आर. ऐंड डी. में बढ़ते कदम - विवेक वाधवा

भारत शोध और विकास के मुख्य केंद्र के रूप में उभर रहा है, लेकिन क्या यह सिलीकॉन वैली से आगे निकल पाएगा?

जब अमेरिकी भारत के टैक्नोलॉजी सेक्टर के बारे में सोचते हैं, उनके दिमाग में आज भी भारत की छवि एक ऐसे देश के रूप में उभरती है जहां कॉल सेंटर कर्मचारी और निचले दरजे के कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं जो डाटाबेसेस की देखभाल और वेबसाइट्स अपडेट करने जैसे काम करते हैं. लेकिन जब पश्चिम गहरी नींद सो रहा था, भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) क्षेत्र ने एक विशाल अनुसंधान और विकास (आर. ऐंड डी.) मशीन के रूप में आकार ले लिया. जिन भारतीय कंपनियों ने कॉल सेंटर शुरू किए थे या निचले स्तर के आइटी प्रोजेक्ट शुरू किए थे उन्होंने उच्चस्तरीय गुणवत्ता पैमाने को छूते हुए बाहरी स्रोत के रूप में क्रांतिक शोध और विकास (क्रिटिकल आर. ऐंड डी.) संबंधी अपनी विशेष सेवाएं कई जटिल और परिष्कृत क्षेत्रों में दीं. इनमें सेमीकंडक्टर डिजाइन, विमानन, वाहन उद्योग, नेटवर्क उपकरण और चिकित्सा उपकरण शामिल हैं.

भारत में यह सब इस रूप में हो रहा है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने स्थानीय कारोबारियों को साथ लेकर यहां अपने खुद के अनुसंधान और विकास केंद्रों की स्थापना कर दी है. बाजार में मिलने वाले कंज्युमर इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों में से दो बेहद चर्चित ब्रांड्स ‘पाम प्री स्मार्टफोन‘ और ‘अमेजॉन किंडल’ के भीतर भारत में डिजाइन किए गए कलपुर्जे हैं. इन्टेल ने अपना झ़िऑन प्रोसेसर भारत में डिजाइन किया है. आइबीएम ने भारत में एक लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है. इनमें से ज्यादातर ‘बिग ब्लू’ (आइबीएम का उपनाम) के लिए सर्वाधिक परिष्कृत सॉफ्टवेयर तैयार करते हैं.

आने वाले दौर की 'इंटेलिजेंट सिटीज़' के लिए सिस्को एकदम आधुनिक तथा पूरी तरह कारगर नेटवर्किंग प्रौद्योगिकी बंगलूरू में विकसित कर रही है. अडोबी, कैडेंस, ऑरेकल, माइक्रोसॉफ्ट और अधिकांश बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियां भारत में मुख्यधारा के उत्पादों का निर्माण कर रही है. इतना ही नहीं, बहुराष्ट्रीय भारतीय कंपनियों का वैश्विक बाजारों की ओर बढ़ना भी समान रूप से खासा मायने रखता है. जैसे टाटा की बेहद सस्ती नैनो कार यूरोप में प्रवेश के लिए तैयार है जबकि रेवा ने हाल ही में न्यूयॉर्क में एक कारखाना खोलने की घोषणा की है ताकि अमेरिकी बाजार को बिजली से चलने वाली कारों की आपूर्ति हो सके.

