याचिका रोशनी करने वालों की..

रोशनी के लिए विभिन्न उत्पाद बनाने वालों के लिए तैयार की गई "कैंडलमेकर्स पिटिशन" (याचिका) संरक्षणवाद पर एक ख्यात व्यंग्य है। फ्रांसीसी अर्थशास्त्री फ्रैडरिक बास्तियात द्वारा लिखित और प्रकाशित यह व्यंग्य 1845 में उनकी रचना इकानॉमिक सोफिज़्म का ही हिस्सा था। यह एक तरह से, एडम स्मिथ द्वारा शुरू की गई मुक्त बाजार बनाम वाणिज्यवाद (वणिकवाद) की बहस का विस्तार था।

बास्तियात ने इसके जरिये सरकार द्वारा कुटीर उद्योग को प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए लगाई गई लेवी पर निशाना साधा था। बास्तियात की इस चुटीली याचिका में फ्रांस के रोशनी उद्योग से जुड़े हर उत्पादक को शामिल किया गया है. फ्रांसीसी सरकार से इन उत्पादकों को रोशनी के एक बाहरी सप्लायर से मिल रही अनुचित प्रतिस्पर्धा से बचाने की अपील की गई- यह प्रतिस्पर्धी था, “सूरज”।

 


 

एक याचिका लाइटिंग संबंधी लगभग सभी उत्पादों के निर्माताओं की ओर से जिनमें मोमबत्तियां, लालटेन, स्ट्रीट लैम्प, माचिस, चरबी, तेल, रेज़ीन, अल्कोहल आदि के उत्पादक तथा साथ ही अग्निशामकों और बत्ती के गुल हटाने वालों (स्नफर्स) की ओर से...

प्रति,

चेम्बर ऑफ डेप्युटीज़ के मानद सदस्य.

मान्यवर,

आप बिल्कुल सही रास्ते पर चल रहे हैं। आप अमूर्त सिद्धांतों को खारिज कर देते हैं और भरपूर माल और कम कीमतों के लिए आपके दिल में रत्ती भर भी सम्मान नहीं। आप ने तो अपना पूरा ध्यान उत्पादक की नियति पर ही लगा रखा है। आप उसे विदेशी प्रतिस्पर्धा से आजादी दिलाना चाहते हैं, यानी आप घरेलू उद्योग को घरेलू बाजार के लिए ही सुरक्षित रखना चाहते हैं।

क्या कही जाए आपकी थ्योरी? नहीं, थ्योरी से बड़ा धोखे में रखने वाला तो शब्द है। आपका मत या पंथ (डॉक्ट्रिन)? आपका तंत्र (सिस्टम) या फिर आपका सिद्धांत (प्रिंसिपल)? जो भी है हम आपको यहां इसके लिए एक शानदार मौका उपलब्ध कराना चाहते हैं। लेकिन आप मतों को नापसंद करते हैं, आपका सिस्टम भयावह है और जहां तक प्रिंसिपल की बात है तो आप इस बात को ही खारिज करते हैं कि राजनीति आधारित अर्थव्यवस्था में प्रिंसिपल नाम की कोई चीज होती है। तो हम इसे आपकी कामकाज की पद्धति या तौर-तरीका कहेंगे, एक ऐसी पद्धति जिसमें न तो कोई थ्योरी है और न ही कोई प्रिंसिपल।

हम एक ऐसी बर्बाद कर देने वाली प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं, जहां हमारा प्रतिद्वंद्वी हमसे बेहतर लाइट (रोशनी) का उत्पादन कर रहा है और हमारे घरेलू बाजार में वह अपनी कम कीमत के कारण छा गया है। कम से कम इस वक्त तो ऐसा ही लग रहा है। हमारी बिक्री ठप हो गई है, सारे उपभोक्ता उसकी ओर ही जा रहे हैं और अपार विस्तार वाले फ्रांसीसी उद्योग की एक शाखा का कामकाज ठप हो गया है। यह प्रतिद्वंद्वी कोई और नहीं सूरज है। हमारे खिलाफ उसने निर्दयता के साथ जंग छेड़ रखी है और ऐसा लगता है कि हमारे खिलाफ उसे उकसाने का काम ग्रेट ब्रिटेन (आजकल गजब की कूटनीति का केंद्र) कर रहा है, क्योंकि उसके (सूरज के) मन में उस अहंकारी द्वीप के लिए वह सम्मान है जो हमारे लिए नहीं है।

