ड्राइविंग लाइसेंसः निजीकरण की दरकार

यूरोप और अमेरिका में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या कम होती जा रही है, भारत में यह बढ़ रही है

किसी भी बात को जटिल बनाना सरकारों का पसंदीदा शगल होता है। लेकिन लीक से हटकर सोचा जाए तो मुश्किल समस्या भी आसान हो सकती है। भारत में बड़ी संख्या में होने वाली दुर्घटनाओं को ही ले लीजिए। ये आए दिन होती हैं, क्योंकि एक तो भारतीय सड़कों पर ऐसे वाहन दौड़ते रहते हैं जिनका स्टेयरिंग ऐसे अकुशल ड्राइवरों के हाथ में होता है, जिनको यूरोप और अमेरिका में कभी भी लाइसेंस मिल ही नहीं सकता। सुरक्षा को लेकर वहां के जागरूक समाज द्वारा हर एक उम्मीदवार के लिए तय मुश्किल ड्राइविंग टेस्ट में वे नाकाम हो जाएंगे।

यहां भारत में कोई भी व्यक्ति सरकारी ट्रांसपोर्ट कार्यालयों में हथेलियां गर्म करके ड्राइविंग लाइसेंस हासिल कर सकता है। परिणाम यह है कि भारत का शुमार दुनिया की सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटना दर वाले देशों में किया जाता है। यह दर गिर सकती है अगर सरकार ड्राइविंग लाइसेंस पर अपने एकाधिकार में कुछ ढील देते हुए भारत की शीर्ष ऑटो कंपनियों को भी लाइसेंस जारी करने का अधिकार दे दे। सरकार अगर ड्राइविंग लाइसेंस पर अपना एकाधिकार कम करती है तो निश्चित तौर पर ड्राइविंग का स्तर सुधरेगा।

ड्राइविंग का स्तर सुधरेगा क्योंकि मारुति, टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी कंपनियां ड्राइविंग टेस्ट में नाकाम अधकचरे उम्मीदवारों को लाइसेंस जारी ही नहीं करेंगी। कुछ लोग कह सकते हैं कि ऐसा होने पर लोग सरकार द्वारा जारी ड्राइविंग लाइसेंस लेकर सड़क पर आ जाएंगे। सच है, लेकिन वक्त गुजरने के साथ ही बाजार की ताकतें सरकारी लाइसेंसों की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा देंगी। और नौकरियों के लिए भी निजी मोटर कंपनियों द्वारा जारी लाइसेंस ही ज्यादा मायने रखेंगे। कार, बस और टैसी ड्राइविंग बेहतर नौकरी की तलाश में इन निजी कंपनियों के लाइसेंस ही हासिल करने की कोशिश करेंगे। रोजगार देने वाले भी विकल्प होने की स्थिति में सरकारी की बजाय निजी कंपनी के लाइसेंसधारी को ही प्राथमिकता देंगे। यहां तक कि अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहने वाले माता-पिता भी चाहेंगे कि उनका बेटा या बेटी निजी कंपनियों से ही लाइसेंस हासिल करे। कुछ ही सालों में सरकारी लाइसेंस बेमानी हो जाएगा।

ड्राइविंग लाइसेंसों के निजीकरण में कोई बड़ी कानूनी परेशानी नहीं होगी। यह मोटर वेहिकल एक्ट में सामान्य से संशोधन से किया जा सकता है। इस मामले में कोई राजनीतिक बाधा भी नहीं होगी। अगर सरकार एयरलाइंस और टेलीकॉम नेटवर्क का निजीकरण कर सकती है तो ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया का भी निजीकरण किया जा सकता है। साथ ही भारत के पास और कोई विकल्प है भी नहीं।

अमेरिका में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या 1970 में 55,000 थी जो 2003 में घटकर 45,000 हो गई है। भारत में पिछले पांच सालों में ही सड़क दुर्घटनाओं की संख्या 81,000 से बढ़कर 98,000 हो गई है। और जहां तक सड़क दुर्घटनाओं में घायल होने की बात है तो यह आंकड़ा भारत में 2003 के 3,83,000 से बढ़कर 2005 में 4,47,000 हो गया है।

किसी भी दुर्घटना के आर्थिक दुष्परिणाम गंभीर होते हैं। वो लाखों परिवार बर्बाद हो जाते हैं जिनका कोई किसी दुर्घटना में या तो मारा जाता है या फिर विकलांग हो जाता है। इससे भी दुख की बात यह है कि भारत में तो अधिकांश दुर्घटनाओं को टाला जा सकता है क्योंकि इनका कारण अकुशल ड्राइवर होते हैं। जो बिना किसी उचित टेस्ट के लाइसेंस दे दिए जाने के कारण होता है। इसके विपरीत ब्रिटेन में तो लाइसेंस हासिल करने के टेस्ट इतने कड़े हैं कि औसतन 10 उम्मीदवारों में से छह नाकाम हो जाते हैं।