आज की तारीख में भारत में सिर्फ एक ही बात की कमी है और वह है उद्यम शुरू करने को लेकर पहल. किसी कंपनी को शुरू करने के लिए जरूरी शुरुआती उद्यमशीलता ही अमेरिका की सिलीकॉन वैली की सबसे बड़ी खूबी है. इस मामले में चीन भी भारत से काफी आगे है, जहां कई स्टार्ट-अप (नए सिरे से शुरू होने वाला कोई उद्यम) कंपनियां सरकार से मिलने वाली ढेर सारी रियायतों का भरपूर लाभ उठा रही हैं. इन स्टार्ट-अप्स में विदेशी कंपनियों के शीर्ष पदों पर रह चुके चीनी मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (सीटीओ) बन रहे हैं. गौरतलब है कि चीन में गूगल के शीर्ष पद पर रह चुके काएफु ली  10 करोड़ डॉलर की एक नई कंपनी शुरू करने में कामयाब हुए है. उनकी इस कंपनी का फोकस पूरी तरह मोबाइल सेक्टर पर केंद्रित है. जैसे ही ली ने अपना कामकाज शुरू किया उनके पास अपनी कंपनी में लागू करने के लिए ढेर सारी योजनाएं थीं.

हाल ही में अपनी भारत यात्रा के दौरान मैंने प्रौद्योगिकी आधारित उद्यमशीलता में नए संकेत देखे हैं. मैंने कई स्टार्ट अप यूनिट्स का दौरा किया जहां मैंने पाया कि वे वास्तव में स्मार्ट हैं और उनमें बहुत कुछ हासिल करने की भूख है. ऐसी कई नई कंपनियां सिलीकॉन वैली स्थित अपने कारोबारी सहयोगियों से भी ज्यादा अच्छा कामकाज कर रही हैं. इन स्टार्ट-अप्स में सभी इकाइयां कोई बहुत बड़ी उपलब्धियां हासिल नहीं कर रही हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर उन समस्याओं को सुलझाने में कामयाब रही हैं जिन्हें अब तक अमेरिकी कंपनियां सुलझाने में असफल रहीं.

मैं जिन कंपनियों के लोगों से मिला उनमें सबसे ज्यादा रोचक मामला है छपाई मशीनों के लिए स्याही (ऑफसेट प्रिंटर इंक) बनाने वाली एक कंपनी ‘एकनेचुरा’ का. यह कंपनी वनस्पति तेल (वेजीटेबल ऑयल) से स्याही बनाती है जो कि पूरी तरह वारावरण में घुलनशील (बायो डिग्रेडेबल) है. ऑफसेट प्रिंटिंग उद्योग हर साल 10 लाख टन पेट्रोलियम उत्पादों का दोहन करते हुए पांच लाख टन कार्बनिक यौगिकों (वॉलटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स) का धुआं छोड़ता है. आइआइटी दिल्ली द्वारा पोषित इस कंपनी ने छपाई के लिए ऐसी स्याही विकसित की है जो किसी भी प्रकार के वाष्पशील कार्बनिक यौगिक उत्सर्जित नही करती. इस स्याही को आसानी से धोया जा सकता है. बड़े पैमाने पर उत्पादन से इस स्याही की उत्पादन लागत बहुत कम हो जाएगी. मैं यह भविष्यवाणी कर सकता हूं कि यह कंपनी भविष्य में अरब डॉलर का वैश्विक कारोबार करने में सफल होगी.

एक अन्य दिलचस्प कंपनी है ‘लाइवमीडिया’. यह एक आऊट-ऑफ-होम विज्ञापन कंपनी है जिसने करीब 5 करोड़ लोगों को देखने के लिए 2200 जगहों पर 4500 विज्ञापन स्क्रीन्स लगाए हैं. अमेरिका में आप ऐसी हजारों टीवी स्क्रीन्स हजारों जगहों पर देख सकते हैं. दरअसल, ऐसे किसी नेटवर्क के जरिए पैसा कमाना टेढ़ी खीर है. लेकिन लाइवमीडिया ने यह गुत्थी सुलझा ली है. अपनी स्क्रीन्स के जरिए दर्शकों को आकर्षित करने के लिए लाइवमीडिया ने असल में बहुत रोचक कार्यक्रम (वीडियो कॉन्टेंट) तैयार किए हैं जो किसी भी रूप में सीएऩएन की खबरों या डिज़्नी चैनल के कार्यक्रमों से बेहतर हैं.