हम तो आपसे बस यह गुजारिश करते हैं कि एक कानून बनाकर सभी खिड़कियां, छज्जे, स्कायलाइट्स, अंदर और बाहर के शटर, परदे, खिड़की-दरवाजे के फरमे (केसमेंट), कंदील, जहाजों की डेडलाइट और लाइंड बंद करवा दीजिए। यानी कि हर छोटा-बड़ा ऐसी दरार, छेद बंद कर दिए जाएं जिससे सूरज की रोशनी हमारे घर या किसी भी स्थान के भीतर प्रवेश कर सके। हमारे भेदभाव से मुक्त (फेयर) उद्योगों के पतन को बचाने के लिए, जिनके बारे में हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हमने देश को समृद्ध बनाया है और यह देश अगर हमें इस असमान जंग के लिए खुला छोड़ देता है तो यह उसकी कृतघ्नता ही होगी।

भले बनिए, राजनीतिज्ञों, हमारी गुहार को गंभीरता से लें और उसे खारिज करने से पहले कम से कम हमारे तर्क, दावों और कारणों को तो जान लें।

पहली बात तो अगर आप कुदरती रोशनी को ज्यादा से ज्यादा रोक देंगे तो आप कृत्रिम रोशनी की मांग तैयार कर देंगे। ऐसे में भला फ्रांस का कौनसा उद्योग है जो नहीं फलेगा-फूलेगा?

अगर फ्रांस के उपभोक्ता मोमबत्ती बनाने के लिए अधिक चर्बी का इस्तेमाल करेगा तो हमें ज्यादा पशुओं और भेड़ों की जरूरत पड़ेगी और परिणाम यह होगा कि हमारे साफ-सपाट खेतों (पशुओं के चरने से), मांस, ऊन, चमड़े और खास तौर पर खाद में वृद्धि होगी, जो सभी कृषि संपदा का आधार है।

अगर फ्रांस ज्यादा तेल का इस्तेमाल करेगा तो हम पोस्त, ऑलिव और रेपसीड की खेती में बढ़ोतरी देखेंगे। ये महंगे लेकिन मिट्टी को खत्म करने वाले पौधे सही समय पर आएंगे ताकि हम पशुपालन से जमीन की बढ़ने वाली उत्पादन क्षमता का भी फायदा उठा सकेंगे।

हमारी ऊसर दलदली जमीन (मूर्स) रेजिन उत्पादन करने वाले पेड़ों से पट जाएगी। मधुमक्खियों के जत्थे पहाड़ों से नीचे आकर उस महक के खजाने (फूलों की तरह) की तलाश में आएंगे जो आज तक बेकार ही चले जाया करते थे। जाहिर है, कृषि की एक भी ऐसी शाखा नहीं बचेगी जो अच्छी तरह से फलेगी-फूलेगी नहीं।

यही बात जहाजरानी उद्योग (शिपिंग) के लिए भी खरी होगी। हजारों नौकाएं व्हेल मछलियों के शिकार में इस्तेमाल की जाएंगी और कम ही समय में हमारे पास भी एक ऐसा बेड़ा होगा जो व्हेल की चर्बी के भंडार के साथ इस याचिका पर हस्ताक्षर करने वाले देशभक्तों को मोमबत्तियों और रोशनी के अन्य साजोसामान के लिए जरूरी चर्बी के मामले में फ्रांस के सम्मान की रक्षा कर सकेगा।

पेरिस के निर्माताओं की खासियतों के बारे में तो फिर बात ही क्या? इसके बाद आप मोमबत्तियों, लैम्पों और झाड़-फानूसों, मोमबत्ती के स्टैंडों (कैंडलाब्रा) में सोने का पानी, कांसा और क्रिस्टल रखेंगे। ऐसी शानो-शौकत जिसके आगे आज की इस्तेमाल की जा रही बातें सर्वसामान्य लगेंगी।

बात रेत के टीलों की ऊंचाईयों पर रेजिन जमा करने वाले किसी जरूरतमंद की हो या फिर खान की जमीन की गहराईयों में सिमटी काली कोठरी में काम करने वाले खनिक की, कोई ऐसा नहीं बचेगा जो ज्यादा वेतन और ज्यादा समृद्धि का मुंह नहीं देखे।

