रूप से अमीर हो गईं और हम समाजवादी आत्मनिर्भरता की राह पर चलते हुए गरीब ही रह गए.
एक अपेक्षाकृत साधारण सी घटना ने मेरा भ्रम दूर कर दिया और मैं समाजवाद से सक्रिय सुधारवाद की ओर मुड़ गया. हालांकि मैं विशेष संवाददाता के रूप में साधारण तनख्वाह ही पा रहा था लेकिन फिर भी गरीबों की सहायता के लिए मैं एक ट्रस्ट बनाना चाहता था. हममें से कुछ लोग अगर यह काम करते तो मुझे लगता था कि हम काफी बदलाव ला सकते थे. सहायता के नाम पर मुझे सिर्फ पैसा देना सही नहीं लगता था. वह केवल दान होता, किसी तरह का विकास नहीं. महज पैसा देना निर्भरता बढ़ाता, समृद्धि नहीं. तभी मेरे मन में विचार आया कि मदद के नाम पर पैसा उपलब्ध कराया जाए, उन चीजों के लिए जिनसे पैसा कमाया जा सके जैसे कोई छोटी सी मशीन या रिपेयरिंग के लिए वर्कशॉप.
यह बात सही है कि पैसा ही सबकुछ नहीं है, मशीन के साथ उसे चलाने की जानकारी और और उससे जुड़े कामों की स्किल्स (निपुणता) भी जरूरी थी, वरना वे लोग प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते. अतः मुझे उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी थी. लेकिन कैसे? उन लोगों को सिर्फ भाषण और परचे देने से तो काम चलने वाला नहीं था. उसी कार्य के प्रशिक्षण के दौरान ही कौशल भी सिखाना था यानी काम करो और सीखो. अब मेरे लिए एक बड़ा काम था एक विशाल कार्यक्षेत्र स्थापित करना जहां गरीब प्रशिक्षु आकर प्रशिक्षण और दक्षता दोनों हासिल कर सकें.
इससे अचानक दिमाग में बिजली सी कौंधी कि इसका अर्थ तो यह है कि मैं खुद ही बिजनेसमैन बन रहा हूं. मैं एक उद्योग शुरू करता या ट्रांसपोर्ट बिजनेस या कुछ और. अब मुझे ऐसे कौशल का प्रदर्शन करना होगा जिसे मैं दूसरों को हस्तांतरित कर सकूं. इसका मतलब था एक प्रतिस्पर्धी वातावरण में मुनाफा कमाना. इस सफलता के बाद ही मैं पूरे भरोसे के साथ अपनी दक्षता का दावा कर सकता था जिसे मैं ज्यादा से ज्यादा नए-नए लोगों को हस्तांतरित कर सकता था. जितना ज्यादा मेरा कारोबार बढ़ता, उतने ही ज्यादा लोगों को मैं ऊपर उठा पाता.
मेरे लिए यह एक दिमागी झटका देने वाली खोज की तरह था कि मैं जिंदगी भर एक समाजवादी रहा, और मैंने व्यवसायी तबके को नीची नजर से देखा. कॉलेज में एडम स्मिथ को पढ़ा पर कभी भी उनकी थ्योरी पर राजी नहीं हुआ जिसमें एक अदृश्य हाथ की चर्चा की गई है जो एक व्यवसायी के निजी हित को कुल मिला कर समाज के हित को आगे बढ़ाएगा. नहीं, मैंने सोचा हमें ऐसे प्रबुद्ध लोगों की जरूरत है जो गरीबों की मदद के लिए निस्वार्थ तरीकों की खोज करेंगे. लेकिन अब गरीबों की मदद के लिए मुझे लंबे समय तक चलने वाला तरीका मिल गया था जो मुझे वापस व्यवसायी तबके में ले गया जिसे मैं कमतर ही समझता था. एडम स्मिथ के अदृश्य हाथ के सिद्धांत से अलग मेरी शुरुआत एक ऐसे हाथ के जरिए हुई जो साफ नजर आ रहा हो और जो गरीबों की मदद के लिए उठा हो. हालांकि इस सफर में मैं अंत में उस जगह पहुंचा जिसके बारे में एडम स्मिथ चर्चा करते थे. मुझे एहसास हुआ कि जिन चीजों से लोग नफरत करते थे, जैसे जीडी बिडला के विशाल औद्योगिक प्रतिष्ठान, किसी भी पारमार्थिक ट्रस्ट की तुलना में गरीबों के लिए वास्तविक रूप से अधिक मददगार साबित हुए.
हां, इसमें कई किस्म की निषेधात्मक स्थितियां भी सिलसिलेवार मौजूद थीं. हमें असल में मोटे-बड़े व्यवसायी नहीं चाहिए थे बल्कि ऐसा माहौल चाहिए था जो व्यवसायी को खुद को बचाए रखने के लिए प्रोडक्टिव (लाभकर) होने के लिए बाध्य करे. हमें ऐसी सरकार भी नहीं चाहिए थी जो कुछ न करे बल्कि हमें एक ऐसी कर्मण्यतावादी सरकार चाहिए थी जिसका एजेंडा एकदम अलग हो, जो ग्रामीण विकास पर ध्यान दे, व्यापक साक्षरता के लिए लड़े. हमें ऐसी सरकार चाहिए थी जो लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को प्रोत्साहित करे.
हमें प्रतियोगी भावना और बाजार में विकल्पों की मौजूदगी के लिए लोकतंत्र चाहिए था और आर्थिक गतिविधियों वाले बाजार क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और विकल्पों के लिए उदारीकरण की दरकार थी. बाजार की मौजूदगी के लिए भी ठीक वही तर्काधार (औचित्य) था जो लोकतंत्र के लिए था. उनकी कमियां और फायदे एक जैसे थे. वे साथ-साथ ही चले.
इस तरह से स्वामीनॉमिक्स के मूलभूत दर्शन का जन्म हुआ. इसका उद्देश्य है नागरिकों को उनके अधिकार दिलाना और सभी किस्म के बाजारों में चयन की शक्ति प्रदान करवाना. चाहे मामला राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक या जो भी हो. ...और यह हो कर रहेगा.
- टाइम्स ऑफ इंडिया में 3 सितंबर 2000 को प्रकाशित
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