लाइवमीडिया इन टीवी स्क्रीन्स पर लोगों को छोटे-बड़े गेम्स, क्विज़, राशिफल, वर्ग पहेली और छोटी-छोटी एनिमेशन फिल्में दिखाती है. लाइवमीडिया स्क्रीन्स की लोकेशन्स को खास तौर पर ध्यान में रखते हुए प्रासंगिक विषयवस्तु पर आधारित सामग्री तैयार की जाती है. लाइवमीडिया ने इस काम में महारथ हासिल कर ली है – जैसे मँकडॉनल्ड के रेस्त्रां में लगने वाली स्क्रीन्स पर युवाओं और बच्चों के लिए उपयोगी और उन्हें आकर्षित करने वाली चीजें दिखाई जाती हैं.

लाइवमीडिया अब एल्कटेल ल्युसेंट बेल लैब्स इंडिया के साथ भागीदारी की तैयारी कर रही है ताकि यह मोबाइल नेटवर्क कंपनी अपने कॉन्टेंट के जरिए ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को आकर्षित कर सके. बेल लैब्स ने एक कॉन्टेंट मैनेजमेंट ऐंड राइटिंग सिस्टम तैयार किया है जिसके जरिए वह मोबाइल फोन ग्राहकों को अच्छी गुणवत्ता के वीडियो और इंटरेक्टिव कॉन्टेंट को मौजूदा नेटवर्क पर उपलब्ध करा सकेगी. विकासशील देशों में हर कोई कंपनी अमेरिकी मनोरंजन कंपनी ‘टीवो’ जैसी क्षमता के साथ वीडियो कॉन्टेंट को शेयर, स्टोर और मैनेज करना चाहती है. लेकिन मौजूदा जीपीआरएस और ईडीजीई (एज) आधारित सेलफोन नेटवर्क्स इस क्षमता के लिए नाकाफी हैं. साथ ही यहां की ब्रॉडबैंड नेटवर्क का बुनियादी ढांचा विकसित देशों जैसे जापान, कोरिया या स्कैन्डनिवियाई देशों की तुलना में पिछड़ा हुआ है. ‘मैंगों’ जैसा कोई उत्पाद वीसी इन्वेस्टमेंट के लिए तैयार है जो लैब से निकल कर एक कंपनी का रूप ले सके.

यह भी एक वजह है कि कई अमेरिकी वैंचर केपिटल (वीसी) कंपनियों ने भारत में अपनी शाखाएं खोली हैं. दरअसल, लाइवमीडिया में निवेश करने वाली दो अग्रणी निवेशकों में अमेरिकी वैंचर कैपिटलिस्ट्स ही हैं जिनमें से सिलीकॉन वैली की प्रतिष्ठित फर्म ड्रेपर फिशर जर्वेट्सन एक है. लेकिन भारत में उसकी अपनी विकसित हुई वैंचर कैपिटल कंपनियां नहीं हैं. मैं जैसा कि पहले भी देख चुका हूं, वीसी नवाचार (इनोवेशन) को तरजीह देते हैं, ऐसे में भारत की अपनी वैंचर कैपिटल कंपनियों की कमी होने के कारण इस क्षेत्र में बहुत बड़े पैमाने पर गतिविधियां नहीं हो पा रही हैं.

उदाहरण के लिए, ग्लोबल इंडिया वैंचर केपिटल एसोसिएशन के मुताबिक वर्ष 2008 के पहले 9 महीनों के दौरान भारत में शुरुआती स्तर का कुल वीसी निवेश 67 करोड़ डॉलर का हुआ. जबकि अमेरिकन नेशनल वैंचर कैपिटल एसोसिएशन के मुताबिक इसी अवधि के दौरान अमेरिका में शुरुआती स्तर का वीसी निवेश 5.2 अरब डॉलर का हुआ और यह आंकड़ा पूरी तरह वास्तविक तस्वीर को स्पष्ट नहीं कर रहा है. आर्थिक मंदी ने भारत की तुलना में अमेरिका को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है और इस दौरान अमेरिका में वीसी गतिविधियां बहुत तेजी से और बेहद कठोर रूप में घटी हैं. इसके बावजूद, शुरुआती स्तर पर वीसी निवेश में 10 गुना अंतर होने पर भी साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि यहां फिलहाल पूंजी नहीं है.