अगर आप एक बार भी जरा ध्यान से देखेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि एनजिन कंपनी का धनी स्टॉकहोल्डर हो या फिर माचिस बेचने वाला, हर एक फ्रांसीसी को हमारी याचिका से फायदा होगा।

भद्रजनों, हम आपकी आपत्तियों को भी स्वीकारते हैं। लेकिन इनमें से एक भी ऐसी नहीं है जिसे आपने मुक्त व्यापार के समर्थकों की पुरानी किताबों से न उठाया हो। हम आपको चुनौती देते हैं कि आप हमारे खिलाफ एक शब्द कहिए और यह न केवल आपके बल्कि आपकी तमाम नीतियों के पीछे मौजूद प्रिंसिपल को ही चुनौती दे डालेगा।

या आप हमें बता सकते हैं, हालांकि ऐसी सुरक्षा मिलने पर फ्रांस रोशनी करेगा, फ्रांस को जरा भी लाभ नहीं होगा क्योंकि इसकी कीमत उपभोक्ता चुकाएगा?

हमारा जवाब तैयार हैः

आपके पास अब उपभोक्ता के हितों को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है। आपने हर उस लमहे पर उसके हितों की बलि दी है जब आपने इन हितों को उत्पादकों के खिलाफ पाया। आपने ऐसा उद्योग को प्रोत्साहन देने और रोजगार बढ़ाने के लिए किया। इन्हीं कारणों की वजह से ही आपको अब भी कदम उठाना होगा। निश्चित तौर पर आपको इस आपात्ति का पूर्वाभास हो गया था।

जब आपको यह बताया गया था कि उपभोक्ता की लोहे, कोयले, तिल, गेहूं और कपड़ों के मुक्त आगमन में भागीदारी है। हां, आप जवाब देते हैं, लेकिन उत्पादकों का हित उनके निषेध में है। निश्चित तौर पर, अगर उपभोक्ताओं का कुदरती रोशनी पर अधिकार है तो उत्पादकों का पाबंदी पर जरूर अधिकार है।

आप अब भी कह सकते हैं, लेकिन उत्पादक और उपभोक्ता तो एक ही व्यक्ति है। अगर उत्पादक को संरक्षण से लाभ होता है तो वह किसानों को भी समृद्ध कर देगा। इसके विपरीत अगर कृषि जगत समृद्ध हुआ तो यह बाजार को तैयार माल (मैन्युफैक्चर्ड गुड्स) के लिए खोल देगा। बहुत अच्छे, अगर आप हमें दिन में बिजली के उत्पादन की मंजूरी दे देते हैं तो हम बड़ी मात्रा में चर्बी, चारकोल, तेल, रेजिन, मोम, अल्कोहल, चांदी, लोहे, कांसे और क्रिस्टल की खरीदी करेंगे ताकि उद्योगों को उसकी आपूर्ति कर सकें। ऐसे में समृद्धि हासिल करने वाले हम और हमारे साथी सप्लायर वस्तुओं का बड़ी मात्रा में उपभोग कर सकेंगे और हमारी इस समृद्धि का लाभ कुटीर उद्योग तक पहुंच जाएगा।

क्या आप कहेंगे कि सूरज की रोशनी तो कुदरत की तरफ से दिया गया निशुल्क तोहफा है और ऐसे तोहफे को ठुकराना तो संपत्ति को हासिल करने के उपाय खोजने के बीच उसे ठुकराने की तरह होगा।

लेकिन अगर आप फिर भी ऐसा ही करते हैं तो आप अपनी ही नीति को नैतिक आघात पहुंचा देंगे। याद है आपने अभी तक विदेशी सामान को इसलिए ठुकराया था क्योंकि आपकी राय में यह निशुल्क तोहफे की तरह था। अन्य लोगों के एकछत्र अधिकारों की तुलना में हमारी याचिका को ठुकराने के लिए आपके पास शायद महज आधे भी ऐसे सही कारण नहीं होंगे, जो कि आपकी नीति की लीक पर हों। केवल इसलिए हमारी मांग को ठुकराना कि वह दूसरों से बेहतर हैं तो ऐसा ही होगा कि इस समीकरण को स्वीकार लिया जाए कि +x+=-, यह तो बेहूदगी पर और अधिक बेहूदगी की तरह होगा।

