क्या देखा जाता है और क्या नहीं देखा जाता है

वर्ष 1850 में प्रकाशित फ्रेडरिक बास्तियात की सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है “क्या देखा जाता है और क्या नहीं देखा जाता है.” इस निबंध के पहले पैराग्राफ में बास्तियात पाठकों को एक अर्थशास्त्री बनने के लिए तैयार करते हैं और उसके बाद “टूटी खिड़की की कहानी” के जरिये किसी की संपत्ति के नष्ट होने में छिपी लागत का बखूबी चित्रण करते हैं। इस कहानी को टूटी खिड़की के दृष्टांत के तौर पर भी जाना जाता है, जिसमें कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि दूसरों की खिड़कियां तोड़कर वे रोजगार और समृद्धि का सृजन कर सकते हैं। बास्तियात ने विध्वंस के माध्यम से समृद्धि की पहेली को यह कहकर हल करने की कोशिश की है कि बेशक इसमें प्रत्यक्ष समृद्धि नजर आती है, लेकिन जो दिखता नहीं है वह यह कि जो खिड़की को तोड़े बिना भी उत्पादित किया जा सकता था।

आर्थिक दुनिया में एक अधिनियम, एक आदत, एक संस्थान, एक कानून केवल एक प्रभाव उत्पन्न नहीं करते, बल्कि प्रभावों की श्रृंखला का एक कारण बन जाते हैं। इन तमाम प्रभावों में केवल पहला ही तत्काल होता है, यह अपने कारण के साथ ही सामने आ जाता है, यह दिखने लगता है। अन्य प्रभाव इसके बाद ही आते हैं, वे दिखाई नहीं देते। अगर हम उनको पहले ही जान लेते हैं तो हम भाग्यशाली होते हैं।

एक कमजोर (bad) अर्थशास्त्री और एक अच्छे (good) अर्थशास्त्री में केवल एक ही अंतर होता हैः कमजोर अर्थशास्त्री अपने आपको केवल दिखने वाले प्रभावों तक ही सीमित रखता है, जबकि अच्छा अर्थशास्त्री दोनों का खयाल रखता है, जो दिखाई दे रहा है और जिसे पहले ही देखा जाना चाहिए।

फिर भी यह अंतर बहुत ज्यादा होता हैः क्योंकि ऐसा हमेशा ही होता है कि तात्कालिक प्रभाव फायदेमंद होता है जबकि बाद में होने वाले प्रभाव अमांगलिक और नुकसान पहुंचाने वाले होते हैं। इसका यही मतलब है कि एक बड़ी बुराई के लिए एक कमजोर अर्थशास्त्री छोटे से नजदीकी लाभ को अपना लेता है, जबकि अच्छा अर्थशास्त्री भविष्य के फायदे के लिए ताजा बुरे वक़्त को भी झेलने का जोखिम मोल ले लेता है।

यह बात तो स्वास्थ्य और सदाचार (मॉरल) के लिए भी सही होती है। किसी आदत का शुरूआती स्वाद जितना मीठा होगा उसके बाद में कड़वा साबित होने की उतनी ही ज्यादा आशंका है व्यभिचार, आलस और फिजूलखर्ची इसके अच्छे उदाहरण हैं। जब एक व्यक्ति दिखने वाले प्रभाव से मंत्रमुग्ध होकर आने वाले प्रभाव को नहीं देख पाता, तो वह शोचनीय आदतों का गुलाम हो जाता है। न केवल स्वाभाविक रुझान के कारण बल्कि जानबूझकर भी।

यही इंसान के विकास में मौजूद दर्दसंघर्ष का भी खुलासा कर देता है। पालने में रहने के वक़्त से अज्ञान उसे घेर लेता है, इसलिए वह हर कदम उसके पहले प्रभाव के लिहाज से ही उठाता है। बचपन में वह यही देख और कर पाता है।

उसे अन्य प्रभावों को देखकर हर काम करने की समझ तो काफी वक़्त के बाद आती है। दो बिलकुल अलग किस्म के शिक्षक उसे यह बात सिखाते हैंअनुभव और दूरदृष्टि। अनुभव बहुत प्रभावशाली तरीके से लेकिन क्रूरता से सिखाता है। अनुभव यह हमें हर कदम का प्रभाव उसका अहसास कराकर सिखाता है और अंततः हम उस बात को सिखे बगैर नहीं रहते, अपने आपको झुलसा लेने के कारण वह आग जलती रहती है। मेरी प्राथमिकता, जहां तक संभव हो, यही होगी कि इस बेहद कठोर शिक्षक की जगह मैं ज्यादा विनम्र स्वभाव के शिक्षक को रख सकूं: दूरदृष्टि। इसी वजह से मैं कुछ आर्थिक घटनाओं की पड़ताल करुंगा, ऐसी जिनमें दिखने वाले और न दिखने वाले प्रभावों का असर दिखा।