तो यहां पर्याप्त मात्रा में अभिनव विचार लेकर आने वाली इनोवेटिव स्टार्ट-अप्स कब सामने आएंगी कि वैंचर कैपिटल का एक धमाका हो जाए? अपने भारत प्रवास के दौरान मैंने तकरीबन 10 स्टार्ट-अप्स के साथ बातचीत की. इनमें से कुछ के पास ऐसे उत्पाद या प्रतिरूप (प्रोटोटाइप्स) थे जो बड़ी आसानी से सिलीकॉन वैली में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं. भारत की विशाल आइटी कंपनियों की अग्रणी इकाइयां भी तेजी से वैंचर कैपिटल के क्षेत्र में प्रवेश करने जा रही हैं. इन्फोसिस के संस्थापक नारायण कृष्णमूर्ति ने हाल ही में अपनी कंपनी के करोड़ो डॉलर के शेयर बेच कर एक वैंचर कैपिटल फंड स्थापित करने की घोषणा की है. इस फंड का उद्देश्य होगा भारत में निवेश.

अमेरिका की ही तर्ज पर भारत में भी उद्यमशीलता के आयाम एक समान हैं. नई-नई कंपनियों के संस्थापक आम तौर पर ऊंची रैंक के और अधेड़ उम्र के अनुभवी एक्जीक्युटिव्स होते हैं. दूसरों के लिए काम कर-करके ये लोग ऊब चुके होते हैं और बहुत बूढ़े होने से पहले कुछ असरदार काम कर दिखाने की चाहत के साथ ही खासा पैसा भी कमाने की इच्छा रखते हैं. अब भारत में सैकड़ों और हजारों की तादाद में आर. ऐंड डी. वर्कर हैं जो खासा कीमती अनुभव हासिल कर रहे हैं और उनकी उम्र भी बढ़ रही है. यानी बात अब थोड़े समय की ही है कि वे कब अपनी उद्यमशील योजनाओं को अमल में लाना शुरू करते हैं. आखिर ऐसा इसलिए क्योंकि उनके जो साथी अमेरिका में जा बसे हैं वे ही तो सिलीकॉन वैली की छह टैक्नोलॉजी कंपनियों में से एक शुरू करते हैं.

मैं यह शर्तिया तौर पर कह सकता हूं कि, यदि आप अगले पांच साल में TechCrunch 50 के भारतीय स्टार्ट अप्स की इतनी ही संख्या के अमेरिकी स्टार्ट अप्स के साथ तुलना करेंगे तो उनमें आपको काफी समानता नजर आएगी. यह भी चौंकाने वाली बात है यह कि अमेरिकी स्टार्ट अप्स की तुलना में भारतीय स्टार्ट अप्स का यह परिदृश्य बहुत कम समय में अस्तित्व में आया है.

अमेरिका के लिए यह अच्छा सबक होगा कि भारत में एक नई कंपनी शुरू करने के लिए अब पहली बार बहुत कम बाधाएं हैं- और यदि अमेरिकीयों ने जितना जल्द हो सके अपनी नई कंपनी का मॉडल बना कर उसे पूरी तरह परफेक्ट नहीं बना लिया तो भारत के कुछ महत्वाकांक्षी इंजीनियर उनके मुंह का निवाला छीन लेगें.

इस आलेख के लेखक विवेक वाधवा उद्यमी से अकादमिक बने हैं. वह यूसी-बार्कले के विजिटिंग स्कॉलर, हारवर्ड लॉ स्कूल के सीनियर रिसर्च एसोसिएट और ड्यूक यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर ऑन्ट्रप्रिन्योरशिप ऐंड रिसर्च कमर्शियलाइजेशन के निदेशक हैं.

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