किसी सामग्री के उत्पादन में श्रम और कुदरत के बीच अलग-अलग अनुपातों में संबंध देश और जलवायु पर निर्भर करता है। कुदरत की जो भी भागीदारी होती है वह निशुल्क होती है और मानवीय श्रम की भागीदारी का ही भुगतान किया जाता है या फिर उसकी कीमत मानी जाती है।

अगर लिस्बन का संतरा पेरिस के संतरे से आधे दामों पर बिकता है तो इसमें सूरज की रोशनी की उपलब्धता, जो मुफ्त में उपलब्ध होती है, का मुख्य हाथ है। एक को जहां सूरज की भरपूर रोशनी मिलती है तो दूसरे को संतरों को तैयार करने के लिए कृत्रिम रोशनी का भी सहारा लेना पड़ता है। इस कृत्रिम रोशनी की कीमत फिर बाजार से तो वसूली ही जाएगी।

इसीलिए जब कोई संतरा पुर्तगाल से हमारे यहां पर पहुंचता है तो हम कहते हैं कि हमें यह आधे दामों पर मिल रहा है, यानी कि पेरिस के दामों से तुलना में आधे दाम।

अब, संक्षेप में कहा जाए तो केवल इसके आधे निशुल्क (इस शब्द के लिए माफ करें) होने के आधार पर आप इस पर पाबंदी का पक्ष लेते हैं। आप पूछते हैं, फ्रांसीसी श्रमिक विदेशी श्रमिक से कैसे प्रतिस्पर्धा कर सकता है, जबकि फ्रांसीसी श्रमिक को तो पूरा काम करना पड़ता है, विदेशी श्रमिक का आधा काम तो सूरज ही कर देता है? लेकिन हकीकत यह है कि अगर किसी उत्पाद का आधी कीमत पर होना आपको उसे प्रतिस्पर्धा से खारिज करने के लिए उकसा देता है, तो फिर आप पूरी तरह से निशुल्क कुदरती देन (सूरज की रोशनी) को भला कैसे प्रतिस्पर्धा में रहने दे सकते हैं? या तो आप अपनी नीतियों को लेकर पुख्ता नहीं है या फिर आपको आधी कीमत वाली वस्तु को कुटीर उद्योगों के लिए नुकसानदेह करार देकर फिर निशुल्क वस्तु को ज्यादा सशक्त कारणों और जोश के साथ प्रतिबंधित कर देना चाहिए।

एक और उदाहरण लें- जब कोई उत्पाद जैसे कोयला, लोहा, गेहूं या कपड़ा, हमारे पास विदेश से आता है और हम इसे अपने यहां पर उत्पादन की तुलना में सस्ते श्रम में हासिल कर सकते हैं, तो यह अंतर निशुल्क तोहफा ही तो है जो हमें दिया जा रहा है। इस तोहफे का आकार लाभ के अंतर के अनुपात में ही है। अगर विदेशी हमसे इसकी कीमत का तीन चौथाई, आधा या एक चौथाई मांगते हैं तो इस निशुल्क तोहफे का मूल्य क्रमशः एक चौथाई, आधा और तीन चौथाई होगा। यह ठीक सूरज से मिलने वाली रोशनी की तरह है जब दानदाता हमसे कुछ नहीं चाहता। अब जो सवाल हम आपसे औपचारिक रूप से पूछना चाहते हैं वो यह है कि आप फ्रांस के लिए क्या चाहते हैं, बिना किसी शुल्क के उपभोग का लाभ या फिर सशर्त उत्पादन के कथित लाभ। अपना विकल्प चुन लीजिए, लेकिन इसे तार्किक रखें। क्योंकि जैसा कि आप करते हैं, अगर आप विदेशी कोयले, लोहे, गेहूं और टेक्सटाइल पर इस लिहाज से प्रतिबंध लगाते रहेंगे कि एक दिन अनुपातिक मूल्य शून्य तक पहुंच जाए तो क्या सूरज की रोशनी को अपने देश तक आने देना इस नीति की खिलाफत नहीं करेगा, वह रोशनी जो हर दिन हर वक्त मुफ्त में उपलब्ध रहती है।

- वेब पर मूल रूप से द न्यू ऑस्ट्रेलियन द्वारा प्रकाशित. फेयर राइडीयु (Faré Rideau) द्वारा संक्षिप्त रूप में अनुदित. मूल फ्रांसीसी पाठ Bastiat.org पर उपलब्ध.