1. टूटी हुई खिड़की (ब्रोकन विंडो)

क्या आपने उस एक सक्षम नागरिक जेम्स गुडफेलो के गुस्से को देखा था। जब उनके न सुधरने वाले बेटे ने खिड़की का कांच तोड़ दिया था? अगर आप उस वाकये के वक़्त वहां मौजूद होते तो आपने देखा होता कि तमाशबीन, भले ही उनकी संख्या 30 के आस-पास हो, दुर्भाग्यशाली मकान मालिक को एक सी सांत्वना देना चाह रहे थे, 'तूफान की हवा किसी का भला नहीं करती। ऐसे ही हादसों से तो उद्योग चल रहे हैं। हर किसी को जीवन-यापन तो करना ही है। अगर कोई कभी भी कोई खिड़की न तोड़े तो फिर बेचारे कांच का काम करने वालों का क्या होगा?'

सांत्वना भरे इस हल में ही एक समूचा सिद्धांत सा है कि इस साधारण से मामले में दूध का दूध और पानी का पानी करना एक अच्छा विचार है, किसी को रंगे हाथों पकड़ना (फ्लेग्रांत डेलिक्तो)। क्योंकि इस मामले में वे तमाम बातें हैं जो हमारे अधिकांश आर्थिक संस्थानों में मौजूद हैं।

मान लीजिए कि इस नुकसान की भरपाई पर छह फ्रैंक का खर्च आया। अगर आपका यह कहना है कि इस नुकसान के कारण कांच उद्योग को छह फ्रैंक का प्रोत्साहन मिलता तो मैं आपसे सहमत हूं। मैं आपके तर्क को चुनौती नहीं दूंगा क्योंकि यह सही है। कांच वाला आएगा अपना काम करेगा, छह फ्रैंक हासिल करेगा और खुद को और उस लापरवाह बच्चे का शुक्रिया अदा करेगा। यह वो बात है जो देखी जा रही है।

लेकिन अगर कटौती के जरिये आप इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, जैसा कि अक्सर होता है, कि खिड़की के कांच तोड़ना अच्छी बात है, क्योंकि यह पैसे के चलन को बढ़ावा देता है, और इससे कुल मिलाकर उद्योग का भला होता है। मैं चीखकर विरोध करना चाहूंगाः ऐसा नहीं होगा! आपका सिद्धांत क्या देखा जाता है पर आकर थम जाता है। इसमें क्या नहीं देखा जाता का कोई जिक्र नहीं है।

यह नहीं देखा जाता कि हमारे एक नागरिक ने एक काम के लिए छह फ्रैंक खर्च किए हैं, इसलिए अब वो उन छह फ्रैंकों को किसी अन्य काम के लिए खर्च नहीं कर पाएगा। यह नहीं देखा जाता कि अगर उसे खिड़की का कांच नहीं बदलना पड़ता तो वो बदलता. उदाहरण के लिए अपने कटे-फटे जूते या फिर अपनी लाइब्रेरी के लिए एक और किताब। संक्षेप में उसने अपने छह फ्रैंक ऐसे किसी काम में इस्तेमाल किए होते, जिनके लिए अब उसके पास पैसे नहीं हैं। आइए अब उद्योग पर एक सर्वसामान्य नजर डालें। खिड़की का कांच टूट जाने के कारण कांच उद्योग को छह फ्रैंक का प्रोत्साहन मिला, यह वह बात है जो देखी जाती है।

अगर खिड़की का कांच नहीं टूटता तो जूता उद्योग (या किसी अन्य) को छह फ्रैंक का प्रोत्साहन मिल गया होता, यह वह बात है जो देखी नहीं जाती।

अगर आप जो देखा नहीं जाता को नकारात्मक और जो देखा जाता है उसे सकारात्मक मानकर सोचें, तो यह बात साफ हो जाएगी कि इससे उद्योग को आमतौर पर कोई फायदा नहीं हुआ और न ही राष्ट्रीय रोजगार पर ही इसका कोई असर हुआ। खिड़की का कांच टूटे या न टूटे।

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- "राजनीतिक अर्थशास्त्र: चुनिंदा निबंध" से