पश्चिमी समाज और जापान जैसे देश अकुशल ड्राइवर के हाथ में कार को दिशाहीन मिसाइल की संज्ञा देते हैं। भारत में बस, लॉरियों और ट्रकों को यही माना जा सकता है। भारत में वाहनों की संख्या में इनका प्रतिशत भले ही महज 4 फीसदी हो, लेकिन दुर्घटनाओं में इनकी 35 फीसदी तक की भागीदारी होती है। इनके ड्राइवरों में दिल्ली के ब्लू-लाइन ड्राइवर भी शामिल हैं, जिनके पास वैध लाइसेंस होता है। जेम्स बांड की तरह उनके पास किसी को भी मारने का लाइसेंस (लाइसेंस टू किल) होता है।

ब्रिटेन में लाइसेंस हासिल करने के लिए वाहन अच्छे से चलाते आना ही पर्याप्त नहीं होता। उसे वाहन के इंजिन के बारे में भी पर्याप्त जानकारी होना चाहिए। लाइसेंस देने से पहले परीक्षक उससे पूछ सकता है कि कार का ऑइल, कूलेंट और विंडस्क्रीन वॉशर का लेवल कैसे चेक किया जाता है। वाहन चलाने का वास्तविक टेस्ट 40 मिनट का होता है, जिसमें चालक को तय निशान तक वाहन रिवर्स करके दिखाना पड़ता है और तय निशान के भीतर ही रहकर मोड़ काटकर दिखाना पड़ता है। अगर वह निशान या मोड़ के पत्थर को छू लेता है तो वह नाकाम हो जाता है। ज्यादा रिवर्स करना भी उसके लाइसेंस की राह की बाधा बन सकता है। एक ब्रिटिश व्यक्ति को औसतन दोतीन प्रयासों के बाद ही लाइसेंस मिल पाता है। परिणाम यह कि ब्रिटेन में लंबे अर्से से दुर्घटनाओं की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है।

भारत की सड़कें और अधिक सुरक्षित हो जाएंगी अगर ड्राइविंग कौशल की जांच निजी ऑटो कंपनियों द्वारा की जाए। इन कंपनियों को सरकारी कार्यालयों की जगह लेने की कोई जरूरत नहीं है। वे एविएशन सेक्टर की जेट एअरवेज या फिर टेलीकॉम सेक्टर की भारती जैसी कंपनियों की तरह समानांतर काम कर सकती हैं। निजीकरण को पूरे देश में आजमाने की जरूरत नहीं। केवल दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में ही इसे लागू कर दिया जाए तो फर्क दिखने लगेगा। दिल्ली में वाहनों की संख्या (42 लाख) समूचे बिहार (7,00,000) की तुलना में छह गुना है। ड्राइविंग लाइसेंस देने की प्रक्रिया के निजीकरण का कई राजनीतिज्ञों और अधिकारियों द्वारा विरोध किया जा सकता है क्योंकि लाइसेंस पर सरकारी आधिपत्य का उनको लाभ मिलता है। नए ड्राइविंग लाइसेंस जारी करना और पुराने लाइसेंसों का नवीनीकरण भारत में उद्योग का रूप ले चुका है। भारत में मशीन से चलने वाले वाहनों की संख्या 7.6 करोड़ है और इनकी संख्या में हर साल 40 लाख वाहनों का इजाफा हो जाता है। भारत के परिवहन कार्यालयों ने वर्ष 2001-2002 में 40 लाख ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए थे। लंबी कतारों में खड़े रहने से बचने के लिए लोग 200 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक की रिश्वत देने को तैयार रहते हैं।

इसलिए भारत में 650 से ज्यादा परिवहन कार्यालयों की अवैध आमदनी ही कई सैकड़ों करोड़ रुपए है। इसमें राजनीतिज्ञों और सरकारी अधिकारियों का भी हिस्सा होता है। ऐसे में निश्चित ही वे तय आमदनी का एक जरिया छिनने का विरोध तो करेंगे ही।

इस एकाधिकार को समाप्त करने का एक ठोस कारण भी है। ऐसा करने से गरीब लोगों को मदद मिलेगी। भारत की सड़क दुर्घटनाओं में कार में बैठे रईस लोग कम ही मरते हैं। दुर्घटना का दंश मध्यमवर्गीयों, कम आय वाले पैदल राहगीरों और दो पहिया वाहन चालकों को ही झेलना पड़ता है। अगर निजी क्षेत्र से ईमानदारी के साथ ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए जाते हैं तो सबसे ज्यादा फायदा इन्हीं लोगों का होगा।

(अरविंद काला एक फ्रीलांस लेखक हैं, जो मानते हैं कि फ्रीलांस लेखन बेरोजगारी से बेहतर विकल्प है)

लेखक : 
अरविंद काला
प्रकाशित: 
Live Mint - Sep 12, 2007
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